गीता की राजविद्या | Gita Ki Rajvidhya Swami Ramsukh Das By Gita Press
इस किताब के बारे में
गीता की राजविद्या स्वामी रामसुखदास की रचना है, जो गीता के रहस्यमय अध्यायों की व्याख्या पर आधारित है। पुस्तक का पूरा शीर्षक ज्ञान से जुड़ा हुआ है और इसमें श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय तथा तंत्र-अध्यायों की मिस्त व्याख्या प्रस्तुत की गई है। प्रकाशन गीता प्रेस, गोरखपुर से हुआ है। संवत् २०५२ का प्रथम संस्करण २०,००० प्रतियों के साथ छपा और मूल्य चार रुपये पचास पैसे रखा गया। पुस्तक में लगभग ५०० पृष्ठों का पाठ है।
पुस्तक में सामान्यतः गीता-ज्ञान को समझाने के बजाय उसके रहस्यमय और गूढ़ पक्ष पर ध्यान दिया गया है। स्वामी रामसुखदास ने बताया है कि साधक के लिए गीता केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि अनुभव करने की विषय-वस्तु है। सप्तवें अध्याय में ज्ञान-कर्म की एकता और तंत्र-अध्यायों में साधना की गूढ़ प्रक्रिया — दोनों पर अलग-अलग विवेचन मिलता है।
गीता-अध्ययन करने वाले साधकों और गीता प्रेस के प्रिय पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। जो पाठक गीता के सूक्ष्म और रहस्यमय पक्ष को समझना चाहते हैं, उनके लिए यह ग्रंथ एक अलग ही अनुभव देता है। सस्ती कीमत के कारण यह बहुत बड़ी संख्या में पाठकों तक पहुँची है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- गीता में वर्णित राजविद्या तथा राजयोग
- आत्म-साक्षात्कार के उपाय
- भक्ति, ज्ञान तथा कर्म का समन्वय
- श्लोक-वार सरल व्याख्या
पुस्तक की मुख्य बातें
डाउनलोड कैसे करें — बस 3 कदम
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