प्रचण्ड अग्नि भी उन्हें जला न पाई (सत्य घटना पर आधारित)

प्रचण्ड अग्नि में गिलहरी और चिड़िया के बच्चे जीवित रहे

एक बार राजपूत कॉलेज पिलखुवाके संस्थापक, आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध महोपदेशक, कर्मवीर महात्मा श्री लटूरसिंह जी पिलखुवा पधारे थे। उन्होंने मेरे पूछनेपर बहुत-से प्रतिष्ठित पुरुषोंके सामने अपनी आँखों-देखी निम्नलिखित घटनाएँ सुनायीं-

पहली घटना :

कुछ दिनों पहले मऊ जिला मेरठ के बढ़इयों ने लकड़ियों को जलाकर उनके कोयले बनानेका निश्चय किया। जमीन में एक गड्डा खोदा गया और उसे लकड़ियों से भरकर आग लगा दी गयी। रातभर वे धायँ-धायँ जलते रहे। अगले दिन जब सब लक्कड़ जलकर कोयले हो गये तब उन लोगों ने गड्ढे से कोयले निकालने शुरू किये। कोयले निकालते-निकालते उन्होंने देखा कि और सब लक्कड़-लकड़ी तो जल गये हैं, परंतु उनमें लकड़ीका एक गट्ठा बिलकुल ही नहीं जला है, वह ज्यों-कात्यों पड़ा है। यह बात नहीं कि वह अलग पड़ा रह गया हो, वह जलनेवाली लकड़ियोंके बीच में था। यह देखकर सभी को आश्चर्य हुआ। किसी को कुछ भी कारण समझमें नहीं आया। तब उसे बाहर निकालकर कुल्हाड़ीसे काटकर देखनेका विचार हुआ। तदनुसार उसे बाहर लाकर कुल्हाड़ीसे चीरा गया तो दिखायी दिया कि उस गट्टेके अंदर गिलहरीके छोटे-छोटे बच्चे जीवित बैठे हैं, उनको न जरा-सी आँच लगी, न जरा भी उनका बाल बाँका हुआ। प्रचण्ड अग्निमें उनका इस प्रकार सुरक्षित रहना देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। यह आँखों देखी घटना बरबस यह मनवा देती है कि ईश्वर है और वह जिसको बचाना चाहता है, आश्चर्यजनकरूप से बचा देता है

जाको राखे साइयाँ मार सकै नहिं कोय।
बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय॥

दूसरी घटना :

दूसरी सत्य घटना मेरे गाँवकी और मेरी देखी हुई है। गाँवके एक मकानमें ऊपर छप्पर पड़ा था। अकस्मात् पता नहीं, कैसे उस छप्परमें आग लग गयी। सारा छप्पर जलकर भस्म हो गया। देखे जानेपर मालूम हुआ कि छप्परका एक कोना बिलकुल नहीं जला। उसके अत्यन्त समीप पहुँचकर भी प्रचण्ड आग उसे नहीं जला पायी। सबको बड़ा कुतूहल हुआ। पास जाकर देखा गया तो दिखायी दिया कि उस कोने में चिड़ियाके छोटे-छोटे बच्चे जीवित बैठे हैं। सारा छप्पर जल-भुनकर खाक हो जानेपर भी इन पक्षिशावकोंको तनिक भी आँच नहीं लगी। प्रभुकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी आश्चर्यमें डूब गये। आग किसीको न जलाये—यह बात किसी प्रकार भी विश्वासयोग्य न होनेपर भी इन आँखोंदेखी घटनाओंको सत्य कैसे न माना जाय? । इसके पश्चात् आर्यसमाज के श्रीदिलेराम जी और महाशय रघुवरदयालजी ने एवं एक मुसलमान छात्र अलियास अहमदने आँखों देखी बच्चों की दो बड़ी विचित्र घटनाएँ आगसे बिलकुल बचनेकी सुनायीं। प्रभुकी महिमा अपार है।

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