भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद :

बरगद भारत का एक महत्त्वपूर्ण वृक्ष है। इसकी गणना पीपल के समान पूजनीय वृक्षों में की जाती है। यह भारत में पाए जानेवाले वृक्षों में सर्वाधिक विशाल अथवा फैलाव वाला वृक्ष है। बरगद गर्म देशों में पाया जानेवाला एक सदाबहार वृक्ष है। अर्थात् यह पूरे वर्ष भर हरा रहता है। इसके सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि इसके नीचे गर्मी के मौसम में ठंडक रहती है और सर्दी के मौसम में गर्मी रहती है। विशेष रूप से रात के समय।

बरगद के पेड़ का धर्मिक महत्त्व :

भारत में बरगद प्राचीनकाल से एक महत्त्वपूर्ण वृक्ष माना गया है। यजुर्वेद, अथर्ववेद, रामायण, महाभारत, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, महोपनिषद, सुभाषितावली, मनुस्मृति, रघुवंश, रामचरितमानस आदि ग्रन्थों में इसका उल्लेख किया है। हिन्दुओं में बरगद के सम्बन्ध में अनेक धार्मिक विश्वास और किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। जेठ मास की अमावस्या को की जानेवाली वट सावित्री की पूजा इसका प्रमाण है। बरगद को पवित्र वृक्ष मानने के कारण इसे काटना पाप समझा जाता है।
बरगद मूल रूप से मैदानी भागों का वृक्ष है। यह पहाड़ी स्थानों पर नहीं मिलता। धार्मिक महत्त्व का वृक्ष होने के कारण इसके सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हो गई हैं। एक किंवदन्ती के अनुसार-महाप्रलय होने पर सम्पूर्ण धरती जलमग्न हो गई थी। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। महाप्रलय की भयानक लहरों ने सब कुछ समाप्त कर दिया था।
धीरे-धीरे लहरें शान्त हुईं। इसी समय बरगद के पत्ते पर शिशु रूप में नारायण प्रकट हुए। वह अपने पैर का अंगूठा चूस रहे थे। नारायण की नाभि से एक कमल के फूल का जन्म हुआ। इस कमल पर ब्रह्माजी विरामजान थे। इसके बाद ब्रह्माजी ने मानव सहित विश्व के समस्त जीवों की सृष्टि की। नारायण का वास होने के कारण इस वृक्ष को हिन्दू धर्म के अनुयायी एक पवित्र वृक्ष मानते हैं।

भारत के कुछ भागों में एक विशेष प्रकार का बरगद पाया जाता है। इसे कृष्णवट कहते हैं। कृष्णवट के पत्ते मुड़े हुए होते हैं और देखने में दोने जैसे लगते हैं। कृष्णवट के सम्बन्ध में भी एक किंवदन्ती प्रचलित है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण बाल्यावस्था से ही अपनी गायें चराने के लिए जंगल जाते थे। वह जंगल में बड़ी मधुर बाँसुरी बजाते थे और गायें चरती रहती थीं। कृष्ण इतनी मधुर बाँसुरी बजाते थे कि सुननेवाला मन्त्रमुग्ध होकर उनकी ओर खिंचा चला आता था। उनकी बांसुरी गोपियों को बहुत अच्छी लगती थी। वे कृष्ण की बाँसुरी सुनते ही सब काम छोड़कर उनके पास दौड़ी चली आती थीं। गोपियाँ अपने साथ प्रायः दही-मक्खन आदि भी ले आती थीं।

कृष्ण जिस स्थान पर बैठकर बाँसुरी बजाते थे, उसके पास ही बरगद का एक वृक्ष था। वह बरगद के पत्ते तोड़ते, उसके दोने बनाते और दोनों में दही-मक्खन रखकर गोपियों के साथ मजे से खाते। कृष्ण को बरगद के पत्तों के दोने बनाने में बड़ा समय लगता था, अतः भूखी गोपियाँ बेचैनी अनुभव करतीं। कृष्ण अन्तर्यामी थे। वे गोपियों के मन की बात समझ गए। उन्होंने तुरन्त अपनी दैवी शक्ति से वृक्ष के सभी पत्तों को दोनों के आकारवाले पत्तों में बदल दिया। इस प्रकार बरगद की एक नई प्रजाति का जन्म हुआ। वर्तमान समय में भी दोनों के आकार के पत्तोंवाले बरगद के वृक्ष पाए जाते हैं। इनका आकार सामान्य बरगद से कुछ छोटा होता है। पश्चिम बंगाल में कृष्णवट कहीं-कहीं देखने को मिल जाता है। उत्तर प्रदेश में देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान में भी कृष्णवट के कुछ वृक्ष हैं।

कृष्णवट पर कुछ विदेशी वनस्पतिशास्त्रियों ने शोध भी किया है। सन् 1901 में कैन्डोल ने इसका अध्ययन करने के बाद इसे सामान्य बरगद से अलग एक विशिष्ट जाति का वृक्ष माना और इसे कृष्ण के नाम पर वैज्ञानिक नाम भी दे दिया ‘फाइक्स कृष्नी सी द कन्दोल’ । किन्तु विख्यात भारतीय वनस्पति वैज्ञानिक के. विश्वास इसका विरोध करते हैं। उनका मत है कि कृष्णवट एक अलग जाति का वृक्ष नहीं है। यह बरगद की ही एक प्रजाति है।

बरगद के पेड़ का विभिन्न भाषाओं में नाम :

बरगद मोरासी (Moraceae) परिवार का वृक्ष है। इसे अंग्रेजी में फाइकस बेंगालेन्सिस (Ficus Bengalensis) कहते हैं। हिन्दी में इसे वट, बर, बड़ आदि नामों से जाना जाता है। विश्व तथा भारत में अलग-अलग स्थानों पर बरगद के अलग-अलग नाम हैं। इसे अरबी में कतिरूल अश्जार और जातुज्ज वानिव, फारसी में दरख्ते रीश और दरख्ते रेशा, इंडोनेशिया में सर्द, पुर्तगाली में डी रैज और अलबेरो डी रेज़ तथा रूसी में देरेवो और फीगोवोए कहते हैं। भारतीय भाषाओं में इसे कन्नड़ में गोड़ियर, गुजराती में बड़, तमिल में आलमरम, तेलुगु में पेद्दामार, पंजाबी में बूहड़ और बोहड़, बंगाली में बड़गाछ, मराठी में वड़, वर, मलयालम में आलमरम और सिन्धी में नुग कहते हैं।
बरगद को संस्कृत में न्यग्रोथ, वट आदि नामों से जाना जाता है। वनस्पति निघन्टओं में इसके 29 नामों का उल्लेख किया गया है–अवरोही, क्षीरी, जटाल, दान्त, ध्रुव, नील, न्यग्रोथ, पदारोही, पादरोहिण, पादरोही, बहुपाद, मंडली, महाच्छाय, यक्षतरु, यक्षवासक, यक्षावास, रक्तपदा, रक्तफल, रोहिण, वट, वनस्पति, वास, विटपी, वैश्रवण, शृङ्गी, वैष्णवणावास, शिफारूह, स्कन्धज एवं स्कन्धरूह! ये सभी नाम बरगद की संरचना सम्बन्धी विशेषताओं और इसके गुणों पर आधारित हैं।

 नाम की रोचक कहानी :

बरगद को अंग्रेजी में बनियन कहते हैं। इस नाम की एक कहानी है। इराक के सागरतट पर गौम्बून में बरगद का एक पेड़ था। यहाँ के स्थानीय निवासी इसे लूल कहते थे। कुछ भारतीय इस वृक्ष के नीचे प्रायः विश्राम करते थे। इन्होंने यहाँ एक मन्दिर बनवाया और एक मूर्ति भी स्थापित कर दी तथा नियमित रूप से पूजा-पाठ आरम्भ कर दिया। इस प्रकार यह वृक्ष भारतीय व्यापारियों और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। मन्दिर का निर्माण बनिया व्यापारियों ने करवाया था, अतः लोग इस वृक्ष को बनियने का वृक्ष कहने लगे। अंग्रेजों ने इसी नाम को ले लिया और बरगद को अंग्रेजी में बनियन ट्री कहा जाने लगा। इस वृक्ष का उल्लेख टैवर्नीर, वालेंन्तिज्न, एडवर्ड आइब्ज आदि ने किया है। एक अंग्रेज महिला टिकेन ने। तो इस पर एक कविता भी लिखी थी।

बरगद उष्ण-कटिबन्धीय भागों में पाया जानेवाला एक विशाल वृक्ष है। यह भारत और पाकिस्तान सहित कुछ अन्य देशों में भी पाया जाता है। भारत में यह लगभग सभी स्थानों पर मिलता है। इसे हिमालय के तराईवाले भागों में भी देखा जा सकता है। किन्तु यह हिमालय के अधिक ऊँचाईवाले भागों में नहीं मिलता। बरगद के वृक्ष दो प्रकार से लगते हैं स्वतः और सप्रयास। बरगद के अधिकांश वृक्ष स्वतः विकसित हैं। इसके फल बड़े स्वादिष्ट होते हैं। अतः इन्हें विभिन्न प्रकार के पक्षी बड़े चाव से खाते हैं। इनकी बीट के साथ इसके बीज दूर-दूर तक पहुँच जाते हैं और अनुकूल जलवायु पाकर वृक्ष के रूप में विकसित हो जाते हैं। भारत के सभी जंगलों में पाए जानेवाले बरगद इसी प्रकार के हैं।
बरगद का वृक्ष घनी छाया प्रदान करता है। अतः इसे बहुत बड़ी संख्या में सड़कों के किनारे लगाया जाता है।

बरगद का पेड़ लगाने की विधि :

बरगद के वृक्ष दो प्रकार से लगाए जाते हैं-बीज द्वारा और शाखाओं द्वारा। बीज द्वारा बरगद लगाने के लिए इसके पके हुए बीजों को ईट या कोयले का चूरा मिलाकर छोटे-छोटे गमलों में बो देते हैं। छोटे-छोटे पौधे निकल आने के बाद इन्हें यथास्थान लगा दिया जाता है।

शाखाओं अथवा डालों द्वारा बरगद लगाने के लिए बरगद की 2.5 मीटर से लेकर 3.0 मीटर तक लम्बी शाखाएँ लेते हैं और इन्हें जनवरी से मार्च के बाद गमलों, टोकरियों अथवा लकड़ी के छोटे-छोटे बक्सों में लगा देते हैं। इस प्रकार लगाए गए वृक्षों में बरसात होने तक पानी दिया जाता है। बरसात के बाद इनका तेजी से विकास होता है। जब ये कुछ बड़े हो जाएँ तो इन्हें यथास्थान लगा देना चाहिए। कुछ लोग जुलाई-अगस्त में बरगद की टहनियाँ लगाते हैं। इन्हें अलग से पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु इस प्रकार लगाए गए बहुत से वृक्ष प्रायः सूख जाते हैं। बरगद की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक बार जड़ पकड़ लेने के बाद प्रायः सूखता नहीं है और लम्बे समय तक अस्तित्व में बना रहता है। इस पर सूखा, ओस आदि का भी बहुत कम प्रभाव पड़ता है। यह देखा गया है कि प्रतिवर्ष सूखे में बहुत से वृक्ष नष्ट हो जाते हैं, किन्तु बरगद के वृक्ष हरे-भरे बने रहते हैं।

बरगद के पेड़ की विशेषता :

बरगद एक विशाल, ऊँचा और बहुत बड़े क्षेत्र में फैलनेवाला वृक्ष है। इसकी ऊँचाई 20 मीटर से 30 मीटर तक हो सकती है। कभी-कभी इससे भी अधिक ऊँचाई वाले बरगद देखने को मिल जाते हैं। इसका तना 8-9 मीटर तक परिधिवाला हो सकता है। प्रायः यह देखा गया है कि जंगल में स्वतः विकसित बरगद के तने अधिक मोटे नहीं होते। इसके विपरीत खुले एवं सूखे स्थानों पर पाए जानेवाले बरगद के तने। अधिक मोटे होते हैं।

बरगद का तना ऊपर उठकर अनेक शाखाओं और उपशाखाओं में विभक्त हो जाता है। इसकी शाखाओं और उपशाखाओं की एक विशेषता यह है कि ये चारों ओर फैली हुई होती हैं। तने और शाखाओं की मोटाई एवं स्वरूप पर इसकी आयु का प्रभाव पड़ता है। छोटे और नए बरगद के वृक्षों का तना गोल और शाखाएँ चिकनी होती हैं तथा पुराने वृक्षों के तने और शाखाएँ खुरदरे एवं पपड़ी वाले होते हैं। इस प्रकार के वृक्षों के तनों के लम्बे-चौड़े घेरे गोल न होकर अनेक तारों जैसी जटाओं का समूह सा लगते हैं।

बरगद के तने और शाखाओं की छाल अन्य वृक्षों की छालों की अपेक्षा मोटी होती है। इसमें कोई गन्ध नहीं होती, किन्तु इसका स्वाद कसैला होता है। बरगदकी छाल की बाह्य संरचना और भीतरी संरचना में अन्तर होता है। इसकी छाल का बाहरी दो तिहाई भाग गुलाबी अथवा हलके लाल रंग का होता है तथा दानेदार होता है। जैसे-जैसे हम भीतर की ओर देखते हैं, छाल का रंग हलका होता जाता है एवं अन्त में सफेदी लिये हुए रेशेदार रूप में आ जाता है। बरगद की छाल सूखने पर धीरे-धीरे मटमैली गुलाबी होती जाती है और अन्त में हलकी भूरी हो जाती है। इसे तोड़ने पर बाहरी दो तिहाई भाग चटाक की आवाज करते हुए टूट जाता है, किन्तु भीतर का एक चौथाई भाग रेशेदार होने के कारण लचीला हो जाता है और सरलता से नहीं टूटता।

बरगद की शाखाओं से जटाएँ निकलती हैं। आरम्भ में ये पतली-पतली होती हैं और नीचे की ओर झूलती रहती हैं। कुछ समय बाद ये जमीन तक पहुँच जाती हैं और जमीन के भीतर से खाद्यरस लेने लगती हैं। धीरे-धीरे इनका विकास होता है और एक लम्बे समय बाद ये तने के समान मोटी, कठोर और मजबूत हो जाती हैं तथा वृक्ष का बोझ उठाने योग्य हो जाती हैं। बहुत पुराने बरगद के वृक्ष जटाओं से अपनी काया का बहुत अधिक विस्तार कर लेते हैं और एक लम्बे-चौड़े क्षेत्र में फैल जाते हैं। इसके तनों और जटाओं से गुफाएँ सी बन जाती हैं, जिनमें व्यक्ति बैठ सकते हैं अथवा सो सकते हैं। बरगद को इसकी लम्बी-लम्बी जटाओं के कारण ही जटाजूटधारी महात्मा कहा गया है।

बरगद की पतली-पतली डालियों पर सभी तरफ बड़े और गोलाई लिये हुए । अथवा अंडाकार पत्ते निकलते हैं, किन्तु एक स्थान से केवल एक पत्ता निकलता है। पत्तों की लम्बाई 10 सेन्टीमीटर से लेकर 20 सेन्टीमीटर तक तथा चौड़ाई 5 सेन्टीमीटर से 13 सेन्टीमीटर तक होती है। बरगद के पत्ते काफी मोटे होते हैं एवं एक छोटे से मजबूत डंठल द्वारा डाल से जुड़े रहते हैं। इनके डंठल 2.5 सेन्टीमीटर से लेकर 5 सेन्टीमीटर तक लम्बे हो सकते हैं। बरगद के पत्ते एक तरफ से चिकने होते हैं और इनका रंग गहरा हरा होता है। पत्तों के दूसरी ओर का भाग चिकना नहीं होता एवं इस ओर का रंग हलका हरा होता है। बरगद के पत्तों पर मध्य में मटमले पीले रंग की एक नस होती है। यह डंठल की ओर मोटी होती है और सिरे की तरफ पतली होती जाती है। इस नस से अनेक पतली-पतली नसें निकलती हैं और इन नसों से भी नसें निकलती हैं। इस प्रकार पत्तों पर नसों का एक जाल सा बन जाता है। ये नसें एक ओर चिकनी होती हैं तथा दूसरी ओर उभरी हुई होती हैं।

बरगद के नए पत्ते प्रायः फरवरी-मार्च में निकलते हैं। कभी-कभी सितम्बर-अक्टूबर में भी नए पत्ते निकलते हैं। इसके नए पत्ते लाली लिये हुए और बहुत सुन्दर होते हैं। बरगद की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके पत्तों का स्वरूप और आकार एक जैसा नहीं होता है। अलग-अलग वृक्षों के पत्ते लम्बाई-चौड़ाई और स्वरूप में अलग-अलग होते हैं। कुछ पत्ते अधिक लम्बे होते हैं तो कुछ कम लम्बे। कुछ पत्ते अधिक चौड़े होते हैं तो कुछ कम चौड़े। इसी प्रकार कुछ पत्ते गोलाकार होते हैं तो कुछ अंडाकार अथवा लम्बे। यह विशेषता एक ही बरगद के पत्तों में भी देखी जा सकती है। बरगद एक सदाबहार वृक्ष है। अर्थात् यह सदैव हरा-भरा रहता है। किन्तु कछ गर्म और सूखे स्थानों पर इसके पत्ते गिर जाते हैं और यह वर्ष में कुछ समय के लिए पर्णविहीन हो जाता है।

बरगद के फल का उपयोग व महत्व :

बरगद के वृक्ष पर गर्मियों के मौसम में फल आते हैं। सामान्यतया फरवरी से मई के मध्य फल आते हैं और पकते हैं। कभी-कभी सितम्बर तक ये फल देखे जा सकते हैं। कछ स्थानों पर बरगद में विलम्ब से फल निकलते हैं और दिसम्बर तक बने रहते हैं। बरगद के फल छोटे, गोल और डंठलविहीन होते हैं। ये शाखाओं पर उन्हीं स्थानों पर निकलते हैं, जहाँ पत्ते निकलते हैं। इसके फल जोड़े में निकलते हैं एवं पास-पास और घने होते हैं। वास्तव में बरगद का फल एक विशेष प्रकार का पुष्प समूह होता है, जो गोल आकार लेकर फल बन जाता है। इसका फल 1.25 सेन्टीमीटर से 1,87 सेन्टीमीटर व्यास वाला होता है। बरगद के कच्चे फल का रंग हरा होता है, जो पक जाने पर गहरे लाल रंग का हो जाता है। कुछ वृक्षों पर पीले रंग के फल देखे गए हैं।

बरगद के पके हुए फल बड़े स्वादिष्ट होते हैं। इन्हें कोयल, हारिल, पपीहा, पंडुक, तोता आदि पक्षी बड़े चाव से खाते हैं। इसके साथ ही बरगद के फल चमगादड़ों का भी प्रिय भोजन है।
कुछ लोगों का यह मानना है कि बरगद में केवल फल लगते हैं, फूल नहीं। यह एक भ्रामक तथ्य है। वास्तव में गूलर के समान बरगद के फूल इसके फल के भीतर होते हैं। बरगद के फूल बहुत छोटे होते हैं एवं नर-मादा फूल एक साथ होते हैं।

बरगद के फल के भीतर बहुत छोटे-छोटे कीड़े होते हैं। इन्हें अंजीर कीट (fig insect) कहते हैं। इन कीड़ों के अभाव में बरगद का वृक्ष बीज उत्पन्न नहीं कर सकता। ये कीड़े एक फूल से दूसरे फूल में घुसते हैं, जिससे फूल के नर-मादा क्षेत्र एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और निषेचन की क्रिया पूरी होती है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में बरगद के फूलों का परिचय दिया है।
पीपल के बीजों के समान ही बरगद के बीज स्वाभाविक रूप से बड़ी सरलता से उग जाते हैं। प्रायः पक्षी बरगद के फल खाते हैं और मकान की दीवारों, मुंडेरों, कएँ की दीवारों आदि पर बीट कर देते हैं। इससे यहाँ बरगद उग आते हैं। बरगद के बीजों में आधार पकड़ने की बड़ी क्षमता होती है। यही कारण है कि कभी-कभी यह अन्य वृक्षों पर भी अपनी जड़ें जमा लेता है। बरगद के बीज की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह स्वतः बड़ी सरलता से उग आता है, किन्तु बोने पर बड़ी कठिनाई से लगता है।

बरगद के पेड़ का महत्व  :

बरगद एक उपयोगी वृक्ष है इसके पाँचों प्रमुख अंग छाल, पत्ते, जटा, दूध और फल सभी हमारे काम आते हैं। इसकी छाल से मधुमेह की औषधि तैयार की जाती है तथा पत्तों से विभिन्न प्रकार के घावों और कुष्ठ का इलाज किया जाता है।
✦बरगद की जटाओं से दातून करने पर दाँत मजबूत होते हैं एवं पायरिया जैसे रोग जड़ से समाप्त हो जाते हैं।
✦इसकी जटाओं से बने छाते के हैंडिल तो पूरे देश में विख्यात हैं।
✦ बरगद की लकड़ी में रोमछिद्र बहुत होते हैं, अतः इससे कीमती फर्नीचर आदि नहीं बनाया जा सकता। फिर भी इसका उपयोग साधारण फर्नीचर बनाने तथा अन्य कार्यों में किया जाता है।
✦ कुछ पुराने बरगद के वृक्षों से लाख निकलता है। इसके भी अनेक उपयोग हैं। बरगद के लाख का उपयोग वार्निश, पॉलिश, प्राइमर, रंग आदि बनाने में किया जाता है। अर्थात् बरगद का आर्थिक महत्त्व भी है। अब आइए, बरगद के विभिन्न अंगों के औषधीय उपयोग की संक्षेप में चर्चा की जाए।

बरगद पेड़ के औषधीय गुण :

बरगद का औषधीय उपयोग पीपल और नीम के वृक्षों के समान तो नहीं है, किन्तु भारतीय वैद्यों ने इसके विभिन्न अंगों—अंकुर, पत्ते, कोंपल, छाल, जटा, दूध, फल आदि के कुछ औषधीय उपयोगों को संक्षेप में समझाया है। इसके विभिन्न अंगों से दो प्रकार की औषधियाँ तैयार की जाती हैं। पहले प्रकार की औषधियाँ बाह्य उपयोग के लिए होती हैं। अर्थात् इनका उपयोग तेल अथवा मलहम आदि के समान लगाने के लिए किया जाता है। कभी-कभी इनका धुआँ दिया जाता है। इस प्रकार की औषधियों को खाते नहीं हैं। दूसरे प्रकार की औषधियों का सेवन पाग, काढ़ा, फान्ट आदि के रूप में किया जाता है। इनके सेवन की मात्रा एवं समय आदि पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
बरगद के विभिन्न अंगों की सहायता से तैयार की जानेवाली औषधियाँ दो प्रकार से तैयार की जाती हैं। इसकी कुछ औषधियाँ केवल बरगद के किसी एक अंग अथवा एक से अधिक अंगों की सहायता से तैयार की जाती हैं तथा कुछ औषधियों को तैयार करने के लिए अन्य वृक्षों के अंगों अथवा पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
✥बरगद के सभी अंग औषधीय उपयोग के हैं। इसके अंगों में स्त्रियों का गर्भपात रोकने की क्षमता होती है। अतः इसकी कोंपलों, जड़ों, छाल आदि से गर्भपात से बचानेवाली औषधियाँ तैयार की जाती हैं।
✥ इसकी जटाओं के लेप से स्त्रियों के स्तन कठोर बनते हैं,
✥ इसके कोमल सिरों का उपयोग उल्टियाँ रोकनेवाली औषधियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है।
✥बरगद की जटाओं से दस्त रोकनेवाली औषधियां बनती हैं।
✥इसका फल मधुमेह के रोगी के लिए रामबाण है।
✥ बरगद के बीज शीतल और शक्तिवर्धक होते हैं। इनसे अनेक प्रकार की औषधियों का निर्माण किया जाता है।
आइए, सबसे पहले बरगद के ताजे अंकुर की चर्चा की जाए।

बरगद के अंकुर के औषधीय गुण और फायदे :

१-पुरानी खाँसी- बरगद के ताजे अंकुरों का उपयोग खाँसी दूर करने के लिए किया जाता है। इसके लिए बरगद के ताजे गीले अंकुरों को लेकर साफ कर लेते हैं। इसके बाद इनमें समान मात्रा में मैनसिल मिलाकर पीस लेते हैं और इसमें थोड़ा सा शुद्ध घी मिला लेते हैं। इस मिश्रण का धूम्रपान करने से खाँसी में लाभ होता है। वैद्यों का मत है कि यदि खाँसी पुरानी हो गई हो और सीने में जख्म हो गए हों तथा रोगी को बहुत कष्ट होता हो तो यह धूम्रपान करने से रोगी पूरी तरह कष्टों से मुक्त होकर निरोग हो जाता है।

२-गर्भपात से रक्षा – बरगद के अंकुरों का उपयोग गर्भपात रोकने में भी किया जाता है। इसके लिए बरगद के ताजे अंकुर लेकर इन्हें धोकर साफ कर लेते हैं और फिर इन्हें बकरी के दूध में मिलाते हैं। इसका उपयोग उन स्त्रियों के लिए अधिक उपयोगी होता है, जिन्हें गर्भधारण के बाद प्रायः गर्भपात हो जाता है।

३-घाव -बरगद के अंकरों से विभिन्न प्रकार के घावों की चिकित्सा की जाती है। शरीर के किसी भी भाग में सामान्य अथवा मवादवाला फोड़ा हो जाने पर इसे बरगद के अंकुरों के काढ़े से धोकर साफ करते हैं और घाव की सफाई हो जाने के बाद अंकुरों को पीसकर घाव पर बाँध देते हैं। इससे दर्द और सूजन कम होती है और शीघ्र ही घाव ठीक हो जाता है।

४-गर्भधारण-बरगद की कोंपलों और पत्तों की सहायता से अनेक प्रकार की औषधियाँ तैयार की जाती हैं। इसकी कोंपलों से गर्भधारण की औषधि तैयार की जाती है। यदि किसी स्त्री को बार-बार गर्भपात होता हो तो उसे बरगद की ताजी कोंपलों को पानी में पीसकर पीना चाहिए। इससे गर्भपात नहीं होता और गर्भ ठहर जाता है। कभी-कभी गर्भ ठहर जाने के तीसरे या चौथे महीने खून आने लगता है। ऐसा होने पर गर्भवती स्त्री को बरगद की कोंपलों को शुद्ध घी अथवा दूध में पकाना चाहिए और इस मिश्रण को ठंडा हो जाने पर इसमें रुई डुबोकर अपनी योनि में रखना चाहिए। इसके साथ ही यही दूध अथवा घी 6 ग्राम से 12 ग्राम तक स्त्री को पिलाना चाहिए। बरगद की कोंपलों का काढ़ा बनाकर मीठे दूध के साथ सेवन करने से भी लाभ होता है।

५-बुखार -बरगद के पत्तों में ज्वरनाशक गुण होता है। इसके पीले पत्तों को भुने हुए चावलों के साथ धीमी आँच में पकाकर काढ़ा बनाया जाता है। इस काढ़े को पिलाने से पुराने से पुराना बुखार उतर जाता है। इस औषधि का उपयोग सभी प्रकार के ज्चर रोगों में किया जा सकता है।

६-गुदा मार्ग में कष्ट -कभी-कभी तेज गर्म पानी, अम्ल अथवा नमक का एनीमा लेने पर गुदा मार्ग में कष्ट हो जाता है तथा प्रायः खून आने लगता है। ऐसा होने पर बरगद के ताजे पत्ते लेकर साफ कर लेते हैं और इन्हें कुचलकर शुद्ध घी में पकाते हैं। अच्छी तरह पक जाने के बाद उतारकर ठंडा कर लेते हैं और इसे बकरी के दूध में मिलाकर एनीमा देते हैं। इससे रोगी को शीघ्र लाभ होता है।

७-रक्त प्रदर-बरगद की कोंपलों का प्रभाव शीतल होता है। इनका उपयोग रक्त प्रदर जैसी बीमारियों में किया जाता है। इसकी मुलायम ताजी कोंपलों के काढ़े में दूध और शक्कर मिलाकर पीने से रक्त प्रदर समाप्त हो जाता है।

८-दस्त –बरगद की मुलायम कोंपलों की सहायता से दस्त रोके जा सकते हैं। इसके लिए इसकी ताजी कोंपलें लेकर इन्हें साफ कर लेते हैं और चावल के माँड़ के साथ अच्छी तरह पीस लेते हैं। इस मिश्रण को लस्सी के साथ पीने से दस्त के रोगी को लाभ होता है।

९-फोड़े-फुंसी –बरगद की कोंपलों और पत्तों का उपयोग सामान्य फोड़े और पीप वाले फोड़े की चिकित्सा में भी किया जाता है। इसकी कोंपलों को पीसकर इसमें शुद्ध घी मिलाकर घाव पर लेप करने से घाव ठीक हो जाता है। इसके पत्तों से घाव की सिंकाई करके और फिर इन्हीं पत्तों को कुचलकर घाव पर बाँधने से भी घाव की सूजन कम हो जाती है और घाव के दर्द में आराम मिलता है और धीरे-धीरे घाव ठीक हो जाता है।

१०-खून को रोकने में- शरीर के किसी भी भाग से बहते हुए खून को रोकने के लिए बरगद के कोमल पत्तों को बहुत बारीक पीसकर शहद के साथ चटाते हैं। पत्तों का काढ़ा भी शरीर से बहते हुए खून को रोकने का कार्य करता है। गुदा मार्ग से आनेवाले खून को रोकने में बरगद की कॉपलों के साथ पकाया हुआ दूध विशेष रूप से उपयोगी होता है।

बरगद की छाल के औषधीय गुण और फायदे :

१-गर्भपात से रक्षा –बरगद की छाल बड़ी उपयोगी होती है। बरगद के अन्य अंगों के समान ही इसकी छाल में भी गर्भधारण करने की क्षमता का विकास करने का गुण होता है। यदि किसी स्त्री को बार-बार गर्भपात हो जाता है तो उसे बरगद की ताजा छाल साफ करके पानी के साथ पीसकर पीना चाहिए। इससे गर्भपात की आशंका कम हो जाती है।

२-रक्त प्रदर- बरगद की छाल का उपयोग रक्त प्रदर में भी किया जाता है। इसके लिए बरगद की छाल के काटे में मीठा दूध मिलाकर रोगी को पिलाते हैं। बरगद की छाल के काढ़े में लोध की लुगदी मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है।

३-मधुमेह-बरगद की छाल मधुमेह के रोगी के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है। इसकी छाल का काढ़ा बहुमूत्र के रोगी के लिए विशेष रूप से उपयोगी होता है। मधुमेह और बहमुत्र के रोगी को बरगद की छाल के फान्ट से भी विशेष लाभ होता है। वैद्यों का मत है कि बरगद की छाल से तैयार की गई औषधियाँ रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) कम करने का कार्य करती हैं।

४- स्वप्नदोष-बरगद की छाल के काढ़े का उपयोग करने से वीर्य सम्बन्धी अनेक बीमारियाँ समाप्त हो जाती हैं। यह शीघ्र पतन और स्वप्नदोष में विशेष उपयोगी है।

५-खून को रोकने में –शरीर से बाहर निकलते हुए खून को रोकने के लिए भी बरगद की छाल का उपयोग किया जाता है। इसके लिए रोगी को बरगद की छाल का काढ़ा पिलाया जाता है। वैद्यों का मत है कि छाल के काढ़े के स्थान पर बरगद के पत्तों के काढ़े का उपयोग किया जा सकता है।

बरगद की जटाओं के औषधीय गुण और फायदे :

१-बाँझपन दूर करने में –बरगद की जटाएँ बरगद का महत्त्वपूर्ण अंग है। इनकी सहायता से अनेक प्रकार की औषधियाँ तैयार की जाती हैं। बरगद की जटाओं की सहायता से बाँझ स्त्री को सन्तान प्रदान करनेवाली औषधि तैयार की जाती है। इसके लिए बरगद की ताजी जटाओं को साफ करके पीस लेते हैं। पुष्य नक्षत्र के शुक्ल पक्ष में मासिक धर्म पूरा हो जाने के तुरन्त बाद बाँझ स्त्री द्वारा इसका सेवन करने से गर्भ ठहर जाता है।

२-रक्त प्रदर और श्वेतप्रदर-बरगद की जटाओं से रक्त प्रदर और श्वेतप्रदर की औषधि तैयार की जाती है। इसके लिए बरगद की ताजी जटाएँ लेकर इन्हें साफ कर लेते हैं और इनका काढ़ा अथवा लुगदी (कल्क) तैयार करते हैं। इसके काढ़े अथवा कल्क के साथ पकाए गए शुद्ध घी का सेवन करने से श्वेतप्रदर और रक्त प्रदर के रोगी को लाभ होता है।

३-गठिया –बरगद की जटाओं का उपयोग गठिया की औषधि तैयार करने के लिए किया जाता है। इसके लिए इसकी ताजी जटाएँ लाकर इन्हें साफ कर लेते हैं और फिर इनका काढ़ा तैयार कर लेते हैं। इस काढ़े का सुबह-शाम सेवन करने से गठिया के रोगी को लाभ होता है।

बरगद के दूध के औषधीय गुण और फायदे :

बरगद एक क्षीरी वृक्ष है। अर्थात् इस वृक्ष से हमें दूध प्राप्त होता है। बरगद के दूध का उपयोग अनेक प्रकार की औषधियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है।
१-बवासीर-बरगद का दूध अपने आप में भी एक औषधि है। इसका बताशे के साथ सेवन करने से बवासीर के रोगी को लाभ होता है।

२-स्वप्नदोष और शीघ्रपतन-बरगद के दूध से शुक्राणुओं को शक्तिशाली बनानेवाली और वीर्यस्तम्भन की अनेक औषधियाँ तैयार की जाती हैं। बरगद के दूध की 4-5 बूंदें बताशे के साथ एक माह तक सेवन करने से वीर्य दोष दूर हो जाते हैं। स्वप्नदोष और शीघ्रपतन के रोगी के लिए यह विशेष रूप से हितकारी है।

३- वीर्य सम्बन्धी विकार-वीर्यस्तम्भन के लिए बरगद के दूध से एक विशेष औषधि का निर्माण किया जाता है। इसके लिए बरगद के दूध में अफीम और जायफल बहुत अच्छी तरह घोंटकर आटे की लोई की तरह का कठोर पेस्ट तैयार कर लेते हैं और इसकी गोलियाँ बना लेते हैं। इन गोलियों का सेवन करने से स्तम्भन क्षमता बढ़ती है और वीर्य सम्बन्धी विकार नष्ट होते हैं।

४-दर्द के इलाज में –बरगद का दूध दर्द दूर करनेवाला होता है। इसका उपयोग शरीर के विभिन्न भागों के सूजन वाले स्थानों का दर्द दूर करने के लिए किया जाता है। जोड़ों के दर्द, गठिया, आमवात आदि में प्रभावित स्थान पर बरगद के दूध का लेप करने से लाभ होता है।

५-घाव – बरगद का दूध विभिन्न प्रकार के घाव भरने और घावों के आसपास की सूजन से मुक्ति दिलाने का कार्य करता है। इसका लेप सर्दियों में हाथ-पैरों की फटनेवाली त्वचा, पैरों की एड़ियों और घावों के आसपास की सूजन आदि पर लाभदायक होता है। बरगद का दुध घावों में पड़ जानेवाले कृमियों का नाश करता है। इसका लेप सुबह, दोपहर और शाम के समय करने पर घावों के कीड़े पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं, घाव के आसपास की सूजन कम हो जाती है तथा धीरे-धीरे घाव भरने लगता है। पीपदार फोड़े (विधि) पर भी इसका लेप किया जा सकता है।

६-कुष्ठ रोग- बरगद का दूध कुष्ठ रोगों की रामबाण औषधि है। यह गम्भीर से गम्भीर और पुराने से पुराना कुष्ठ रोग ठीक कर देता है। इसके लिए कुष्ठ प्रभावित भाग को साफ करके उस पर बरगद के दूध का लेप करना चाहिए और इस पर बरगद की छाल की लुगदी (कल्क) बनाकर बाँधना चाहिए। यह उपचार एक सप्ताह से दो सप्ताह तक किया जाना चाहिए।

७-आँख का फूला –बरगद के दूध के और भी अनेक औषधीय उपयोग हैं। इसमें कपूर घिसकर आँख में लगाने से आँख का फूला (एक प्रकार का रोग) समाप्त हो जाता है। बरगद का दूध कान में टपकाने से कान के कीड़े मर जाते हैं। यह कान के दर्द और कान के घावों में बहुत उपयोगी हैं। बरगद का दूध दाँतों में लगाने से दाँतों को लाभ होता है तथा दाँत दर्द कम हो जाता है। इससे मसूढ़ों की मालिश करने पर मसूढ़े स्वस्थ बनते हैं और दाँतों से खुन आना बन्द हो जाता है।

बरगद पेड़ के अन्य उपयोग :

✼बरगद के विभिन्न अंगों का औषधीय महत्त्व तो है ही। इसके साथ-ही-साथ इसका व्यावसायिक महत्त्व भी है। प्राचीनकाल में इसकी जटाओं के कोमल अंकुर और फल राजाओं और क्षत्रियों द्वारा भोजन के रूप में उपयोग में लाए जाते थे। इनके उपयोग से इनमें क्षत्रियोचित गुणों का विकास होता था। वर्तमान समय में भी अकाल के समय बरगद के विभिन्न अंगों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है।

✼पलाश के पत्तों के समान बरगद के पत्तों का उपयोग भी दोना-पत्तल बनाने में किया जाता है। कुछ पालतू पशु और वन्य जीव बरगद के पत्ते और कोमल शाखाएँ बड़े स्वाद से खाते हैं।

✼बरगद के मुख्य तनों और इसकी जटाओं की लकड़ी बड़ी उपयोगी होती है। यह पानी में भीग जाने पर शीघ्र खराब नहीं होती। अतः इससे कुएँ का आधार तैयार किया जाता है। बरगद की लकड़ी का उपयोग सस्ते फर्नीचर, बक्से, खिड़की-दरवाजे आदि बनाने के लिए किया जाता है। इसकी जटाओं की लकड़ी के बने डंडे और छतरियों के हंडिल बहुत अच्छे माने जाते हैं।
बरगद का धार्मिक महत्त्व होने के कारण बहुत से लोग इसे काटना पाप समझते हैं तथा इसकी लकड़ी से बनी वस्तुओं का उपयोग नहीं करते हैं अथवा बहुत कम करते हैं। बरगद की लकड़ी अधिक टिकाऊ नहीं होती है, अतः इसकी बनाई गई वस्तुओं की माँग कम है।