Dikamali ke Fayde | डिकामाली के फायदे ,गुण ,उपयोग और नुकसान

Last Updated on May 3, 2020 by admin

डिकामाली क्या है ? : What is Dikamali in Hindi

डिकामाली एक प्रकार का गोंद है जो एक छोटे वृक्ष से प्राप्त किया जाता है। इसके ये वृक्ष पार्वत्य प्रदेशों में विशेषतः कोंकण, सौराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि में होते हैं। मध्यप्रदेश एवं बिहार में भी ये पाये जाते हैं। यह मंजिष्ठाकुल (रूबिएसी) की वनौषधि है।

डिकामाली पेड़ का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Dikamali Tree in Different Languages

Dikamali Tree in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – नाडीहिंगु, हिंगुपत्री, हिंगुशिवाटिका, रामठी
  • हिन्दी (Hindi) – डिकामाली, डीकामाली
  • गुजराती (Gujarati) – डेकामारी, मालण
  • मराठी (Marathi) – डीकेमाली
  • बंगाली (Bangali) – हिंगुविशेष
  • तेलगु (Telugu) – तेलभंगा
  • तामिल (Tamil) – डिकामलपी
  • कन्नड़ (kannada) – डिक्केमल्ली
  • अंग्रेजी (English) – व्हाइट इमेटिक नट
  • लैटिन (Latin) – गार्डिनिया गम्मिफेरा (Gardenia Gummifera)

डिकामाली का पेड़ कैसा होता है ? :

डिकामाली का छोटा वृक्ष 5-6 फुट ऊँचा होता है। कोई-कोई वृक्ष 10-15 फुट ऊँचा भी पाया जाता है। इस वृक्ष से बहुत सी शाखायें निकलती हैं। ये शाखायें और काण्ड टेढ़े-मेढ़े होते हैं।

डिकामाली के पत्ते – इसके पत्र 3 से 8 इंच लम्बे होते हैं। पत्र के डंठल के बीच में दो छोटे छोटे उप पत्र होते हैं हइसके पत्र अमरूद के पत्तों के समान होते हैं किन्तु ये उनसे बड़े होते हैं।

डिकामाली के फूल – पुष्प-बसंत में आते हैं जो रंग में सफेद होते हैं। ये पुष्प प्रायः कनेर के पुष्प जैसे होते हैं जो सायंकाल में खिलते हैं। इन पुष्पों से अच्छी सुगन्ध फैलती है। थोड़े समय बाद ही ये पुष्प पीले होकर सूखने लगते हैं। फूलों की मोहक सुगन्ध के कारण ही गुजरात में इसे मालण कहा जाता है।

डिकामाली के फल – इसके फल अमरूद फल जैसे किन्तु छोटे, गोल होते हैं जिनके ऊपरी पृष्ठ भाग पर अनेक धारियां होती हैं। इन फलों में तीन-चार कोष्ठ होते हैं जिनमें बहुत से बीज होते हैं। कोंकण की ओर इन फलों को खाते हैं तथा इनका अचार बनाते हैं।

डिकामाली की गोंद (निर्यास) – इन वृक्षों की कोमल शाखाओं के मध्य भाग से तथा कलियों में से, पत्तों के टूटने से शाखाओं के पृष्ठ भाग से, शीत काल में एक हरिताभ पीतवर्ण का गोंद (निर्यास) निकलता है। यह गोंद हवा लगने पर सूखकर इन स्थानों पर जम जाता है। इस गोंद को ही डिकामाली कहा जाता है। यह गोंद कुछ दुर्गन्धयुक्त होता है, इसमें हींग के समान गन्ध आती है।

इस गोंद को अंग्रेजी में Cumbigum या Diamali Gum या Dikamali Region कहते हैं। लैटिन नाम में जो गम्मीफेरा शब्द है उसका अर्थ भी ‘गोंद देने वाला’ होता है। गम्मीफेरा के पहले जो ‘गाडिनिया’ शब्द है यह अलेक्जेंडर गार्डिन नामक वनौषधि विशेषज्ञ के नाम से सम्बन्ध रखता है।

डिकामाली पेड़ के प्रकार :

डिकामाली की दो जातियां पायी जाती हैं। इसकी एक दूसरी जाति का वृक्ष अनेक शाखा और अनेक पत्तों से युक्त होता है। जो 10 से 25 फुट तक ऊँचा होता है। पूर्वोक्त डीकामाली के अभाव में इसका गोंद ही उपयोग में लाया जाता है। इसका लैटिन नाम गार्डिनिया ल्युसिडा है। ल्युसिडा (Lucida) का अर्थ कांच के समान चमकदार होता है।

डिकामाली का रासायनिक विश्लेषण : Dikamali Chemical Constituents

डिकामाली में दो प्रकार के रालद्रव्य पाये जाते हैं। गार्डिनिन और डिकामाली। इनके अतिरिक्त एक उड़नशील तैल स्वल्पांश में होता है।

डिकामाली के पेड़ का उपयोगी भाग : Beneficial Part of Dikamali Tree in Hindi

निर्यास (गोंद)

सेवन की मात्रा :

250 मि.ग्रा. से 500 मि.ग्रा. ।

शोधन :

बाजार में जो डिकामाली गोंद मिलता है उसमें डंठल व अन्य कूड़ा मिला रहता है अत: औषधि प्रयोग से पूर्व इसे गरम पानी में घोलकर, छानकर शुष्क कर लें।

डिकामाली के औषधीय गुण : Dikamali ke Gun in Hindi

रस – कटु तिक्त।
गुण – लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण।
वीर्य – उष्ण
विपाक – कटु
दोषकर्म – कफवात शामक

  1. वैद्यावतंस चरक संहिता के ग्रहणी चिकित्सा अध्याय में हिंगुशिवाटिका (डिकामाली) नाम आया है। आचार्य चरक ने डिकामाली को आमनाशक के रूप मे ग्रहणी रोग में प्रयुक्त किया है। इसे ‘मनोमोहादिनाशिनी’ भी कहा है।
  2. वास्तव में यह मानसिक विकारों की उत्तम औषधि है।
  3. चरक संहिता के उन्माद चिकित्सा प्रसंग में भी हिंगुशिवाटिका (डिकामाली) का उल्लेख मिलता है।
  4. इसके अतिरिक्त अपस्मार प्रकरण मे हिंगुपत्री नाम से लिखा है जिसे चक्रपाणि ने वंशपत्री के नाम से स्पष्ट किया है। बाद के निघन्टुकारों ने भी डिकामाली को वंशपत्री नाम दिया है। किन्तु “हिंगुपत्री गुणा: विज्ञैर्वंशपत्रीव कीर्तिता” भावमिश्र के इस कथन पर आचार्य श्री कृष्ण प्रसाद त्रिवेदी लिखते हैं कि-“आयुर्वेद में इसी नाड़ी हिंगु के समकक्ष वंशपत्री या वेणुपत्री का उल्लेख पाया जाता है। संभव है हींग का पेड़ जिस कुल का है, उसकी अन्य जाति के कुछ पेड़ों के पत्र बांस के पत्र जैसे ही दिखाई देते हों, तथा उन्हीं में से यह वंशपत्री हो, जिसके गुणधर्म नाडीहिंगु (डीकामाली) के समान ही बतलाये जाते हैं।
  5. इसके विषय में श्री शालिग्राम जी लिखते हैं कि यह गुजरात में अधिकता से उत्पन्न होती है। वहाँ इसे मालड़ी कहते हैं। इसके पत्र मौगरे के समान, पुष्प-श्वेत, फल पोस्त के डोंडे की तरह लगते हैं। इसके गोंद को डीकामारी कहते है।
  6. डिकामाली उत्तम आमपाचक तथा कोष्ठवातहर औषधि है।
  7. यह रोचन, दीपन पाचन के साथ कृमिघ्न भी है।
  8. गण्डपद कृमि ( राउन्ड वोर्म) को मारने के लिये डिकामाली को विशेषतः उपयोग में लाते हैं।
  9. लेखन होने से डिकामाली को मेदोरोग में देते हैं।
  10. विषमज्वर के रोगी को इसे देने से ज्वर का वेग शान्त होता है तथा शैत्य, कम्प आदि लक्षण कम होते हैं।
  11. जीर्ण कास, श्वास, हिक्का, चर्मविकार, हृदय दौर्बल्य, प्लीहावृद्धि, दन्तशूल आदि रोगों में भी यह लाभप्रद है।
  12. वेदनायुक्त अंगों पर इसका लेप वेदना को दूर करता है तथा व्रणों पर लगाने से यह व्रणों का रोपण करती हैं।

डिकामाली के फायदे और उपयोग : Benefits of Dikamali in Hindi

कृमिरोग में डिकामाली का उपयोग फायदेमंद

डीकामाली 250 मि.ग्रा., हींग और एलवा 125-125 मि.ग्रा., हल्दी और खुरासानी अजवायन एक-एक ग्राम लेकर इसमें थोड़ी शक्कर मिलाकर ऊपर से गर्म पानी पिलावें। इस प्रयोग से दस्त के साथ नष्ट हये कृमि निकल जाते हैं।

( और पढ़े – पेट के कीड़े दूर करने के घरेलू उपचार )

वात रोग मिटाए डीकामाली का उपयोग

डीकामाली,कालानमक,अजवायन, हींग, जीरा और सोंठ बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर रखलें। दो तीन ग्राम चूर्ण सेवन करने से पेट में गैस बनना और इस गैस के कारण होने वाले शिरःशूल, उर्ध्ववात आदि उपद्रव दूर होते हैं।

बवासीर ठीक करे डीकामाली का प्रयोग

डीकामाली के साथ हरड चूर्ण सेवन करना चाहिए तथा डीकामाली का मस्सों पर लेप करना चाहिये।

( और पढ़े – खूनी बवासीर का रामबाण इलाज )

घाव के उपचार में डीकामाली से फायदा

व्रण पर डीकामाली का बारीक चूर्ण बुरकावें अथवा इस चूर्ण को घृत में मिलाकर लगावें। इससे व्रण का शोधन, रोपण तथा दुष्ट कृमियों का नाश होता है।

पेट दर्द में डीकामाली का उपयोग लाभदायक

डीकामाली के चूर्ण को अदरक के रस और नीबू के रस में मिलाकर सेवन करने से उदरशूल दूर होता है। इससे अपचन, छर्दि (उल्टी), आध्मान (पेट फूलना) आदि भी मिटते है।

( और पढ़े – पेट दर्द का घरेलू इलाज )

उन्माद मिटाए डीकामाली का उपयोग

इसके साथ इलायची और ब्राह्मी मिलाकर सिद्ध किया हुआ घृत आचार्य चरक ने उन्माद में लाभप्रद कहा है।

नारू रोग ठीक करे डीकामाली का प्रयोग

जिन रोगियों को गिनी वर्म (कृमि) निकलता हो उन्हें 500 मि.ग्रा. डिकामाली के साथ 250 मि.ग्रा. हींग मिलाकर गर्म पानी से देना चाहिए।

सरदर्द में डीकामाली का उपयोग लाभदायक

डीकामाली को तेल में मिलाकर गरम कर सिर पर मर्दन करें।

उल्टी (छर्दि) रोकने में फायदेमंद डीकामाली का औषधीय गुण

डिकामाली चूर्ण को नीबू के रस में मिलाकर कुछ गरम कर चटावें।

डिकामाली के इस्तेमाल से पेट फूलना (आध्मान) रोग में लाभ

एक नीबू को काटकर उसकी एक फांक पर डीकामाली चूर्ण बुरककर अंगारों पर नींबू को रखकर इसके बाद चूसना चाहिए ऐसा दो-तीन बार करें। इससे आध्मान, अजीर्ण, डकारें अधिक आना, मुंह से पानी निकलना आदि उदर रोगों में लाभ होता है। यह यकृत और प्लीहा के रोगों में भी उपयोगी है।

बुखार (ज्वर) मिटाता है डिकामाली

डीकामाली, सैंधानमक और कालीमिर्च के चूर्ण को नींबू की फांक पर बुरक कर फिर गरम कर चूसने से विषमज्वर एवं श्लैष्मिक ज्वर में लाभ मिलता है।

खाँसी (कास) दूर करने में डिकामाली फायदेमंद

डीकामाली और वासापत्र का क्वाथ बनाकर सेवन करने से सूखी खांसी मिटती है।

बालकों के रोगों में लाभकारी डिकामाली

(क) बालकों के अतिसार, ज्वर में डिकामाली को पानी में घिसकर पिलाते हैं।

(ख) बालक के मसूढ़ों पर डीकामाली के चूर्ण को शहद में मिलाकर दिन में तीन चार बार मलने से दांत आसानी से आते हैं। दांत आते समय होने वाले उल्टी, दस्त, बुखार में भी यह उपयोगी है।

(ग) बालकों के आध्मान (पेट फूलना) एवं मलावरोध (कब्ज) में इसे सेवन कराने तथा पेट पर इसका लेप करने से बिना कष्ट के अपान वायु एवं मल का नि:सरण हो जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात में बालकों के रोगों में यह एक घरेलू औषधि के रूप में प्रयुक्त की जाती है।
डीकामाली के साथ हींग और एलुवा को थोड़े जल में मिलाकर थोड़ा गरम कर नाभि के आस-पास उदर पर लेप करने से पेट का आफरा मिटता है और मल मूत्र की शुद्धि हो जाती है। बालकों के डब्बारोग में यह लेप उनकी छाती पर करना चाहिये।

(घ) डिकामाली और बायविडंग 120-120 ग्राम, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोया व छोटी इलायची के दाने 15-15 ग्राम सबको मिलाकर 2.5 लीटर पानी में उबाल कर चतुर्थांश क्वाथ करें। फिर छान कर एक किलो 125 ग्राम शक्कर और 250 मि.ग्रा. केशर मिलाकर शर्बत तैयार कर लें। तैयार होने पर तुरन्त छानकर फिर शीतल होने पर बोतल में भर लें। इसमें से एक छोटा चम्मच शर्बत बालकों को दिन में दो बार पिलाने से उनके स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

यह दीपन-पाचन, रोचन, सारक, कृमिघ्न एवं बल्य सौम्य-स्वादिष्ट सुगन्धित शर्बत है। बच्चों के दांत आते समय होने वाले विकारों में भी यह लाभप्रद है। यदि बालक सूखा रोग (बालशोष) से पीड़ित हो तो सुधाषट्क योग 200 से 500 मि.ग्रा. के साथ इस शर्बत का सेवन कराना चाहिये। यह शर्बत रसतंत्रसार (कालेड़ा) के भाग दो में वर्णित है।

( और पढ़े – बच्चों के रोग और उनका घरेलू इलाज )

जानवरों के दूषित व्रण के उपचार में डिकामाली लाभदायक

(क) जानवरों के कृमियुक्त दूषित व्रण या क्षत पर भी डिकामाली के महीन चूर्ण को व्रण में भर देते हैं तथा दूसरे दिन इसके क्वाथ से या गरम पानी से धोकर पुन: चूर्ण को भरते हैं। इस प्रकार तीन चार दिनों तक करने से व्रण अच्छा हो जाता है।

(ख) डिकामाली पीसकर करंज तैल में मिलाकर जानवरों के घावों पर लगाने से भी सारे कीड़े नष्ट होकर घाव शीघ्र भरने लगता है।

विशेष-

  1. डिकामाली नवीन अधिक उपयोगी है। एक वर्ष से अधिक पुरानी उपयोगी नहीं रहती।
  2. डिकामाली का प्रयोग प्रात: काल करना अधिक हितकारक कहा गया है।
  3. दो वर्ष से छोटे बच्चों को डिकामाली का चूर्ण माता के या गाय के दूध के साथ देना चाहिए।
  4. उदर शुद्धि के लिये इसकी मात्रा 2-3 ग्राम तक भी दी जाती है किन्तु इसके सेवन काल में स्निग्ध पदार्थ (घी ,तेल इत्यादि) भी दें।

डिफ्थीरिया (रोहिणी) पर एक अनुभव

मेरी पत्नी भयानक ज्वर से संत्रस्त हो गई और यह ज्वर जब बढ़ता ही गया तो डाक्टर को दिखलाने पर उसका निदान डिफ्थीरिया किया गया। हम सभी घर वाले इस रोग का नाम सुनते ही घबराने लगे। तभी घोर निराशा के अन्धकार को चीरकर प्रज्वलित दीप के समान हमारे ही ग्राम के निवासी पूज्य नन्दलाल जी परसाई आये और उन्होंने एक बंगला पान मंगवाया। पान को पोंछकर उस पर हल्का सा घी चुपड़कर अपने पास रखा बारीक चूर्ण (डीकामाली चूर्ण) लगभग 2 ग्राम बुरक कर बीड़ा बनाया और मेरी पत्नी को देते हुये कहा-बेटी, बिल्कुल मत घबरा, इसे खूब कड़ा जीकर चबाती और थूक निगलती रहना। मेरी पत्नी ने साहस बटोर कर बीड़ा चबाया। पीक निगलने में पहले तो काफी कष्ट हुआ, पर थोड़ा-थोड़ा पीक अन्दर चला ही गया। थोड़ी देर बाद थूक कंठ से नीचे उतरने लगा। थोड़ा ज्वर-वेग भी घटा। तीन घन्टे बाद परसाई जी ने उक्त अनुसार फिर दवा दी। शाम तक ज्वर 100 डिग्री रह गया। इसके बाद मूंग की दाल का पानी पिलाया। इसके एक घन्टा बाद एक गिलास कुनकुना दूध मिश्री मिलाकर पिलाया। जिसे उसने किसी अड़चन के बिना ही पीलिया। रात में पुन: एक बीड़ा उसी प्रकार दिया गया। सुबह पत्नी का ज्वर सामान्य था। केवल गले में थोड़ा कष्ट था। चार-पांच दिनों में पत्नी के गले में जमे हुये पूय युक्त गले की श्लेष्मिक कला के टुकड़े बाहर निकले और गला बिल्कुल नीरोग हो गया।

परसाई जी ने बताया था कि इस दवा के तीन से अधिक बीड़े नहीं देने चाहिये। यदि आवश्यकता ही आ पड़े, तो 36 घन्टे या 24 घन्टे बाद एक बीड़ा और दे सकते हैं। डीकामाली एक से 16 वर्ष की आयु वालों को बंगलापान पर घी चुपड़कर एक-एक ग्राम तथा इससे कम आयु के बच्चों को 500 मि.ग्रा. से 750 मि.ग्रा. तक उक्त विधि से हर तीन घन्टे के बाद देनी चाहिये। इसके सेवन के उपरान्त स्वस्थ होने वाले व्यक्ति को दूध घी मलाई आदि स्निग्ध पदार्थों का सेवन पाचन शक्ति के अनुसार कुछ दिनों तक कराना चाहिये। वैसे यह कोई अन्य विकार नहीं करती किन्तु गर्म-खुश्क होने से नेत्रों मे जलन, मंदाग्नि एवं भ्रम पैदा कर सकती है। स्निग्ध द्रव्यों के सेवन से ये विकार नहीं होते। रोगमुक्ति के पश्चात् भी लगभग बीस दिनों तक सौंफ के बारीक चूर्ण में बराबर मिश्री मिलाकर एक-दो चम्मच सेवन कर ऊपर इलायची युक्त दूध पीना चाहिए। – श्री ठा. बनवीर सिंह चातक

डिकामाली के दुष्प्रभाव : Dikamali ke Nuksan in Hindi

  • डिकामाली लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • डिकामाली को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

Leave a Comment

Share to...