गुग्गुल के गुण ,उपयोग ,फायदे और नुकसान | Guggul ke Fayde aur Nuksan in Hindi

गुग्गुल क्या है ? : Guggul in Hindi

गुग्गुल एक वृक्ष से निकलने वाला गोंद होता है। ‘गुजो व्याधेर्गडति रक्षति‘-के अनुसार व्याधि से रक्षा करने वाला होने से इसे गुग्गुलु कहा है। इसका एक नाम ‘पलंकष‘ है क्योंकि यह ‘पलं मांसं कषति हिनस्ति‘ के अनुसार स्थूलता को कम करने वाला होता है। भैंस की आंख जैसा कृष्ण वर्ण का होने से इसे ‘महिषाक्ष‘ भी कहते हैं।

इस गुग्गुल से ही महायोगराज गुग्गुलु, कैशोर गुग्गुलु, चन्द्र प्रभावटी आदि योग बनाये जाते हैं। त्रिफला गुग्गुल, गोक्षरादि गुग्गुल, सिंहनाद गुग्गुल और चन्द्रप्रभा गुग्गुल आदि योगों में भी यह प्रमुख द्रव्य प्रयुक्त होता है।

नया गुग्गुल पौष्टिक और यौनशक्तिवर्द्धक होता है। यह चिकना, सुवर्ण जैसा, पकी जामुन के रंग जैसा, सुगन्धित और पिच्छिल होता है।

पुराना गुग्गुल सूखा, दुर्गन्धयुक्त, स्वाभाविक रंग और गन्ध से रहित तथा गुणहीन होता है। इसमें कंकर-पत्थर या कचरा नहीं होना चाहिए। जो गुग्गुल भौरे या काजल की तरह काले रंग का होता है उसे महिषाक्ष, जो बहुत नीले रंग का होता है उसे महानील, जिसका रंग कुमुद की तरह कान्तिपूर्ण हो उसे कमद. जो माणिक्य की तरह चमकदार हो उसे पद्म और जो सोने के रंग जैसा हो उसे हिरण्य गुग्गुल कहते हैं। यह हिरण्य गुग्गुल ही मनुष्योपयोगी औषधियों में प्रयोग किया जाता है कुछ विद्वानों के मतानुसार महिषाक्ष गुग्गुल भी मनुष्योपयोगी माना गया है।

गुग्गुल के वृक्ष भारत, अरब, बलोचिस्तान और अफ्रीका देश में पैदा होते हैं। चार फ़िट से छः फ़िट तक की ऊंचाई वाला गुग्गुल का वृक्ष बारहों महिने जीवित रहता है। इसके वृक्ष का गोंद (गुग्गुल) ही प्रयोग में लिया जाता है।

आयुर्वेद में गुग्गुल के प्रकार : Types of Guggul in Ayurveda

आयुर्वेद ने इसके पांच भेद इस प्रकार बताये हैं –
(१) महिषाक्ष (२) महानील (३) कुमुद (४) पद्म और (५) हिरण्य। इनमें पहले दो हाथियों के लिए, बाद के दो घोड़ों के लिए और पांचवां विशेषकर मनुष्य के लिए उपयोगी होता है।
भाव प्रकाश निघण्टु में लिखा है –

गुग्गुलुर्विशदस्तिक्तो वीर्योष्णः पित्तलः सरः ।
कषायः कटुकः पाके कटुरुक्षो लघुः परः ।।
भग्न सन्धानकृवृष्यः सूक्ष्मस्वर्यो रसायनः ।
दीपनः पिच्छिलो बल्यः कफवातव्रणापचीः ।।
मेदोमेहाश्मवातांश्च क्लेदकुष्ठाम मारूतान ।
पिडकाग्रन्थिशोफार्मो गण्डमाला कमीञ्जयेत्।।
माधुर्य्याच्छमयेद्वातं कषायत्वाच्च पित्तहा।
तिक्तत्वात्कफजित्तेन गुग्गुलुः सर्वदोषहा।।

भाषा भेद से नाम भेद :

✦ संस्कृत – गुग्गुलु।
✦ हिन्दी – गुग्गुल ।
✦ मराठी – गुग्गुल ।
✦ गुजराती – गुगल ।
✦ बंगला – गुगुल।
✦ कन्नड़ – काण्डगण, इवडोल।
✦ तेलगु – महिषाक्षी।
✦ तामिल – गुक्कल ।
✦ फारसी – बूएजहूदान ।
✦ इंगलिश – गम गुग्गुल (Gum Guggul)
✦ लैटिन – कॉमिफोरा मुकुल Commiphora Mukul)

गुग्गुल के गुण : Guggul ke Gun in Hindi

☛ गुग्गुल स्वच्छ, कड़वा और उष्णवीर्य होता है ।
☛ यह पित्तकारक, दस्तावरं, कषैला, चरपरा और पाक में कटु होता है ।
☛ गुग्गुल रूखा, अत्यन्त हलका तथा टूटी हुई हड्डी को जोड़ने वाला होता है ।
☛ यह वीर्यकारक, सूक्ष्म, स्वर के लिए हितकारी, रसायन है ।
☛ गुग्गुल अग्नि प्रदीप्त करने वाला, चिकना और बलवर्द्धक होता है ।
☛ यह कफ, वात व व्रण (घाव) को ठीक करता है ।
☛ यह अपच, चर्बी, प्रमेह व पथरी को नष्ट करता है ।
☛ यह क्लेद, कुष्ठ, आमवात और पीड़िका (फुसियां) मिटाता है ।
☛ गुग्गुल गांठ, सूजन, बवासीर, गण्डमाला तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला है।
☛ गुग्गुल स्निग्ध होने से वात का, कसैला होने से पित्त का और कड़वा होने से कफ का शमन करता है इस तरह यह त्रिदोष शामक होता है।

असली और नकली गुग्गुल की पहचान : Asli aur Nakli Guggul ki Pahchan in Hind

गुग्गुल को ज्यों का त्यों प्रयोग में नहीं लिया जाता बल्कि विशेष शोधन विधि से शुद्ध करके ही प्रयोग में लिया जाता है गुग्गुल में मिलावटी (भ्रष्टाचारी) लोग कई प्रकार की मिलावटें करके बेचते हैं और अक्सर सालर वृक्ष के गोंद को भी गुग्गुल के नाम से बेचा करते हैं।

असली नया गुग्गुल सोने जैसे पीले रंग का और पुराना होने पर काले रंग का होता है जबकि सालर के गोंद वाला गुग्गुल, जिसे साली गुग्गुल भी बोला जाता है, लाल रंग का होता है।

असली गुग्गुल के टुकड़ों को तोड़ने से वे झट टूट जाते हैं और आग पर रखने से एक दम से नहीं जलते बल्कि फूलते हैं फिर बारीक-बारीक टुकड़े फूटते हैं जबकि सालर का गुग्गुल (गोंद) आग पर रखने से जल जाता है।

गुग्गुल के फायदे और उपयोग : Guggul Benefits and Uses in Hindi

कीटाणुओं के नाश में लाभकारी है गुग्गुल का प्रयोग –

ताज़ा गुग्गुल उत्तेजक, कीटाणुनाशक और कफ तथा वात का शमन करने वाला होता है अतः प्रौढ़ एवं वृद्ध आयु के दुर्बल, कफ के रोगी और दुबले लोगों के लिए इसका प्रयोग गुणकारी होता है।

त्वचा रोगों में गुग्गुल से फायदा –

यह त्वचा के रोग दूर कर उसे कान्तिपूर्ण और सुन्दर बनाता है ।

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वात रोगों में गुग्गुल के इस्तेमाल से फायदा –

स्त्रियों के गर्भाशय को बल देने व मासिक धर्म के अवरोध को दूर करने, पाण्डु रोग (Anaemia) याने रक्ताल्पता दूर करने, घाव भरने, वातजन्य विकार एवं शूल नष्ट करने के लिए बनाये गये नुस्खों में प्रमुख द्रव्य का काम करता है।

गर्भाशय को बल देता है गुग्गुल का उपयोग –

स्नायविक संस्थान और स्त्रियों के गर्भाशय को बल देने में गुग्गुल बहुत अच्छा काम करता है।

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अनेक व्याधियों को नष्ट करने में गुग्गुल करता है मदद –

प्रसिद्ध योग- ‘महायोगराज गुग्गुल’ गुग्गुल का सबसे अच्छा और अनेक व्याधियों को नष्ट करने वाला योग है। इस योग का प्रमुख घटक द्रव्य त्रिफला (हरड़ बहेड़ा आंवला) है जो गुग्गुल की उष्णता और उग्रता को कम करके हितकारी गुणों की वृद्धि करता है।

महायोगराज गुग्गुल का मुख्य घटक है गुग्गुल –

गुग्गुल से बनाया हुआ ‘महायोगराज गुग्गुल’ बहुत प्रकार के रोगों को नष्ट करने वाला होता है बशर्ते इसमें प्रयोग किया गुग्गुल, त्रिफला, अन्य औषधियां तथा आठों प्रकार की भस्में आदि सभी असली और उच्च श्रेणी की हों।
आठों भस्मों (रस सिन्दूर, स्वर्ण, चांदी, बंग, नाग, लोह, अभ्रक और मण्डूर भस्म) के बिना बनाये गये योग को ‘लघु योगराज गुग्गुल’ या ‘योगराज गुग्गुल’ कहते हैं।

गुग्गुल से निर्मित आयुर्वेदिक दवा(योग) और उनके फायदे :

आयुर्वेद में गुग्गुलु (गुग्गुल) के १६-१७ योग दिये गये हैं जिनमें महायोगराज, योगराज, किशोर, गोक्षरादि, सिंहनाद और चंद्रप्रभा वटी के नाम उल्लेखनीय हैं। ये योग आयुर्वेदिक औषधि निर्माता कम्पनियों द्वारा बनाये हुए बाज़ार में मिलते हैं। यहां कुछ चुने हुए योगों के प्रयोग का उपयोगी विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है –

1- महायोगराज गुग्गुलु के लाभ –

सब प्रकार के वात रोगों जैसे आमवात सन्धिवात, जोड़ों की सूजन और पीडा, जोड़ों के दर्द की चिकित्सा में शहद के साथ दो गोली मिलाकर खाने और महा रास्नादि क्वाथ बना कर पीने से लाभ होता है। महारास्नादि क्वाथ अनुपान द्रव्य होने के साथ ही सर्वांगवात, कम्पवात, अर्धांगवात, साइटिका आमवात, पक्षाघात और कमर व जांघों के दर्द आदि व्याधियों को नष्ट करने वाला आयुर्वेदिक योग है ।

इसके अनुपान के साथ योगराज गुग्गुलु का प्रयोग करना मानो सोने पर सोहागा होना है। महारास्नादि क्वाथ २० ग्राम लेकर २ कप पानी में डाल कर इतना उबालें कि आधा कप बचे। इसे छान लें। योगराज या महायोगराज गुग्गुल की २ गोली शहद में मिलाकर चाट लें और ऊपर से यह क्वाथ आधा सुबह, आधा शाम को पी लें। लगातार कुछ दिनों तक इस योग का सेवन करने से सभी वात व्याधियां नष्ट हो जाती हैं। महायोगराज गुग्गुलु एक दिव्य औषधि है। स्त्रियों के गर्भाशय दोष और दौर्बल्य को दूर करती है।

( और पढ़े – योगराज गुग्गुलु के बेमिसाल फायदे )

2- किशोर गुग्गुल के लाभ –

रक्तविकार, वातरक्त, आमवात, शोथ और उदर रोग आदि के लिए २-२ गोली सुबह शाम जल या दूध के साथ सेवन करने से लाभ होता है।

3- गोक्षरादिगुग्गुल के लाभ –

मूत्रदाह, मूत्रावरोध (पेशाब में रुकावट) और सुज़ाक रोग में २-२ गोली सुबह शाम जल या दूध के साथ लेने से लाभ होता है।

4- सिंहनाद गुग्गुल के लाभ –

जीर्ण आमवात, तिल्ली बढ़ जाने, श्वास खांसी, वातरक्त, शूल, सूजन, बवासीर, संग्रहणी, पाण्डु रोग आदि दूर करने के लिए २-२ गोली सुबह शाम जल के साथ लेना चाहिए।

5- चन्द्रप्रभा वटी के लाभ –

गुग्गुल के संयोग से बनी यह वटी सब प्रकार के मूत्र रोगों के लिए श्रेष्ठ लाभदायक औषधि है । यह मूत्रदाह, मूत्र में रुकावट, प्रमेह, भगन्दर, सूज़ाक, गर्भस्राव, गर्भपात, वृक्क शोथ (गुर्दे में सूजन) मूत्र में रेती और पस सेल्स जाना आदि व्याधियों के लिए इस वटी को, २-२ गोली सुबह शाम शहद के साथ लगातार सेवन करने से लाभ होता है।
यह वीर्यविकार, यौनदौर्बल्य, यौन विकार, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, उत्तेजना व कठोरता में कमी आदि व्याधियों को दूर कर पौरुषशक्ति बढ़ाती है। स्त्रियों के शरीर को कान्तिमय और बलवान बनाती है, मासिक धर्म की अनियमितता, कष्टार्तव और शरीर में दर्द होना व कमज़ोरी आदि को दूर करती है।

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गुग्गुल के सेवन में सावधानियाँ :

गुग्गुल युक्त औषधि का सेवन करते हुए खटाई, तेज़ मिर्च मसाले, शराब, तीखे पदार्थ, भारी गरिष्ट भोजन, अतिश्रम या व्यायाम, स्त्री सहवास, क्रोध और गर्मी का सेवन क़तई न करें।

गुग्गुल के नुकसान : Guggul Side Effects in Hindi

☛ गुग्गुल केवल चिकित्सक की देखरेख में लिया जाना चाहिए।
☛ पुराना गुग्गुल गुणहीन होता है अतः ताज़ा ही लेना चाहिए।
☛ पुराना गुग्गुल शरीर को दुर्बल करने वाला और हानिकारक होता है।
☛ गुग्गुल के अनुचित प्रयोग से यकृत और फेफडे को हानि होती है ।
☛ अति सेवन से आंखों के सामने अंधेरा आना, मुंह सूखना, दुबलापन, मूर्छा, शिथिलता और रूखापन पैदा होता है अतः इसका अधिक मात्रा में सेवन न करके यथोचित मात्रा में लम्बे समय तक सेवन करना चाहिए।