कस्तूरी क्या है ? : Kasturi in Hindi

असली कस्तूरी एक विशेष जाति के हिरण के निस्राव वाही कोष का सूखा हुआ रस है। यह जानवर चीन, आसाम, रशिया, नेपाल, दार्जिलिंग तथा हिमालय के दूसरे हिस्सों में आठ हजार फीट की ऊंचाई तक जंगलों में पाया जाता है । इस की सुगन्ध मादाओं को नर की तरफ खींचने वाली होती है। कस्तूरी करीब एक महीने तक उनकी ग्रन्थियों में रहती है । कस्तूरी की तादाद जानवरों की उम्र के अनुसार भिन्न-भिन्न रहती है । छोटे बच्चों की ग्रन्थियों में यह बिलकुल नहीं पाई जाती । दो वर्ष के बच्चों की ग्रन्थियों में करीब तीन तोला कस्तुरी रहती है। किन्तु यह अपरिपक्व हालत में होती है और इसकी गंध भी अप्रिय रहती है। पूरी उम्र के जानवर में प्रायः दो औंस की तादाद में कस्तूरी प्राप्त होती है। किन्तु साधारण तौर से एक तोले से लेकर डेड़ तोले तक कस्तूरी प्रत्येक हिस्से में पाई जाती है। यह एक चौकोर या गोल थैली में जिस का कि व्यास करीब डेढ़ इञ्च के होता है बन्द रहती है । इसके ऊपर का धरातल चपटा और फिसलना होता है और भीतर कुछ कड़े बाल रहते हैं। इसके थोड़ा सा मुंह रहता है ।

दिव्य कस्तरी की तादाद कम रहती है । इसकी सुगन्ध इतनी मस्त होती है कि दूर दूर तक फैल जाती है और यह कहा जाता है कि शिकारी लोग भी इतकी मस्त सुगन्ध में सुध-बुध भूल जाते हैं । क्योंकि यह आंख, नाक और स्नायु मंडल पर दूषित असर डालती है । चीनी व्यापारियों का कथन है कि इस प्रकार की कस्तूरी पकड़े हुए जानवरों से प्राप्त नहीं की जा सकती । यह हिरण समुदाय के उठने बैठने के निश्चित स्थानों पर पाई जाती है । हरिण अपने खुरों से उन ग्रन्थियों को तोड़ डालता है और कस्तूरी को जमीन पर बिखेर देता है । परन्तु इस किस्म की कस्तूरी प्राप्त करना बहुत कठिन बात है और बाजार में इस जाति की कस्तूरी पाई भी नहीं जाती ।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

संस्कृत-मृगनाम, कस्तूरी । हिन्दी – कस्तूरी । बङ्गाली-मृगनाभि । मराठी–कस्तूरी । गुजराती-कस्तूरी । अंग्रेजी-Musk । फारसी-मुश्क । अरबी-मिस्क । लेटिन-Moschus Moschiferus ( मासकस मासकी फेरस ) ।

कस्तूरी के समान अन्य सुगन्धित तत्व :

कर्नल चोपरा लिखते हैं कि कस्तूरी के समान सुगन्धित तत्वे दूसरे जानवरों और वनस्पतियों में भी जो कि संसार के भिन्न-भिन्न भागों में होते हैं, प्राप्त किये जा सकते हैं।
उदाहरणार्थ -एण्टीकोप डार्कस (Anticope dorcas) जो कि एक प्रकार का हिरण होता है और कपर इबेक्स (Capra Ibex ) नामक एक बकरे का सूखा हुआ रक्त कस्तूरी की तरह ही सुगन्ध देता है । ओबीवस मस्केटस (Obibosmoschatus ) नामक एक प्रकार के साँड़ में भी इसकी सुगन्ध पाई जाती है । इसके अतिरिक्त ( Anas moschatus ) अनास मास्कटा नामक बतख जो कि गोल्डकॉस्ट, जमेका और सेइन में पाई जाती है उसमें तथा ( Crocodipus Balgaris ) क्रोकोडिपस बल गेरिस नामक एक प्रकार के मगर में भी इसकी सुगन्ध पाई जाती है । कुछ भारतीय सर्पो और सामुद्रिक कछुओं में भी कस्तूरी के समान सुगन्ध होती है।
इसी प्रकार कई वनस्पतियाँ भी ऐसी होती हैं जिसमें इसी के समान सुगन्धित तत्व पाये जाते हैं। फिर भी इस वस्तु का खास उत्पत्तिस्थान हिरन ही है ।

कस्तूरी के प्रकार :

आयुर्वेदिक ग्रन्थों में कस्तूरी के कई प्रकार के भेद बतलाएँ हैं। वर्ण की दृष्टि से यह तीन प्रकार की होती है । कपिल वर्ण, पिंगल वर्ण और कृष्णवर्ण । नेपाल में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी कपिल वर्ण अर्थात् भूरे रंग की होती है। काश्मीर में उत्पन्न होने वाली पिगल वर्ण की होती है । कामरूप अर्थात् आसाम देश की कस्तूरी काले रंग की होती है। किन्तु भाव मिश्र ने नेपाल देश की कस्तूरी को नीले रंग की और काश्मीर की कस्तूरी को कपिल वर्ण की लिखा है । आसाम देश में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी उत्तम, नेपाल की कस्तूरी मध्यम और काश्मीर की कस्तूरी अधम होती है ।
इसके अतिरिक्त खरिका, तिलका, कुलित्था, पिंडा और नायिका के भेद से कस्तूरी पाँच प्रकार की मानी जाती है ।

व्यापारिक क्षेत्र में तीन प्रकार की कस्तूरी मानी जाती है । पहली रशिया की कस्तूरी । इसकी सुगन्ध बहुत मामूली होती है इसलिये इसकी कोई तारीफ नहीं। दूसरी आसाम की कस्तूरी इसकी सुगन्ध बहुत मस्त होती है। और इसकी कीमत भी रशिया की कस्तूरी से अधिक आती है। आयुर्वेद ग्रन्थों में इसका वर्णन कामरूप कस्तूरी के नाम से किया गया है । यह रंग में काली होती है और प्राप्त होने वाली कस्तूरी की जातियों में यह सर्वोत्तम मानी जाती है। तीसरी चीन की कस्तूरी। यह बहुत ऊँची कीमत की होती है । कारण कि इसमें किसी प्रकार की अग्राह्य गन्ध नहीं होती । चीन की भेजी हुई कस्तूरी तिब्बत में आती है और वहाँ से मंगोलिया, मंचूरिया इत्यादि स्थानों पर जाती हैं ।

असली कस्तूरी की पहचान :

कस्तूरी की माँग अधिक होने से और इसकी कीमत ऊँची होने से इसमें कई प्रकार की मिलावटें कर दी जाती हैं। सूखा हुआ खून, यकृत, कई प्रकार की वनस्पतियाँ, गेहूँ और जौ के दाने भी इसको तैयार करते समय इस में मिला दिये जाते हैं । कस्तूरी अपनी सुगन्ध दूसरी वस्तुओं को जल्दी दे देती है । इसलिये केवल सुगन्ध की परीक्षा से इसकी असलियत जानना कठिन है।
1- चीन और तिब्बत में इसकी परीक्षा के कई तरीके प्रचलित हैं। इसके कुछ दाने लेकर पानी में डाले जाते हैं। अगर वे उस में वैसे ही रह जायें तो कस्तूरी शुद्ध मानी जाती है और अगर ये पानी में घुल जायें तो कस्तुरी बनावटी समझी जाती है।
2- इसी तरह से यदि धधकते हुए अंगारे पर इसके दाने डाले जाये और वे पिघल कर बबूले देने लगे तो कस्तूरी असली मानी जाती है और अगर वे जलकर राख हो जायें तो बनावटी समझी जाती है ।
3- असली कस्तूरी स्पर्श करने से मुलायम होती है और बनावटी सरूत मालूम होती है ।
4- पंजाब के अन्दर इसको जाँच करने की दूसरी प्रथा है । एक धागे को हींग में तर करके फिर उसे कस्तूरी में से निकालते हैं। अगर हींग की गन्ध नष्ट हो जाय तो कस्तूरी असली मानते हैं ।
फ्रांस के कुछ रासायनिकों ने असली कस्तूरी की तरह एक ऐसी कस्तुरी को तैयार करने का प्रयत्न किया है। जो गुण और धर्म में असली कस्तूरी ही की तरह होती है और इसके प्रतिनिधि द्रव्य की तरह काम में ली जा सकती है। जिन तत्वों की मदद से यह तैयार की जाती है उसमें ट्रिनीटोव्यूटिल टोलवल ( Trinitrobutil Tolwal ) नामक पदार्थ मुख्य है । इसकी सुगन्ध असली कस्तूरी से मिलती जुलती है ।

कस्तूरी के गुण, दोष(नुकसान) और प्रभाव :

आयुर्वेदिक मत-
• आयुर्वेदिक मत से कस्तूरी कामोद्दीपक, धातु परिवर्तक, नेत्रों को लाभ पहुँचाने वाली है ।
• यह किलास, कुष्ठ, मुखरोग, कफ, दुर्गन्ध, दरिद्रता, वात, तृषा, मूछा, शोष, विष, खांसी और शीत का नाश करने वाली है।

कस्तूरी पर यूनानी मत-
• यूनानी मत से यह दूसरे दर्जे में गरम और तीसरे दर्जे में खुश्क होती है ।
• यूनानी चिकित्सा पद्धति में यह वस्तु बहुत महत्त्वपूर्ण मानी गई है। दिल, दिमाग, स्नायु मंडल, कामेन्द्रिय इत्यादि शरीर के तमाम अंगों को ताकत देने वाली मानी जाती है ।
• यह विष को नष्ट करने की शक्ति भी इस में रहती है ।
• इसके सघने से जुकाम, नजला और सिरदर्द को फायदा होता है ।
• आँख में आँजने से धुन्ध और जाला कट जाता है ।
• इसको योनि में रखने से गर्भ टिक जाता है ।
• हृदय रोग, मालीखोलिया, हिस्टीरिया और मृगी पर भी इसके प्रयोग से बहुत लाभ होता है
• हृदय की खराबी की वजह से सांस लेने में जो कठिनाई पैदा हो जाती है उसमें इस में ट्रिक्चर* की दस-दस बूद पन्द्रह-पन्द्रह मिनिट के अन्तर से ४ से ५ बार देने में बड़ी शान्ति मिलती है ।
नोट -एक औंस रेक्टिफाइड स्पिरिट में तीन रत्ती कस्तूरी मिलाने से कस्तूरी का टिक्चर तैयार हो जाता है ।

• खाँसी, दमा, कफ के दोष, अरुचि, मुंह की बदबू, पीलिया, दृष्टि की कमजोरी, मुह की झांई, शरीर का मोटापन, सुजाक, क्षय, पुरानी खाँसी, कमजोरी और नामर्दी में कस्तूरी के प्रयोग से बहुत लाभ होता है ।
• यह गरम प्रकृति वालों के लिये और गरम मौसम में हानिकारक होती है ।
• इसको ज्यादा खाने से चेहरा पीला पड़ जाता है । ज्यादा सूघने से दिमाग में हानि पहुँचाती है । हमेशा खाने से मुंह में बदबू पैदा करती है और बुद्धि को भ्रष्ट करती है । यह दाँतों को भी हानिकारक है । इसके दर्प को नष्ट करने के लिए कपूर का प्रयोग करना चाहिये ।

सेवन की मात्रा :

इसकी मात्रा आधी रत्ती से दो रत्ती तक की है ।

रासायनिक विश्लेषण :

✦कस्तूरी पानी के अन्दर ५० सैकड़ा और अल कोहल में १० से कड़ी घुलती है ।
✦इसमें अमोनिया ( Aminonia ), एलेइन ( Alein ), चोलेसटेरिन ( Cholesterin ), फैट ( Fat ), वैक्स ( Wax ), गलेटिनस (Celatinous ), और अल्बुमिनस ( Albuminous ) नामक पदार्थ पाये जाते हैं।
✦इससे एक प्रकार का क्षार भी रहता है जिसमें क्लोरिडस अफ सोडियम ( Chlorides of Sodium ) पोटेसियम (Patassium) और कैलसियम ( Calcium ) नामक पदार्थ पाये जाते हैं ।
✦ इससे एक प्रकार का तेल भी प्राप्त किया जाता है जो कि मस्कोन (fiskone ) के नाम से प्रसिद्ध है। यह इसकी सुगन्ध शक्ति के लिये बहुत मशहूर है । इसके नजदीक वाली हर एक वस्तु इसकी सुगन्ध से आक्रांत हो जाती है। यह कई सुगन्धित पदार्थों को स्थायी शक्ति देने के लिए काम में लिया जाता है । इस तेल की सुगन्ध कपूर, कड़ी बदाम, लहसन इत्यादि पदार्थों के सम्मेलन से नष्ट हो जाती है ।

औषधि विज्ञान में कस्तूरी की उपयोगिता /फायदे :

1-कस्तूरी भारतीय वैद्यों के द्वारा बहुत प्राचीन काल से उपयोग में ली जा रही है । वे इसे उत्तेजक और खासकर हृदयोत्तेजक मानते हैं । यह कामोद्दीपक तथा ज्वर, खाँसी, दुर्बलता, नपुंसकता, आक्षेप, और शूल निवारक मानी जाती है । हृदयोत्तेजक औषधि के रूप में इसकी तारीफ इतनी अधिक है कि जब सब औषधियाँ असफल हो जाती हैं, तब वैद्य इसी का सहारा लेते हैं । हृदय को उत्तेजना देने के लिए कभी कभी तो यह स्वतन्त्र रूप में और कभी मकरध्वज के साथ में दी जाती है । यह मस्तिष्क, श्वासप्रणाली, रक्तवाहिनी शिरा और स्नायु-मंडल पर अपना उत्तेजक प्रभाव दिखलाती है । इससे शरीर में और धमनियों में कुछ वेग पैदा हो जाता है, यह वेग पेशाब और पसीना आने पर कम हो जाता है । पुरुषत्व हीनता, अग्नि मान्द्य, बृहदन्त्र प्रदाह और बच्चों के आक्षेप में इस वस्तु को बड़ी तारीफ है ।

2-यूरोप और पश्चिमी देशों के अन्दर कस्तूरी सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में औषधि-रूप में उपयोग में ली जाने लगी । तभी से कई बीमारियों में जैसे आन्त्रज्वर, तन्द्रायुक्त सन्निपात, गठिया, तनाव, धनुस्तम्भ, हड़काव, अपस्मार, कुक्कुर खांसी, कंपवात, हिचकी, श्वास, उदरशूल इत्यादि रोगों में ली जाने लगी ।

3- सन् १९०५ में कुकशेंक ने केन्द्रीय स्नायुमंडल के विषैले प्रभाव में इसकी उपयोगिता के पक्ष में अपना मत जाहिर किया। उन्होने पिसी हुई कस्तुरी ५ ग्रेन की मात्रा में प्रत्येक दो घण्टे के बाद सन्तोषजनक रूप में ली।

4-बच्चों के तनाव में जिसमें कि कोई खास निदान नहीं किया जा सकता है यह वस्तु कोरल हैड्राज के साथ में दी जाती है । स्टिल ने सन् १९०६ में कोरल हैड्रोज ५ से १० ग्रेन तक और कस्तूरी का टिक्चर १० से ३० बूद तक मिलाकर दोनों का सम्मिलित

इन्जेक्शन देने की राय दी । यह वस्तु रक्त प्रवाह की गिरती हुई गति और हृदय की धड़कन पर दी जाती है । ऐसा विश्वास है कि यह रक्तभार और नाड़ी की गति को बढ़ाती है।

5-काश्मीर के डाक्टर मित्रा ने प्लेग जनित हृदय की दुर्बलता पर इसे बहुत उपयोगी पाया । इन्होंने पिसी हुई कस्तूरी को भी बहुत लाभ के साथ उपयोग में लिया ।
मगर अब इस वस्तु की उपयोगिता के सम्बन्ध में यह विश्वास दिन प्रतिदिन बदलता जा रहा है और इसी के परिणाम स्वरूप पहले जहाँ यह वस्तु ब्रिटिश फमकोपिया और यूनाइटेट स्टेट्स के फमकोपिया में सम्मत मानी गई थी वहाँ अब यह दोनों ही फर्माकोपिया में सम्मत नहीं मानी जाती है ।
कस्तूरी का टिनर हिन्दुस्तान में अब भी १० से ३० मिनिम तक हृदय को उत्तेजना देने के काम में लिया जाता है । यह राय मंडल की दबी हुई हालत में भी उपयोग में ली जाती है, और यह कामोद्दीपक भी मानी जाती है । हमने इसके सम्बन्ध में जो परीक्षण और अनुभव किये हैं, उनसे इसके हृदय पौष्टिक गुण और रक्त के श्वेत. परमाणुओं को बढ़ाने वाले गुण सिद्ध नहीं होते हैं । इससे जो भी उत्तेजक असर होता है, वह इसकी तीव्र गन्ध के कारण घ्राणेन्द्रिय के जरिये अथवा उदर की स्लेष्मिक झिल्लियों पर इसके प्रादाहिक प्रभावों के कारण होता है ।

6-यह बात पहले बतलाई जा चुकी है कि जिन बीमारों को कस्तूरी दी गई थी, उन्हें शरीर में कुछ गरमी और पेट में कुछ हलकापन मालूम हुआ ! हृदय और सास की उत्तेजना इसी का प्रतिबिम्बित प्रभाव मालूम होता है ।

7-गुल्म वायु में इसका प्रभाव उतना ही है जितना कि हींग, व्हेलेराइन इत्यादि तीव्र गन्ध वाले पदार्थों का होता है ।

8-कुक्कुर खांसी और अन्त्रशूल में इसका प्रभाव इसेन्शियल अइल यक्त वस्तुओं के प्रभाव की तरह होता है । इसके सम्बन्ध में जो भी अध्ययन हमने किये हैं उससे हम इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि भारत वर्ष की देशी औषधियों में कस्तूरी को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया गया है। इसमें शरीरक्रिया विज्ञान और चिकित्सा-विज्ञान की दृष्टि से कोई विशेष गुण नहीं है।

कस्तूरी से निर्मित आयुर्वेदिक दवा :

मृगनाभ्यादिक वटी-

बढ़िया कस्तूरी ३ माशे, अनबिन्धे मोती ६ माशे, सोने के वर्क डेढ़ माशा, चाँदी के वर्क साढे चार माशा, केशर ६ माशा, वंशलोचन १० माशा, छोटी इलायची के दाने साढ़े सात माशे। जायफल ९ माशे और जावित्री १ तोला इस सब औषधियों में से मोतियों को १२ घण्टे तक गुलाब जल में घोटना चाहिये, बाद में सोने-चांदी के वर्क डालकर ३ घण्टे तक घोटना चाहिए । फिर वंशलोचन आदि शेष औषधियों को कूट-पीस और छानकर उसी खरल में डाल देना चाहिये और नागरबेल के पान का रस डालकर ३६ घण्टे तक घोटना चाहिये । उसके बाद मटर के समान गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लेना चाहिये ।

लाभ –
चिकित्सा ग्रन्थ में लिखते हैं कि रोगी की धातु कैसी ही कम हो गयी हो, धातु की कमी से ,वीर्य की कमी से जो नामर्द हो गया हो तो इन गोलियों से वह अच्छा हो जायगा । इन गोलियों को १ से २ तक की मात्रा में मलाई के साथ देनी चाहिये ।

नोट :- ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने।