मांसपेशियों का रोग मायस्थेनिया ग्रेविस – Myasthenia Gravis in Hindi

मायस्थेनिया ग्रेविस एक प्रकार का ऑटोइम्यून रोग है, जो सभी आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है। यह मुख्यतः 40 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं तथा 50-70 वर्ष में स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है। फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन को 1983 में इस व्याधि से ग्रस्त पाया गया था। इसके अलावा ब्राजील के चेस ग्रैन्डमास्टर हेनरिक मेकिंग (Henrique Mecking) को भी यह रोग हुआ था।

कुछ पीड़ितों में यह रोग आनुवंशिक कारणों से भी हो सकता है। प्रतिवर्ष हर 10 लाख की संख्या में से 3 से 30 लोगों में यह रोग पाया जाता है। इस प्रकार के रोगी के रिश्तेदारों में रोग प्रतिरोधक शक्ति की कमी के अन्य रोग होते हैं।

मायस्थेनिया ग्रेविस रोग क्या है? (What is Myasthenia Gravis in Hindi)

मायस्थेनिया ग्रेविस के बारे में जानकारी देने वाले 1672 में प्रथम वैज्ञानिक थॉमस विलीस, सेम्यूल विलीन, अर्ब व गोल्डफ्लेम थे। 1895 में जर्मन फिजिशियन जॉली ने इसे Mysthenia Gravis Pseudo Paralytic नाम दिया। 1934 में मैरी वॉकर ने मायस्थेनिया ग्रेविस के रोगी का उपचार फाइसोस्टिग्मीन (Physostigmine) द्वारा किया। इसके बाद 1960 में सिम्पसन नैस्ट्रक ने रोग की ऑटोइम्यून (Auto immune) प्रकृति की जानकारी दी। 1973 में पैट्रिक लिंडस्ट्राम ने खरगोश में Purified Muscle like Acetyl Choline Receptor से टीकाकरण (Immunization) कर मायस्थेनिया ग्रेविस के लक्षणों को उत्पन्न किया।

मांसपेशियां होती हैं प्रभावित –

यह मांसपेशियों व नाड़ियों के समूह (Neuromuscular Complex) का रोग है, जिससे मांसपेशियों में कमजोरी व थकान होती है। अधिकांश रुग्णों में यह ऑटोइम्युन रोग से निर्मित एंटीबॉडीज (Circulating Antibodies) की वजह से होता है, जो AcetyICholine Receptors को रोक देता है। इस वजह से मांसपेशियों के संकुचन का कार्य ठीक से नहीं हो पाता ।

एसिटिल कोलीन न्यूरोट्रांसमीटर है, जो कि शरीर के विभिन्न टिशूज तक न्यूरल सिग्नल देने के लिए जिम्मेदार होता है। अतः मांसपेशियों के संकुचन के लिए एसिटिल कोलीन का न्यूरो मस्कुलर जंक्शन से पार होकर मांसपेशी में स्थित एसिटिल कोलीन रिसेप्टर से जुड़ना जरुरी है।
इस रोग में एन्टीबॉडीज एसिटिल कोलीन रिसेप्टर से एन्टीबॉडीज एसिटिल कोलीन के समान कार्य करती हैं। एसिटिल कोलीन को कार्य करने के लिए रिसेप्टर उपलब्ध नहीं होने के कारण मांसपेशी अपना संकुचन कार्य ठीक से नहीं कर पाती।

मायस्थेनिया ग्रेविस के कारण क्या हैं ? (Myasthenia Gravis Causes in Hindi)

ऐसा माना जाता है कि मायस्थेनिया ग्रेविस कुछ जीन्स में विकृति (परिवर्तन) होने से होता है। जब शरीर की रोग प्रतिकारक शक्ति का कार्य ठीक से नहीं होता, तब वह शरीर के ऊतकों को आक्रान्त कर एन्टीबॉडीज बनाता है। ये एन्टीबॉडी शरीर के नार्मल प्रोटीन को आक्रान्त करते हैं, विशेषतः एसीटिल कोलीन रिसेप्टर या मसल स्पेसिफिक काइनेस (Muscle Specific Kinase) इससे प्रभावित होते हैं।
शरीर में स्थित थाइमस ग्लैंड के कोष शरीर की रोग प्रतिकारक शक्ति निर्मित करते हैं।
मायस्थेनिया ग्रेविस के रुग्ण में थाइमस ग्लैंड के कोषाणुओं में वृद्धि (Hyperplasia) होती है तथा 10% के लगभग रोगियों में थाइमोमा (Thymorma) भी पाया जाता है।

मायस्थेनिया ग्रेविस के लक्षण क्या है ? (Myasthenia Gravis Symptoms in Hindi )

यह रोग नेत्र, मुख-छिद्र, चेहरे, गले, कंठ आदि ऊर्ध्व जत्रुगत ऐच्छिक मांसपेशियों में विशेषतः होता है। मायस्थेनिया ग्रेविस में सबसे पहले मांसपेशियों में बिना दर्द की कमजोरी पाई जाती है। प्रारंभ में ऐसा लगता है कि कोई एक मांसपेशी थोड़ा श्रम करने से ही शीघ्र थक जाती है और कुछ काल आराम देने से फिर वह ठीक हो जाती है। यह मांसपेशियों की कमजोरी शारीरिक कार्य (Physical Activity) से ज्यादा बढ़ती जाती है, आराम करने से ठीक होती है। दिन के अंतिम प्रहर में यह कमजोरी व थकावट ज्यादा हो जाती है। इसकी शुरुआत आंखों की मांसपेशियों से होती है। धीरे-धीरे यह कमजोरी पूरे शरीर में होती है। दैनंदिन जीवन के कार्य करते समय हाथ-पैरों की मांसपेशियों में भी कमजोरी महसूस होती है।

कुछ लक्षणों से मायस्थेनिया ग्रेविस का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जैसे –

1). नेत्र – दो तिहाई रुग्णों में रोग की शुरुआत में नेत्र के चारों और की मासपेशियां कमजोर होती हैं। इसके कारण रोगी को टोसिस (Ptosis) नामक नेत्र रोग होता है, जिससे पलकें झुकी हुई रहती है। डिप्लोपिया (Diplopia) का प्रकोप भी संभव है,जिसमें वस्तुएं डबल नजर आती हैं। सुबह आंखें ठीक होती हैं, सायंकाल उनमें Ptosis का रोग हुआ प्रतीत होता है। रात को आराम करने के बाद सुबह तक यह लक्षण शांत हो जाता है और अगले दिन फिर सायंकाल तक प्रकट हो जाता है।

टेलीविजन देखते समय, पढ़ते या गाड़ी चलाते समय आंख में कमजोरी के लक्षण बढ़ते जाते हैं। कुछ लोग उपरोक्त ब्राइटनेस से बचाव के लिए सनग्लास पहनते हैं। आंखों की इस प्रकार की कमजोरी को आक्यूलर मायस्थेनिया ग्रेविस (ocular Myasthenia Gravis) कहते हैं। इसमें आंखों की 3 प्रकार की मांसपेशियां आक्रान्त होती हैं। Extraocular muscles, Levator palpebrae Superioris & Orbicularis Oculi quant पश्चात सार्वदेहिक प्रकार का मायस्थेनिया ग्रेविस होता है, जिसमें पूरा शरीर आक्रान्त होता है।

2). मुख – मुखछिद्र की मांसपेशी अर्थात् Orbicularis Oris में शिथिलता हो जाने से मुखछिद्र को बंद करना मुश्किल हो जाता है। उसके लिए सीटी बजा सकना, फूंक मारना या मुंह में सिगरेट को पकड़ना कठिन हो जाता है। सायंकाल के वक्त रोगी का चेहरा देखने में भावहीन-सा लगता है। इससे ग्रस्त महिलाओं को लिपस्टिक लगाने में तकलीफ होती है।

3). खाना खाने में कष्ट – निगलने में सहायक मांसपेशियों की कमजोरी से रोगी को आहार निगलने में कष्ट होता है। आहार निगलने की क्रिया के पश्चात कुछ आहार अंश मुंह में रह जाता है या आहार व तरल पदार्थ गले में जाने की बजाय पलटकर नाक से निकलते हैं। जबड़ों की हलचल में सहायक मांसपेशियों की कमजोरी से चबाने में तकलीफ होती है। ऐसे रुग्ण को कठोर पदार्थ चबाने में बहुत ज्यादा कष्ट होता है। इस प्रकार के अधिकांश रुग्णों को निगलने, चबाने व बात करने में कष्ट होता है।

4). आवाज (स्वर) में बाधा – बोलने के लिए उपयोगी मांसपेशियों में कमजोरी से रोगी को बात करने में अड़चन होती है, जिसे डिस्आथ्रिया व हॉइपोफोनिया (Dysarthria & Hypophonia) कहते हैं। इसमें आवाज बहुत धीमी व रुकी रहती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो रोगी नाक से बात कर रहा हो। ऐसे रोगी को गायन से संबंधित शौक या कार्य छोड़ना ही पड़ता है।

5). सिर व गर्दन – चेहरे व निगलने (Mastication) की मांसपेशी की कमजोरी से रोगी मुंह को बंद नहीं रख सकता व मुस्कराने की कोशिश से भावविहीन बनावट (Snarling Appearance) आती है। ऐसा रोगी आंखों व चेहरे की मांसपेशियों की कमजोरी से सोया हुआ (Sleepy) या उदास (Sad) दिखता है। सिर को सीधा रखने में असमर्थ रहता है।

6). ऊर्ध्व शाखा (दोनों हाथ) – पहले यह रोग ऊर्ध्व शाखाओं में और उनसे भी पहले कंधों की मांसपेशियों में आता है। इन मांसपेशियों में शिथिलता आ जाने से बालों में कंघी करना, हजामत बनाना, कपड़ों को खूटी पर टांगना, वस्तुओं को उठाकर ऊपर रखना कठिन हो जाता है।
इसमें एक अन्य गंभीर स्थिति होती है, जिसे माइस्थेनिक क्रिसिस (Myasthenic Crisis) कहते हैं। इसमें श्वसन की मांसपेशियों को आघात होता है। यह संक्रमण, ज्वर, औषधि के रिएक्शन व तनाव से बढ़ता है।

मायस्थेनिया ग्रेविस का परीक्षण (Diagnosis of Myasthenia Gravis in Hindi)

मायस्थेनिया ग्रेविस निदान के तरीके निम्नलिखित हैं-

  1. शारीरिक परीक्षण के समय डॉक्टर रोगी को 30 सेकंड के लिए निर्धारित बिंदु पर देखने और माथे की मांसपेशी को शिथिल (Relax) करने के लिए कहते हैं। मायस्थेनिया ग्रेविस व Ptosis (नेत्ररोग) का रोगी आंखों की मांसपेशियों के बदले अपने माथे की मांसपेशियों का उपयोग करता है क्योंकि उसकी आंखों की मांसपेशियां कमजोर होती हैं।
  2. “करटन साइन” (curtain Sign) नामक परीक्षण भी किया जाता है। इसमें रोगी की यदि एक आंख पकड़कर खुली रखी जाए तो दूसरी आंख स्वयं बंद हो जाती है।
  3. रक्त परीक्षण – इस रोग का निदान संशयात्मक (Suspected) हो तो ब्लड सिरम टेस्ट की जाती है, जिसमें एसिटिकल कोलिन रिसेप्टर के Against antibodies की जांच की जाती है।
  4. इसके अलावा Neostigmine Test, Electrodiagnostics [Ice-test], Edrophonium test, Chest x-ray, Pulmonary Function test भी की जाती है।

मायस्थेनिया ग्रेविस का उपचार (Myasthenia Gravis Treatment in Hindi)

आधुनिक चिकित्साशास्त्र में औषधि या शल्यक्रिया इस व्याधि का उपचार है।

■ औषधि में एसिटिल कोलीनेस्टेरेस इन्हिबिटर व इम्यूनोसप्रेसेन्ट औषधि दी जाती है। एसिटिल कोलीनेस्टेरेस इन्हिबिटर से मांसपेशियों के कार्य में सुधार होता है व इम्यूनोस्प्रेसेन्ट औषधि से ऑटोइम्यून प्रोसेस कम होता है। परंतु इससे रोगी की पूर्ण कमजोरी नहीं जाती, जबकि दैनंदिन जीवन के कार्य रोगी कर सकता है। इस औषधि की शुरुआत कम मात्रा से की जाती है। यदि भोजन के 30 मिनट पहले ली जाती है, तो भोजन के समय के लक्षण कुछ हद तक कम दिखाई देते हैं। जिन रोगियों को निगलने में तकलीफ रहती है, उनके लिए एसिटिल कोलीनेस्टेरेस इन्हिबिटर (Acetylcholinesterase Inhibitor) काम करता है।

■ मायस्थेनिया ग्रेविस के रोगी में एट्रोपिन (Atropine) का भी प्रयोग करते हैं, जिससे एसिटिल कोलीनेस्टेरेस इन्हिबिटर के मसकेरिनिक (Muscarinic) साइड इफेक्ट कम होते हैं।

■ पायरीडोस्टिग्मीन (Pyridostigmine) नामक औषधि कम दुष्प्रभाव वाली है। जो रोगी वेंटिलेशन पर होते है, उन्हें यह औषधि नही दी जाती क्योंकि इससे मुंह का लालानाव (Salivary Secretion) बढ़ता है।

■ स्टेराइड के रूप में प्रेडनिसालोन (Prednisolone) का भी प्रयोग करते हैं, पर उनके हानिकारक प्रभाव को देखते हुए स्टेराइड रोगी को देना उचित नहीं होता।

स्थिति गंभीर होने पर –

यदि माइस्थेनिया गंभीर स्थिति (Myasthenic Crisis) में हो, तो प्लास्माफेरेसिस का प्रयोग एन्टीबॉडी को रक्तप्रवाह से निकालने के लिए किया जाता है व इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन्स (IVIEs) का प्रयोग प्रवाहित एन्टीबॉडी को जोड़ने के लिए करते हैं। इन दोनों पद्धतियों का लाभ कम समय के लिए होता है और यह बहुत महंगी भी हैं। माइस्थेनिया की गंभीर स्थिति में रोगी को हॉस्पिटल में भरती कर यह उपचार करते हैं।

शल्यक्रिया (Surgery) –

मायस्थेनिया ग्रेविस के रोगी को शल्यक्रिया के अंतर्गत थाइमस ग्लैंड को निकालते (Thymectomy) हैं, जबकि आक्यूलर माइस्थेनिया में थाइमस ग्लैंड की सर्जरी नहीं करते हैं। अब तक यह सफल चिकित्सा सिद्ध नहीं हुई है, अध्ययन व प्रयास जारी है।

मायस्थेनिया ग्रेविस का आयुर्वेदिक इलाज (Myasthenia Gravis Ayurvedic Treatment in Hindi)

आयुर्वेदानुसार इस रोग का कारण त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का असंतुलन, स्रोतोरोध व रोग प्रतिकारक शक्ति के कार्य ठीक प्रकार से न होना है। अतः इसका उपचार दोष संतुलन, व्याधिक्षमत्व में सुधार, स्रोतोरोध दूर कर नर्व इम्पल्स मांसपेशी तक पहुंचकर उसकी कार्यक्षमता बढ़ाना है।

विश्राम चिकित्सा –

रोगी को अति श्रम से बचना चाहिये और जब रोग बढ़ रहा हो, तब पूर्ण विश्राम में रहना चाहिये। जब तक रोग ठीक न हो, तब तक श्रम नहीं करना चाहिए। भोजन भी ठोस न लेकर अर्ध- द्रव ही लेना चाहिए ताकि मुख को थकावट न हो।

औषधि चिकित्सा –

  • आयुर्वेदानुसार इस रोग में कफशामक, मांसाग्निवर्धक व बल्य औषधि से लाभ होता है।
  • कफशामक चिकित्सा के साथ वातशामक बल्य औषधियों का प्रयोग करते हैं।
  • myasthenia gravis ki dawa – योगेंद्र रस, चतुर्मुख चिन्तामणि, रसराज रस, रससिंदूर, स्वर्णमाक्षिक, शुद्ध शिलाजीत व बलारिष्ट का प्रयोग चिकित्सक के मार्गदर्शन में करने से लाभ मिलता है।
  • मांस धातु के अग्निवर्धन व पाचन के लिए पटोल, त्रिफला, बला, पिप्पली. नागरमोथा, कुटज व निम्ब का प्रयोग लाभकारी है।
  • वनौषधि में जीवंती, अश्वगंधा, यष्टिमधु, तुलसी, हरिद्रा, गुडूची इत्यादि जड़ी-बूटियों के प्रभावकारी परिणाम मिलते हैं। ऐसे रुग्णों का पेट साफ होना बहुत जरूरी है, अतः त्रिफला चूर्ण 1-2 चम्मच रात को सोते समय लें।

पंचकर्म चिकित्सा –

  • पंचकर्म के द्वारा शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलकर दोष असंतुलन व स्रोतावरोध दूर होकर रोग प्रतिकारक शक्ति के कार्य सुचारु रुप से होकर मांसपेशी की थकावट दूर होती है व उसकी कार्यक्षमता बढ़ती है।
  • पंचकर्म में स्नेहन, स्वेदन, बस्ति कर्म, पिंडस्वेद, नस्य, शिरोधारा, गंडूष-कवल, नेत्र तर्पण इत्यादि चिकित्सक के मार्गदर्शन में करना चाहिए।

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आवश्यक निर्देश (Necessary Instructions) :

  1. मायस्थेनिया ग्रेविस के रोगी को रोग संबंधी लक्षणों व उनमें होने वाले परिवर्तन की जानकारी देना चाहिए।
  2. ऐसे रोगी में होने वाली कमजोरी व अल्पकार्य व व्यायाम से होने वाली थकावट के बारे में रोगी को पता होना चाहिए।
  3. उसे बीच-बीच में विश्राम करते हुए व्यायाम के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  4. सार्वदैहिक मायस्थेनिया ग्रेविस के रोगी को घर में बैठे-बैठे ऐसे व्यायाम की योजना बनानी चाहिए, जिसमें श्वसन संबंधी व्यायाम हो जैसे – डायफ्रेग्मेटिक ब्रीदिंग (Diapragmatic Breathing), पर्स्ड लिप ब्रीदिंग (Pursed Lip Breathing), इंटरवल बेस्ड मसल थेरेपी (Interval Based Muscle therapy) इत्यादि। इनसे श्वसन संबंधी मांसपेशियों को शक्ति (Respiratory Muscle Strength) मिलती है। साथ ही chest wall mobility, respiratory pattem, respiratoryeudurance पर भी प्रभाव पड़ता है।

साध्य-असाध्यता (Prognosis) :

मायस्थेनिया ग्रेविस के रोगी का प्रोग्नोसिस उत्तम होता है। 1900 में ऐसे रोगियों की मृत्यु दर 70% थी, परंतु आज यह प्रतिशत जागरूकता व औषधि से कम हो गया है। इसमें रोगी पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।

भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में रोग की अवधि कम-ज्यादा होती है। यदि आरंभ के लक्षण नेत्र संबंधी Plosis या Diplopia हों, तो ये कई वर्षों के बाद कम होते हैं। यदि पुरुषों में लक्षण नेत्रगत मांसपेशियों (Ocular Muscles) से संबंधित 2 वर्ष से अधिक रहें, तो वह सार्वदैहिक का रूप ले सकता है। प्रारंभिक अवस्था में रोग पुनः हो सकता है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता जाता है, रोग की पुनरावृत्ति की आशंका कम होती जाती है। प्रथम 5 वर्ष तक रोग प्रत्यक्ष दिखता है। यदि रोग 10 साल से अधिक रहा, तो पुनरावृत्ति नहीं होती। रोग की उत्तरोत्तर अवस्था में मांसपेशियों का क्षय होता जाता है। ऐसी स्थिति में एसिटील कोलीनेस्टेरेस का असर कम होता है ।

रोग तब असाध्य होता है, जब Thymoma उपस्थित रहता है। जब कभी गले, नाक या श्वास नालियों में कोई संक्रमण (Infection) होता है, तब यह रोग बढ़ जाता है। 10% रोगियों में यह रोग स्वयमेव अच्छा हो जाता है।

इस व्याधि से ग्रस्त रुग्ण को आधुनिक चिकित्सा के साथ जड़ी-बूटियों का सेवन व पंचकर्म उपचार अवश्य कराना चाहिए। इन दोनों के परिणाम संतोषजनक मिल रहे हैं।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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