Napunsakta Ke Karan in Hindi नपुंसकता के कारण और उपाय

नपुंसकता क्या है ? : Napunsakta in Hindi

संक्षेप में इस सवाल का दो टूक जवाब यह है कि कोई पुरुष किसी भी कारण से स्त्री-सहवास करने में समर्थ न हो, यह असमर्थता ही नपुंसकता है।

यौन-विषय इस वक्त भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में विकट महामारी की तरह मनुष्य को प्रभावित और आकर्षित कर रहा है तथा अपने मोह जाल में जकड़ रहा है यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि “तुलसी गाय बजाय के, देत काठ में पांव” के अनुसार स्त्री-पुरुष स्वयं ही इसके मोहक जाल में फंस रहे हैं और दूसरों को भी फंसा रहे हैं।

हमारा भारत तो बेचारा ऐसा देश है जहां की अधिकांश जनता नोन तैल लकड़ी या कह लीजिए कि रोटी, कपडा और मकान की समस्या में ही उलझी हुई है। जो पैसे वाले व्यापारी लोग हैं उन्हें धन कमाने से फुर्सत नहीं है। रहे हमारे नेता, समाज-सेवक और देश के कर्णधार मन्त्रीगण तो उनमें से भी अधिकांश तो अपनी कुर्सी बचाने में उलझे रहते हैं, कुछ बेचारे घोटाला काण्ड में फंसे हुए हैं तो कुछ दलगत राजनीति के हथकण्डों और राजनैतिक गठ बन्धनों की तिकड़मों में ही दिन रात ‘बिज़ी’ रहते हैं।
देश की, देशवासियों की और खास कर कल को जिन्हें इक्कीसवीं सदी में भारत के नागरिक बनना है, आज के उन युवक-युवतियों के बारे में, उनकी समस्याओं के बारे में, उनके केरियर और भविष्य के बारे में सोचने की उन्हें फुर्सत कहां है। कभी अध्यक्षता या उद्घाटन करते समय, रस्म के तौर पर, देश के प्रति चिन्ता और ग़रीबी के प्रति अफ़सोस प्रकट करके वे अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देते हैं। दरअसल उनका अफ़सोस करना और देश के प्रति चिन्ता प्रकट करना महज़ एक औपचारिकता ही होती है, एक अभिनय ही होता है।

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जब हमारा देश आज़ाद हुआ था तभी से देश की शिक्षा-प्रणाली में भारतीय संस्कृति और सभ्यता को मद्देनज़र रख कर कोर्स में, शरीर, स्वास्थ्य, चरित्र, देशभक्ति, मानव मात्र से प्रेम, योगासन, ध्यान और व्यायाम से सम्बन्धित शिक्षा देने वाला एक विषय अनिवार्य (Compulsory subject) रूप में शुरू कर दिया होता तो आज अपने मुंह मियां मिठू बन कर ‘मेरा भारत महान’ हम नहीं कहते बल्कि सारी दुनिया कहती कि सारे संसार में महान देश एक ही है भारत ।

यदि स्वास्थ्य, चरित्र, नैतिकता और देशभक्ति सिखाने वाला एक कम्पलसरी सब्जेक्ट स्कूल और कालेजों में शुरू किया होता तो कम से कम आज हमें नपुंसकता जैसे शर्मनाक और दीन हीन स्थिति वाले बेहूदा मुद्दे पर लेख नहीं लिखना पड़ता।

आज के वातावरण में, फिल्मों, टी वी सीरियलों और विदेशी चैनलों की कृपा से सेक्स घरोघर इस तरह से छाया हुआ है जैसे सर्दियों की सुबह के वक्त कोहरा छाया होता है जिससे ठीक से दिखाई नहीं देता। कच्ची उम्र में अनजाने ही किशोर आयु के बच्चे सेक्स और सेक्सी हरकतों से न सिर्फ़ परिचित ही हो जाते हैं बल्कि हस्त कौशल भी दिखाने लगते हैं। परिणाम वही होता है जो होना चाहिए यानी दिवाली से पहले ही जवानी के फुलझड़ी फटाके चलाना शुरू कर देते हैं और दीवाली की रात आने तक, दिवाली की जगह दिवाला हो जाता है। इसे ही यौन विषय की भाषा में नपुंसकता कहते हैं।

नपुंसकता के कारण और बचाव के उपाय : Napunsakta ke Karan aur Upay in Hindi

नपुंसकता क्या है ? इस सवाल का जवाब देने के बाद दूसरा सवाल यह उठता है कि नपुंसकता की स्थिति पैदा करने वाले कारण क्या हैं? इन दोनों सवालों के जवाबात पर, पूरी तरह गोरो फ़िक्र कर ली जाए तो ही इससे बचने के उपाय करके आयुर्वेद के इस अटल सिद्धान्त का पालन किया जा सकता है कि- ‘संक्षेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम्‘ अर्थात सारी चिकित्सा का संक्षिप्त सारांश यह है कि उन कारणों का त्याग चिकित्सा से पहले किया जाना चाहिए जिनसे व्याधि पैदा हुई हो । अंग्रेज़ी में इसी विचार को इस तरह से कहा गया है कि Prevention is better than cure अर्थात चिकित्सा की अपेक्षा रोग से बचना अधिक अच्छा होता है। यही सिद्धान्त नपुंसकता को दूर करने पर भी लागू होता है लिहाजा यहां हम उन कारणों का संक्षिप्त उल्लेख कर रहे हैं जो अच्छे खासे युवक को भी दौर्बल्य और नपुंसकता की गहरी खाई में ढकेल देते हैं।

आयुर्वेद के एक ग्रन्थ के अनुसार नपुंसकता होने के 13 कारण बताये गये हैं –

(1) जन्मजात नपुंसकता
(2) आयु का प्रभाव
(3) शारीरिक दौर्बल्य
(4) चोट लगना
(5) भ्रम
(6) स्थूलता
(7) दीर्घकालीन अमैथुन
(8) धातु क्षीणता
(9) मधुमेह
(10) दूषिय वीर्य
(11) शीघ्र पतन
(12) अप्राकृतिक मैथुन
(13) अति भोग विलास

अब इन 13 कारणों की संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। यदि नवयुवक और प्रौढ़ पुरुष इन 13 कारणों को ठीक से जान समझ लें और अच्छे आचरण का पालन कर इनसे बच कर रहें तो वे नपुंसकता की स्थिति से ग्रस्त न होंगे। नपुंसकता-ग्रस्त न होंगे तो दवा इलाज करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। इलाज की ज़रूरत भी तो रोगी होने पर ही पड़ती है न, जैसा कि हितोपदेश में कहा गया है’व्याधितस्यौषधं पथ्यं नीरूजस्य किमौषधैः’ अर्थात् औषधि रोगी के ही लिए उपयोगी होती है, निरोग व्यक्ति के लिए औषधि का क्या उपयोग ?

(1) जन्मजात –

पूर्व जन्म के कर्म फलस्वरूप जीवात्मा ऐसे ही माता-पिता के यहां जन्म लेता है जिनके वंशानुगत या शारीरिक दोष के कारण, गर्भकाल में उसके शरीर की रचना होते समय यह दोष पैदा हो जाता है। आयुर्वेद ने कहा है-

‘जन्य प्रभृति यत्वलैब्यं सहजं तद्धिसप्तम्।
असाध्यं सहज क्लैब्यं मर्मच्छेदाच्च यद्भवेत्।।’

अर्थात्- जो पुरुष जन्म से ही नपुंसक होता है उसे सहज या जन्मजात नपुंसक कहते हैं। जन्मजात और चोट लगने या शिराच्छेद (नस कटने) से होने वाली नपुंसकता असाध्य यानी लाइलाज (uncurable) होती है।

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(2) आयु का प्रभाव –

पुरुष आयु के प्रभाव से भी नपुंसकता से ग्रस्त होता हैं जिसमें आहार-विहार और आचरण का भारी हाथ होता है। आहार-विहार पोषक और स्वास्थ्य रक्षक हो तथा आचरण दोष रहित और संयमित हो तो आयु का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता और पुरुष अधिक आयु तक भी सशक्त और समर्थ बना रहता है लेकिन जो शरीर व स्वास्थ्य की रक्षा करने की फ़िक्र नहीं करते वे समय से पहले ही बुढ़ापे के शिकार हो जाते हैं और नपुंसकता से ग्रस्त हो जाते हैं। आयुर्वेद के मतानुसार 60 वर्ष की आयु के बाद विषय-भोग करना, स्वेच्छा से ही बन्द कर देना उचित होता है।

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(3) शारीरिक दौर्बल्य –

शारीरिक दुर्बलता कई कारणों से होती है और जिस कारण से हो, उस कारण को दूर करने पर, दुर्बलता यानी कमज़ोरी दूर हो जाती है हालाकि थोड़ी देर से दूर होती है और पोषक आहार तथा पदार्थों का सेवन किया जाए तो जल्दी भी हो जाती है लेकिन कारणों को दूर किये बिना पौष्टिक आहार और पदार्थों का सेवन करने पर भी कमज़ोरी दूर नहीं होती। शरीर को कमज़ोर करने वाले कारणों में प्रमुख कारण इस प्रकार हैं- नियमित समय पर भोजन और शयन न करना, भूख प्यास सहना, शक्ति से ज्यादा श्रम करना, देर रात तक जागना, भोजन में पोषक पदार्थों का उपलब्ध न होना, आलसी और किसी रोग से ग्रस्त स्थिति, किसी भी तरीके से यौन-क्रीड़ा करके या अधिक मात्रा में स्त्री-सहवास करके वीर्य का नाश करना, चिन्ता तनाव और शोक से पीड़ित रहना, मूत्र सम्बन्धी कोई रोग होना और सुबह से शाम तक की दिनचर्या नियमित और व्यवस्थित न होना। इनमें से जो जो कारण हों उनका त्याग करने और उनके विपरीत आचरण करने से, शारीरिक दुर्बलता दूर होती है और नपुंसकता भी मिट जाती है।

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(4) चोट लगना –

सिर के पिछले भाग या यौनांग में ऐसी ज्यादा चोट लगना जिससे मस्तिष्क के नियन्त्रण-अंग में विकार हो जाए या यौनांग की नस-नाड़ियों में विकृति आ जाए तो नपुंसकता हो जाती है। सही निदान कर विकार दूर करने की सफल चिकित्सा करने से यह नपुंसकता दूर की जा सकती है।

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(5) भ्रम –

कई युवक नपुंसक न होते हुए भी भ्रम के कारण अपने आपको नपुंसक समझने लगते हैं। भ्रम यानी गलतफहमियां होना जो कि अज्ञान के कारण होती हैं। यौन विषय का पर्याप्त ज्ञान न होना, सुनी सुनाई गलत बातों पर विश्वास करना, अत्यधिक शर्मीला और दब्बू स्वभाव होना, स्त्री के सम्पर्क में आने पर घबराहट, असुविधा और खिन्नता का अनुभव करने वाला स्वाभाव होना, किसी भी कारण या किसी की सलाह से ऐसी मानसिकता बना लेना कि यौन क्रिया करना पाप है सो इस विषय में सोचना भी ठीक न समझना और इस कारण से यौनांग में उत्तेजना न होना आदि कारणों से भ्रमजन्य नपुंसकता हो जाती है।

अपने 40 वर्षीय चिकित्सा कार्य-काल में हमें ऐसे सैकड़ों अनुभव हुए हैं जिनमें पति या पत्नी को किसी भ्रम में फंसा हआ पाया और ठीक से समझाने पर वे भ्रम से मुक्त हो पाये। युवक युवती भ्रम का शिकार हो कर खामोखां अपने आपको नपुंसक मान लेते हैं और सचमुच में नपुंसकता में फंसे रहते हैं।

(6) स्थूलता –

जरूरता से ज्यादा शरीर मोटा हो तो इसे स्थूलता (Obesity) कहते हैं। खान पान की अनियमितता, परिश्रम या व्यायाम न करने, आलसी दिनचर्या, मोटापा बढ़ाने वाले पदार्थों का सेवन करने और ज्यादा सोने आदि कारणों से शरीर मोटा होता जाता है क्योंकि शरीर में चर्बी बढ़ती जाती है। इस कारण से नपुंसकता हो जाती है।

(7) दीर्घकालीन अमैथुन –

किसी भी कारण से लम्बे समय तक पत्नी के साथ सहवास न करने वाला पति नपुंसकता यानी कामशीतलता का अनुभव करता है। ‘बलिनः क्षुब्ध मनसो निरोधाद् ब्रह्मचर्यतः’ के अनुसार इस प्रकार की नपुंसकता को ‘ब्रह्मचर्यजन्य नपुंसकता’ कहते हैं। पत्नी से सम्पर्क होने पर यह नपुंसकता जल्दी ही, बिना इलाज के ही, ठीक हो जाती है।

(8) धातु क्षीणता-

यदि शरीर की सभी सातों धातुओं का पोषण न हो तो धातुएं क्षीण होने लगती हैं। अच्छा पौष्टिक आहार, धातु पौष्टिक और बलवीर्यवर्द्धक पदार्थों का सेवन न करने और बार-बार वीर्यपात करके धातु का क्षय करते रहने पर शुक्रधातु क्षीण होने लगती है। इसे धातु क्षीणता कहते हैं। पर्याप्त मात्रा में और पूरी तरह से पुष्ट धातु होने पर ही शरीर में वीर्यशक्ति और पर्याप्त उत्तेजना होती है। धातु के क्षीण यानी कम मात्रा में, होने से ऐसा नहीं हो पाता । इसी को – ‘ध्वज भङ्गमवाप्नोति स शुक्रक्षय हेतुकम्।’ के अनुसार वीर्यक्षयजन्य नपुंसकता कहते हैं। उचित और पौष्टिक आहार लेने, पाचनशक्ति ठीक रखने और पेट साफ़ रखने से शरीर की सातों धातु पुष्ट होने लगती हैं और 40 से 60 दिन में धातुक्षीणता दूर हो जाने पर यह नपुंसकता दूर हो जाती है।

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(9) मधुमेह –

लम्बे समय तक प्रमेह रोग बना रहे तो यह रोग ‘मधुमेह’ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। प्रमेह रोग की उचित चिकित्सा न होने पर यह स्थिति पैदा होती है। मधुमेह को नियन्त्रित करने के लिए पालन किये गये परहेज़ करने और परहेज़ के अनुसार ही भोज्य पदार्थ खाने से शरीर कमज़ोर होता है और इस कारण से मधुमेहजन्य नपुंसकता पैदा होती है।

(10) दूषित वीर्य –

वीर्य का शुद्ध, शीतल, दही जैसा गाढ़ा, शुभ्र श्वेत वर्ण का और गीले कच्चे आटे जैसी गन्ध वाला होना ज़रूरी है। इसे ही दोषरहित वीर्य कहते हैं। ग़लत खानपान, तेज़ मिर्च मसालेदार खट्टे, मांस, शराब अण्डे और गर्म प्रकृति के पदार्थों के अति सेवन करने, रजस्वला स्त्री (जिसका मासिक ऋतु स्राव हो रहा हो) के साथ या किसी गुप्त रोग से पीड़ित स्त्री के साथ सहवास करने से संक्रमण (Infection) हो जाता है जिससे वीर्य दूषित और उष्ण प्रकृति का हो जाता है, पतला और क्षीणबल हो जाता है। प्रसूति के तुरन्त बाद पत्नी के साथ सहवास करने से भी यह स्थिति बन सकती है इसलिए प्रसूति के बाद 2 से 3 माह के बाद ही सहवास करना चाहिए अन्यथा दूषित वीर्य से होने वाली नपुंसकता हो सकती है।

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(11) शीघ्रपतन –

किशोरावस्था से हस्त मैथुन करने का आदी युवक प्रायः ‘शीघ्रपतन’ नामक व्याधि से ग्रस्त हो ही जाता है । हस्तमैथुन करना एक ऐसी क्रिया है जिसमें किसी दूसरे की ज़रूरत नहीं होती इसलिए यह क्रिया करने वाला यह कार्य करने में किसी का आश्रित नहीं, स्वतन्त्र होता है इसलिए जब चाहे तब कर सकता है इसीलिए अन्य यौन क्रीड़ाओं की तुलना में सबसे ज्यादा अति हस्त मैथुन करने में ही की जाती है। इसके परिणाम होता है नपुंसक होना । इसे शीघ्रपतन वाली नपुंसकता कहते हैं। संयम से काम ले कर, सहवास में कमी करने और पौष्टिक आहार तथा कोई भी अच्छा सा वाजीकारक योग लेने से यह नपुंसकता दूर हो जाती है।

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(12) अप्राकृतिक मैथुन –

यूं तो अप्राकृतिक मैथुन की कुछ विधियां सभी देशों के लोग जानते हैं और प्रयोग करते भी हैं सो हमारे देश में भी कुछ लोग ऐसी हरकतें करते हैं पर इन विधियों के उपयोग में सबसे ज्यादा इज़ाफ़ा किया है पश्चिमी देशों में चलने वाली उन्मुक्त यौन (Free Sex) की प्रचण्ड लहरों ने। पश्चिमी देशों से ही पोर्नोग्राफी और ब्लू फिल्मों का प्रचलन शुरू हुआ और सारे विश्व में पहुंचा है। इस प्रकार की अश्लील सामग्री ने काम (Sex) का नहीं बल्कि कामुकता (Sexuality) का ही प्रचार किया है और जो लोग कामुकता से परिचित न थे, इससे बचे हए थे वे भी इस तरह की अश्लील सामग्री के कारण कामुकता के मोहक जाल में फंसते जा रहे हैं।

हस्त मैथुन के बाद अप्राकृतिक मैथुन की विधियों में दूसरे नम्बर पर, गुदामैथुन की विधि का प्रयोग करना पाया जाता है। भले ही इसका उद्गम यानी आरम्भ पश्चिमी देशों से न हुआ हो, क्योंकि इस अप्राकृतिक ढंग से, गुदा मैथुन करने वाले दुनिया के सभी देशों में पाये जाते हैं पर इसका प्रचार-प्रसार कर दुनिया भर में इसे बढ़ाने का काम तो पश्चिमी देशों ने ही किया है। हमारे देश में या किसी भी देश में गुदा मैथुन करने वाले हैं ही नहीं, ऐसी बात नहीं है पर इन देशों में यह कार्य गुप्त रूप से छिप कर किया जाता है क्योंकि सामाजिक और नैतिक रूप से इस कार्य को जघन्य और वर्जित माना जाता है लेकिन पश्चिमी देशों में स्थिति इसके विपरीत है। वहां के कुछ देशों में, अप्राकृतिक ढंग से किये जाने वाले इस मैथुन यानी गुदा मैथुन को इतना पसन्द किया जाता है कि वहां ऐसा कानून बनाना पड़ा जिसके अन्तर्गत दो पुरुष, परस्पर विवाह करके, पति-पत्नी की तरह साथ रह सकते हैं और जाहिर है कि वे गुदा मैथुन ही करेंगे। इस तरह इन पश्चिमी देशों ने, मैथुन की इस अप्राकृतिक विधि- ‘गुदा मैथुन’ को क़ानूनी मान्यता दे कर वैध घोषित कर दिया है। गुदा मैथुन करने वाले पुरुष की रुचि, (Taste), मनोवृत्ति (Mentality) और पसन्द (Choice) में ऐसा परिवर्तन हो जाता है कि फिर स्त्री शरीर उसे आकर्षित और उत्तेजित नहीं कर पाता यानी स्त्री-सहवास करने की दृष्टि से वह नपुंसक हो जाता है।

इस प्रकार अनेक दम्पत्तियों के जीवन में, इस अप्राकृतिक तरीके का, पति द्वारा उपयोग करने से, विषमता, कटुता और घुटन वाली स्थिति बन जाती है क्योंकि इस कार्य से पत्नी को न तो कोई खुशी मिलती है और न आनन्द ही मिलता है। तृप्ति मिलने का तो सवाल ही बेकार है, उलटे अतृप्ति ही मिलती है, खुशी व आनन्द की जगह पीड़ा मिलती है। इसी तरह गुदा मैथुन के अलावा और भी कई बेहदे और अप्राकृतिक तरीके हैं जिनका जिक्र करना ज़रूरी नहीं, सिर्फ इतना कहना ही काफ़ी है कि इन गन्दी हरकतों का परिणाम होता है पुरुष का नपुंसक हो जाना।

(13) अति भोग विलास –

इस विषय में ज्यादा कुछ लिखने की ज़रूरत नहीं बस इतना कहना काफी है की अति करना सर्वत्र वर्जित है। यूं भी कहा ही गया है कि समझदार को इशारा काफ़ी होता है।

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