पाषाणभेद के आश्‍चर्यजनक फ़ायदे – Pashanbhed ke Fayde in Hindi

पाषाणभेद क्या है ? (What is Pashanbhed in Hindi)

पत्थर को भेद कर उत्पन्न होने वाली औषधियों में पाषाणभेद प्रमुख है। आदि काल में आचार्यो ने जिस प्रकार रक्त अशोक को देखकर उसे रक्तप्रदर के लिए उपयोगी समझा, मंजिष्ठा (रक्तवर्ण) को देखकर रक्तशोधन के लिए उपयुक्त समझा उसी प्रकार पत्थर को भेद कर उत्पन्न होने वाली वनौषधि को देखकर शरीर में उत्पन्न होने वाली पथरी को समाप्त करने के लिए उसे उपयुक्त समझा और अनेक प्रयोग-परीक्षणों के उपरान्त यह निर्णय किया गया कि पाषाणभेद पाषाण का भेदन करने के कारण – पथरी (अश्मरी) का भी भेदक है।

पाषाणभेद का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Pashanbhed in Different Languages)

Pashanbhed in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – पाषाणभेद, अश्मघ्न।
  • हिन्दी (Hindi) – पखान भेद, सिलफड़ा, पथरचूर
  • मराठी (Marathi) – पखान भेद
  • गुजराती (Gujarati) – पाखानभेद
  • कन्नड़ (kannada) – पहांड
  • लैटिन (Latin) – बर्जिनिया लिग्युलेटा (Bergenia Ligulata)

पाषाणभेद का पौधा कहां पाया या उगाया जाता है ? :

समशीतोष्ण हिमालय प्रदेश में कश्मीर से भूटान तक तथा खसिया की पहाड़ियों पर इसके पौधे
पर्वतों की ढालों पर पत्थरों की दरारों में कसरत से निकले हुए मिलते हैं।

पाषाणभेद का पौधा कैसा होता है :

  • पाषाणभेद का पौधा – इसका छोटा बहुबर्षायु क्षुप पहाड़ की चट्टानों पर फैला रहता है। चट्टानों के बीच में जो दरारें पड़ जाती हैं। उनमें से इसका काण्ड बाहर निकलता है।
  • पाषाणभेद कि जड़ – पाषाणभेद का मूल-रक्तवर्ण, स्थूल, लगभग एक-दो इंच लम्बा होता है। इससे अनेक उपमूल निकलकर चारों ओर फैले रहते हैं।
  • पाषाणभेद के पत्ते – इसके पत्र-गोलाकार, प्राय: 5-10 इंच व्यास के, मांसल, किनारों पर दांतयुक्त, ऊपरी पृष्ठ पर हरे तथा निचले पृष्ठ पर रक्ताभ होते हैं।
  • पाषाणभेद के फूल – पाषाणभेद के पुष्प-श्वेत, गुलाबी होते हैं जो अप्रैल-मई में लगते हैं।

पाषाणभेद पौधे का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Pashanbhed Plant in Hindi)

  • प्रयोज्य अङ्ग – पत्ता, मूल
  • संग्रह एवं संरक्षण – पाषाणभेद के टुकड़ों को मुखबन्द पात्रों में सूखे शीतल स्थान पर रखना चाहिए जिससे वे प्रभाव शून्य न हों।
  • वीर्यकालावधि – एक वर्ष।

पाषाणभेद के औषधीय गुण (Pashanbhed ke Gun in Hindi)

  • रस – कषाय, तिक्त
  • गुण – लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण
  • वीर्य – शीत
  • विपाक – कटु
  • प्रभाव – अश्मरीभेदन
  • दोषकर्म – त्रिदोषशामक

सेवन की मात्रा :

  • क्वाथ – 50 से 100 मिलि0 ।
  • चूर्ण – 3 से 6 ग्राम।

रासायनिक संघठन :

इसके मूल में टैनिक एसिड 14.2, गैलिक एसिड स्टार्च 19% ,खनिज लवण, मेटार्विन, अल्ब्युमिन 73.4%, मोमा, सुगन्धि द्रव्य होते हैं। भस्म 12.87% होती है। जिसमें कैल्शियम आक्जलेट अधिक मिलता है।

पाषाणभेद का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Pashanbhed in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार पाषाणभेद के गुण और उपयोग –

  • अश्मरी (पथरी) भेदन द्रव्यों में पाषाणभेद सर्वश्रेष्ठ है। यह किडनी की दुर्बलता को दूर करता है, सूजन का शमन करता है, और मूत्र की मात्रा बढ़ाता हैं ।
  • अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात पर इसके कई प्रयोगों का उल्लेख मिलता है। चरक संहिता सू0 4 में मूत्र विरेचनीय गण में जिन दश द्रव्यों का वर्णन किया है उनमें एक पाषाणभेद भी है। मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, अश्मरी, वातरक्त, आनाह आदि विभिन्न रोगों में पाषाणभेद के उपयोग का भगवान ने वर्णन किया है।
  • सुश्रुत संहिता में पाषाणभेद का वीरतर्वादिगण में उल्लेख हुआ है। यह गण पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात एवं वात विकारों को दूर करने वाला है।
  • वातसंशमन वर्ग में भी पाषाणभेद का उल्लेख है। वातिक मूत्रकृच्छ्र एवं मूत्राघात में इसकी उपादेयता प्रकट की है
  • चरक संहिता के समान अष्टांग संग्रह में मूत्रविरेचनीय गण में पाषाणभेद का उल्लेख किया गया है और यह गुल्म, मूत्राघात, उन्माद, अपस्मार तथा वातव्याधि में उपयोगी कहा गया है।
  • अष्टांगहृदय में पाषाणभेद का बहुशः उल्लेख प्राप्त होता है।
  • सुश्रुतानुसार सू0 15 में वीरतर्वादिगण में पाषाण भेद की गणना की गई है। इसके अतिरिक्त यह मूत्राघात, अश्मरी, मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, पाण्डुरोग, उदररोग, गुल्म, प्लीहा, अर्श (बवासीर), अपस्मार एवं वातज रोगों में इसके उपयोग की महत्ता प्रकट की गई है।
  • इन रोगों के अतिरिक्त श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर एवं कष्टार्तव आदि योनिव्यापद् में यह लाभप्रद पाया गया है।
  • पाषाणभेद स्तम्भक होने से अतिसार, प्रवाहिका में, कफ निःसारक होने से कास में, हृद्य होने से हृदयरोगों में, रक्तपित्तशामक होने से रक्तपित्त में, ज्वरघ्न होने से ज्वर में, विषघ्न होने से विष प्रभाव में भी यह हितकारक कहा गया है।

यूनानी मतानुसार पाषाणभेद के गुण और उपयोग –

  • पाषाणभेद दूसरे दर्जे में गरम और रूक्ष है।
  • यह शोथहर, कान्तिजनक, मूत्रप्रवर्तक, पाण्डू, प्रमेह शुक्रमेहआमाशय का पीड़ा आदि को दूर करने वाला है।
  • इसके अतिरिक्त पाषाणभेद विषशामक है।
  • पथरी के लिए यह उत्तम दवा है।

रोगोपचार में पाषाणभेद के फायदे (Benefits of Pashanbhed in Hindi)

1). घाव की सूजन (व्रण शोथ) – पाषाणभेद और बहेड़ा चूर्ण का पुल्टिस बनाकर बांधना या गोमूत्र में मिलाकर लेप करना हितकर है।

2). आँख आना (नेत्राभिष्यन्द) – पाषाणभेद को पीसकर जल मिलाकर आंखों पर लेप करने से आँख आने में लाभ होता है।

3). दन्तोद्भेदगद – बच्चों के दांत आते समय पाषाणभेद चूर्ण को मधु के साथ मिश्रित कर उनके मसूड़ों पर मल देना चाहिए। इससे दांत सरलता से आते हैं एवं इससे उत्पन्न रोग ज्वर, अतिसार आदि में भी लाभ होता है। इससे उनके मुखपाक का भी निवारण होता है।

4). पीलिया (पाण्डु रोग) – सिरके के साथ इसे पीसकर लेप करना पाण्डु रोग में लाभदायक है।

5). दन्त रोग – पाषाणभेद मूल, माजूफल और अजवाइन के चूर्ण को एरण्ड तैल में मिश्रित कर दाँतों एवं मसूड़ों पर धीरे-धीरे कुछ देर मलकर गरम जल से कुल्ले करने पर समस्त दंत रोगों का शमन होता है।

6). पथरी –

  • पाषाणभेद, एरण्डमूल, गोखरू, छोटी इलायची, फालसा, पीपल और गुरूच का क्वाथ पीने से पथरी रोग दूर होता है।
  • पाषाणभेद, वरना की छाल, तालमखाना, हरड़, अमलतास की गुद्दी के क्वाथ में हींग, यवक्षार और सेंध नमक डालकर पीने से वातापथरी में लाभ होता है। यह वंक्षणगत वातरोगों में भी लाभदायक है।
  • पाषाण भेद, सोंठ, सहिजन की छाल, अरनी और वरना की छाल के क्वाथ में भी हींग, सैन्धव, यवक्षार मिलाकर सेवन करने से पथरी एवं वातरोग मिटते हैं।
  • पाषाण भेद, गोखरू, अमलतास, यवासा, पित्तपापड़ा, और हरड़ का क्वाथ भी पथरी हर है। इस क्वाथ में मधु मिलाकर सेवन करना अधिक लाभप्रद है। यह मूत्रकृच्छ्र एवं कब्ज को भी मिटाता हैं
  • पाषाण भेद, सम्भालू के बीज, गोखरू, मुलेठी, छोटी इलायची, अडूसा, एरण्डमूल और पिप्पली के क्वाथ में शिलाजीत मिलाकर सेवन करने से भी पथरी एवं अश्मरी युक्त मूत्रकृच्छ्र, शर्करा, दाह, कब्ज आदि रोग दूर होते हैं।
  • पाषाण भेद क्वाथ में शिलाजीत और मिश्री मिलाकर पीने से पित्ताश्मरी (पित्ताशय की पथरी) नष्ट होती है। इन दोनों के चूर्ण को मिश्रीयुक्त दुग्ध से भी लिया जा सकता है।
  • पाषाणभेद और खीरा (ककड़ी) के बीज समभाग लेकर 4-5 ग्राम चूर्ण को बन्दाक (बांद) पंचांग स्वरस से या शिलाजीत युक्त दुग्ध के साथ सेवन करने से भी पित्ताशय की पथरी विनष्ट होती है।
  • पाषाण भेद, वरना की छाल और तालमखाने की जड़ के क्वाथ में दही मिलाकर पीने से शुक्राश्मरी (वीर्यपुटी की पथरी) समाप्त होती हैं
  • पाषाणभेद के चूर्ण के साथ कपूर और शिलाजीत मिलाकर नारिकेलासव के साथ पिलाने से अश्मरी और मूत्राघात रोगों में लाभ होता है।
  • पाषाणभेद, अरनी, अगस्त, अर्जुन, बन्दा, कांस, डाभ, अरलू, गोखरू, कमल, ब्राह्मी का क्वाथ, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात आदि रोगों को मेटता है। – ये सभी प्रयोग अश्मरी के अतिरिक्त मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात आदि रोगों में भी उपयोगी है। अश्मरी जन्य मूत्रावरोध का तो ये निवारण करते ही हैं।

7). उदरशूल – पाषाणभेद के दो या तीन पत्तों को लवण या गुनगुने पानी के साथ सेवन करना हितकारक है। स्वरस में सोंठ चूर्ण मिलाकर भी दिया जा सकता है। बच्चों को स्वरस में शक्कर मिलाकर दें ।

8). अतिसार – पाषाणभेद चूर्ण को एक कटोरी बकरी के दूध में मिलाकर दें। ऐसे दिन में 3-4 बार देनी चाहिए।

9). श्वेतप्रदर – पाषाणभेद चूर्ण, शुभ्राभस्म और मिश्री क्रमशः 3 ग्राम, 500 मि0ग्रा0 और 5 ग्राम मिलाकर सेवन करने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है।

10). रक्तप्रदर – पाषाणभेद, नागकेशर और आंवला चूर्ण समभाग लेकर सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।

11). प्रमेह – पाषाणभेद और हिंगोट का क्वाथ मधु के साथ सेवन करना प्रमेह में हितकारी है। बच्चों के पेशाब के गंदलेपन में इसे दूध में घिसकर पिलाते हैं।

12). कष्टार्तव – पाषाणभेद, मेथी, कलौंजी के क्वाथ में गुड़ मिलाकर सेवन करने से आर्तव खुलकर होता है। कष्ट दूर होता है।

13). मूत्र प्रदाह – इसके चूर्ण को दूध की लस्सी के साथ सेवन करने से पेशाब करते समय होने वाली जलन मिटती है।

14). ज्वर – पाषाणभेद, गुडूची और नागरमोथा का क्वाथ ज्वर में हितकारक है।

15). अफ़ीम विष – पाषाणभेद चूर्ण जल से या वृत्ताकपत्र स्वरस से सेवन करें।

16). प्रवाहिका (अतिसार) – पाषाण भेद, सुगन्धबाला, सोंठ और इन्द्र जौ का क्वाथ प्रवाहिका को मिटाता है।

17). बवासीर (अर्श) – पाषाणभेद, हरीतकी, चित्रक और यवासा क्वाथ में यवक्षार मिलाकर अर्श के रोगी को देना चाहिए।

18). हृदय रोग – पाषाणभेद, पंचकोल क्वाथ हृदयरोगी के लिए लाभदायक होता है।

19). रक्तपित्त – पाषाणभेद, नागकेशर ठन्डे जल से या दूस्वरस से सेवन करना हितकारी है।

20). खांसी – पाषाणभेद, बहेडा (सेका हुआ) चूर्ण शहद में मिलाकर सेवन करें।

21). अग्निमांद्य (भूख न लगना) – पाषाणभेद, अजमोद, मरिच क्वाथ में सेंधा नमक और हींग मिलाकर सेवन करने से मंदाग्नि मिटती है।

22). गुल्मरोग (वायु गोला) – पाषाणभेद, अजवाइन, चव्य और सोंठ का क्वाथ गुल्म में हितकारी है।

23). प्लीहा वृद्धि (तिल्ली का बढ़ना) – पाषाणभेद, रोहितक छाल और पिप्पली का क्वाथ प्लीहावृद्धि में लाभ पहुंचाता है।

24). उपदंश (सिफलिस) – पाषाणभेद, सारिवा और अमलतास का क्वाथ रक्त विकार में लाभदायक है।

पाषाणभेद से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

पाषाणभेदादि अश्मरीहर कषाय –

पाषाणभेद, सागौन के फल, पपीते की जड़, शतावर, गोखरू, बरूना की छाल, कुश (डाभ) के मूल, कांस के मूल, चावल धाने के मूल, पुनर्नवा, गिलोय, अपामार्ग के मूल और खीरा-ककड़ी के बीज प्रत्येक समभाग, जटामांसी तथा खुरासानी अजवाइन के बीज या पत्ती प्रत्येक दो भाग लें, सबको जौकुट करके रखलें।

इसमें से 10-12 ग्राम लें, उसके सोलहगुना पानी में पका चतुर्थांश जल बाकी रहे तब कपडे से छान उसमें 5 -10 रत्ती (एक रत्ती=120 मि0ग्रा0) शिलाजीत अथवा 10 रत्ती क्षार पर्पटी या जवाखार मिलाकर पीने को दें। इस प्रकार रोगी को दिन में 3-4 बार पिलावें।

इस क्वाथ को हजरूल यहूद की भस्म के साथ देने से विशेष लाभ होता है। इसका अश्मरी (पथरी) शर्करा (रती) तथा उससे होने वाले गुर्दे और पेट के दर्द में प्रयोग करें। -सि0 यो0 सं0

पाषाणभेद का अर्क –

पाषाणभेद के मूल को यवकुट कर उसमें दुगना जल मिलाकर छाया में रखें। जल सूखने से द्रव्य गाढ़ा हो जाय तब उसमें पुनः उतना ही पानी मिलाकर आठ प्रहर रखें फिर अर्कयन्त्र से अर्क खींच लेवें। यह अर्क मूत्रकृच्छ, गुल्म, योनिरोग आदि को मिटाता है। -अर्क प्रकाश

पाषाणभेद पाक –

पाषाण भेद एक किलो चूर्ण कर वस्त्र से छान लेवें। उसे चार लीटर-गोदुग्ध में डालकर मृदु आंच से पकावें। इसे तब तक कछली से चलाता रहे तब तक कि गाढ़ा न हो जाये।

फिर छोटी इलायची के बीज, लौंग, पीपल, मुलेठी, आंवला, हरड, रेणुका (सभालू), गोखरू, अडूसा, सरफोंका की जड़, पुनर्नवा की जड़, यवक्षार, जटामांसी, इन्द्रायण की जड़, छतिवन की छाल प्रत्येक 60-60 ग्राम लेकर कपड़छान चूर्ण करें।

वंगभस्म, लौहभस्म, अभ्रक भस्म, कपूर, कचूर चूर्ण, तेजपात चूर्ण, नागकेसर चूर्ण, दालचीनी चूर्ण, शुद्ध शिलाजीत प्रत्येक 30-30 ग्राम लेवें। चीनी एक किलो पांच सौ ग्राम लेकर गोदुग्ध में (या जल में) छोड़कर चासनी बनावें। इस चासनी में उक्त समस्त औषध छोड़कर खूब चलाकर मिला देवें। शीतल हो जाने पर उसमें एक किलोग्राम मधु मिला देवें।

इसे कांच के जार या बरनी में रखें। मात्रा 10-12 ग्राम। यह प्रबल पथरी भेदक है। समस्त वस्ति विकार, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेहादि का नाशक है सेवन के समय तीक्ष्ण द्रव्य, तैलादि न खायें। -यो०र०

पाषाणभेदादि चूर्ण –

पाषाणभेद, अडूसे, गोखरू, पाढ, बड़ी हरड़, त्रिकटु, कचूर, दन्ती की छाल, हैंस (हिंस्रा), खुरासानी अजवाइन, शलिञ्च शाक, ककड़ी के बीज, खीरा के बीज, कलौंजी, हींग, अम्लतास,छोटी कण्टकारी, बड़ी कण्टकारी, हाऊबेर तथा बच इनके चूर्ण सेवन करने से अश्मरी दूर होती है। -च0 सं0

पाषाणभेदादि घृत –

उपर्युक्त पाषाणभेदादि चूर्ण के द्रव्यों का कल्क एक किलो, गोघृत चार किलो और पाकार्थ गोमूत्र 16 किलो लेकर घृत सिद्ध कर लें। यह घृत भी पथरी में उपयोगी है। -च0सं0

पाषाणभेद के दुष्प्रभाव (Pashanbhed ke Nuksan in Hindi)

  • पाषाणभेद के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • पाषाणभेद का अधीक मात्रा में सेवन पेट में मरोड़ जैसी समस्या उत्पन्न कर सकता है ।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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