पेट की बीमारी : कारण, सावधानियाँ और बचाव के उपाय – Pet ki Bimari se Bachne ke Upay

पेट के रोग : कुछ सावधानियाँ और बचाव

मनुष्य का शरीर ईश्वर की अद्भुत कृति है। इस शरीर रुपी यंत्र से अनेक यंत्रों का अविष्कार संभव हो पाया है। इस यंत्र का मुख्य भाग उदर है जहां मनुष्य द्वारा उपभोग की गई वस्तु सर्वप्रथम पहुंचती है एवं वहां इसका पाचन होकर उससे रुधिर, वीर्य, मल व मूत्र इत्यादि बनने की क्रिया होती है।

यह शरीर का केन्द्र बिन्दु है। इसमें जिन आन्तरिक गुणों से युक्त भोजन साम्रगी जाएगी वैसा ही मन बनेगा, वैसी ही विचार शक्ति की उत्पत्ति होगी, वैसा ही शारीरिक व आत्मिक बल बनेगा। यही जीवन का आधार है, इसी से मनुष्य का ओज, शरीर की बनावट एवं शारीरिक उर्जा का निर्माण होता है लेकिन सामान्य व्यक्ति इस बात को भूल गया है कि प्रभु द्वारा निर्मित इस अद्भुत यंत्र की पाचन शक्ति अलग अलग व्यक्तियों के लिए अलग अलग है, हर एक समान मात्रा में व समान रुप से खाद्य सामग्री अपने उदर में प्रेशित नहीं कर सकता है।

अपनी क्षमता के अनुसार उसके द्वारा उपभोग में ली गई खाद्य सामग्री से ही उसके शरीर की पुष्टता, बनावट, व शक्ति का निर्माण होता है। अपने को प्रिय एवं स्वादिष्ट लगने वाले भोजन व पेय के स्थान पर शरीर के लिए आवश्यक कैलोरी देने वाले श्रेष्ठ एवं सात्विक भोजन का चयन करना अपने हित में अनिवार्य होता है, सही चयन एवं उसके नियमित उपयोग से स्वयं के स्वास्थ्य को तो ठीक रखेगा ही साथ ही घर परिवार में खुशहाली एवं अच्छा वातावरण का निर्माण करेगा। गलत चयन अपनी आदतों को बिगाड़ने के साथ साथ अनेक बीमारियों को भी निमंत्रित करेगा। इसलिए कुछ भी खाने या पीने के पहले 1 मिनट के लिए सोचना नितान्त आवश्यक है कि क्या इसे पेट में जाने की इजाजत दी जाए या नहीं क्योंकि संभव है कि खाद्य साम्रगी तो निःशुल्क उपलब्ध हो रही हो लेकिन पेट की बीमारी का इलाज कितना मंहगा हो सकता है, इसका अंदाज नहीं लगाया जा सकता है।

किसी से भी आहार विषाक्तता (Food Poisoning) हो सकता है। आजकल निजी अस्पताल अपनी कमाई दुगनी तिगुनी करने के इन्तजार में बैठे है। वैसे बुरा न माने तो एक बात कहे कि आप अपने वाहन में पेट्रोल के स्थान पर डीजल या उसमें ऑयल नहीं मिलाते क्योंकि उसका इंजन बैठ जाएगा जबकि उसकी कीमत कुछ लाख से अधिक नहीं होती जबकि आपका यह अमूल्य शरीर रुपी यंत्र करोड़ों रुपये खर्च करने पर दुबारा नहीं मिलेगा। इसको थोड़ी सी सावधानी से ठीक रखा जा सकता है एवं थोड़ी सी मानसिक कमजोरी से या स्वाद के चक्कर में बीमार किया जा सकता है। अब उन कारणों को देखे जिसके कारण उदर रोग होने की पूर्ण संभावना रहती है ।

पेट की बीमारियों के कारण (Causes of Stomach Illness in Hindi)

pet ki bimari kyu hoti hai iske karan –

1). मृत भोजन का सेवन : बेकरी में बनी खाद्य सामग्री, मैदे से बनी वस्तुएं, मिठाइयां, नमकीन, फास्ट फूड, बासी भोजन, तले हुए एवं तेज मसालों से युक्त भोजन, फ्रिज में रखा पुराना भोजन इत्यादि में शरीर को निरोगी रखने वाले औषधीय गुण नहीं होते अतः वे मृत भोजन कहलाते है ।
एक तो वे यह आहार देरी से पचते है, दूसरा कभी कभी यह पेट में ऐसा दर्द करते हैं कि चिकित्सक से इलाज करवाना अनिवार्य हो जाता है।

आप एक परिक्षण करे कि एक सादी रोटी एवं एक तली हुई पूड़ी को अलग अलग पानी के बर्तन में रखे और देखे कि पहले पानी में कौनसी घुलती है। वही जल्दी पाचन योग्य होती है। रोटी पूड़ी से तीन गुणा कम समय में पानी में गल जाती है । इसी प्रकार वह हमारे पेट में भी शीघ्र पच जाती है।

2). चबा चबा कर नहीं खाना : सामान्य रुप से 32 दांतों का पूर्ण उपयोग हम भोजन को चबाने के लिए नहीं करके जल्दी-जल्दी 5 या 10 मिनट में भोजन कर लेते हैं। इससे न तो भोजन पूरी तरह से पीसता है और न ही वह लारयुक्त बन पाता है। इससे वह देरी से पाचन योग्य बन जाता है क्योंकि आमाशय में दातों का प्रतिस्थापन यंत्र नहीं है जो कि उसका ग्राइंडिग कर सके, दांतो द्वारा ग्राइंडिग नहीं होने से वहां के अम्लपित्त में वृद्धि होती है एवं वहां वह अधिक देर तक पड़ा रहता है एवं सड़ता भी है, जिससे गैस बनती है, पेट फूलता है। पाचन क्रिया गड़बड़ा जाती है व उससे अनेक रोग होने की संभावनाएं बन जाती है।

3). भूख से अधिक भोजन करना : बहुत से व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन को देखकर अत्यधिक मात्रा में भोजन को पेट में डाल लेते हैं, अपनी सामर्थ्य से अधिक खाना रोग को निमन्त्रित करना है। फिर भूख न होने पर किसी के मनुहार पर खा लेना और भी ज्यादा पेट को खराब करता है। पेट में तीन चौथाई स्थान से ज्यादा नहीं भरा जाना चाहिए, बेमेल आहार भी नहीं होना चाहिए, खूब मिठाइयां, आइसक्रिम और उसके बाद दूध या कोल्डड्रिंक भी इस प्रकार से किए गए भोजन से पेट में पाचन क्रिया ठीक से नहीं हो पाती। पहले आलस्य आता है फिर नींद आ जाती है। इससे स्वभाविक रुप से पेट खराब हो जाता है, अम्लपित्त की वृद्धि, गैस, मधुमेह व अनेक रोग इससे हो जाते है।

4). अनियमित भोजन : कुछ लोग कार्य की व्यस्तता में भोजन का समय हो जाने पर भी उसे टाल देते हैं या चाय पी लेते है या किसी भी समय मेहमान के आने पर उनके साथ चाय नमकीन या बिस्कुट आदि लेते रहते हैं। इससे उनके भोजन के समय का भान नहीं रहता है न ही सच्ची भूख लगती है। इससे उनकी कार्यक्षमता में तो कमी होती ही है साथ ही सिर दर्द, बी. पी. इत्यादि रोग शीघ्रता से हो जाया करते हैं।

5). भोजन के साथ पानी या कोल्डड्रिंक पीने की आदत बना लेना : तेज मसालेयुक्त भोजन के सेवन से भोजन के बीच या बाद में अधिक पानी पीना भी पाचन क्रिया को धीमा करता है। कुछ लोग भोजन के साथ साथ कोल्डड्रिंक लेते है ताकि खाना अच्छी मात्रा में खा सके तथा गरिष्ठ या मांसाहारी भोजन का आनन्द ले सके यह भी भोजन करने के नियमों के विपरीत है। आवश्यकता पड़ने पर अल्प मात्रा में हल्का गर्म पानी या छाछ ( बिना मक्खन के पानी युक्त दही) लिया जा सकता है। ठण्डा पेय जठाराग्नि को कम करके पाचन क्रिया धीमी कर देता है।

6). भोजन पाचन की औषधियों व अन्य औषधियों का नियमित उपयोग : औषधियों का उपयोग पाचन शक्ति को कमजोर बनाता है। इनके निरन्तर उपयोग से पाचन शक्ति का पुनः शक्तिकरण बहुत मुश्किल हो जाता है।

( और पढ़े – क्या खाये क्या न खाये और भोजन के जरुरी नियम )

पेट की बीमारियों से बचने के उपाय (Tips to Prevent Stomach Problems in Hindi)

pet ki bimari se kaise bache –

उदर रोग का मुख्य कारण व्यक्ति के भोजन एवं पेय है उन्हें निम्न समयानुसार लेने से तथा कुछ विशेष सावधानियां रखने से उदर रोग होने की संभावना न्यून हो जाती है:

  1. प्रातः पेय : सुबह उठते ही बेड टी के स्थान पर हल्का गर्म मेथी-पानी या नींबू-पानी-शहद या शहद-पानी अथवा गर्म हर्बल टी गुड़ के साथ बिना दूध की ली जा सकती है। जैसा मौसम हो, जैसी इच्छा हो या जैसा स्वास्थ्य हो उस अनुरुप पेय लिया जा सकता है। जिनको वजन कम करने की इच्छा हो उन्हें प्रथम दोनों में से एक लेना चाहिए।
  2. नाश्ता : सवेरे के नाश्ते में आलू या सादे तले हुए पराठे, दही, डबल रोटी या ब्रेड स्लाइस मक्खन टोस्ट व चाय इत्यादि न लें बल्कि उस के स्थान पर मौसमी फल, दूध, अंकुरित चना, मूंग, मेथीदाना अथवा दही की छाछ ली जा सकती है।
  3. ऑफिस या व्यवसायिक स्थान पर आने वाले मेहमानों के लिए चाय के स्थान नींबू पानी शहद, छाछ, मौसमी फलों के रस, बेल शरबत या जूस, हर्बल टी इत्यादि में से कुछ भी पसन्द के अनुसार सर्व कर सकते है। सर्व करने का तात्पर्य यह नहीं है कि मेहमान का साथ देने के लिए स्वयं भी हर समय ले। भोजन नली में तीन घंटे के बाद ही कुछ प्रेशित करना ठीक रहता है। फलों के या गाजर का रस स्वास्थ्य वृद्धि के साथ कार्य दक्षता को विकसित करता है। छाछ भूख में वृद्धि करने के साथ साथ पाचन शक्ति में वृद्धि करती है।
  4. लंच : दिन के समय लंच में एक दो प्रकार की हरी सब्जियॉ (कम मिर्च मसालों की, गर्म मसाला रहित, कम तेल या घी में बनी हुई), बिना माड निकाला हुआ चावल या चोकर सहित आटे से बनी रोटियां, छिलके सहित कुकर में पकाई दाल तथा लौकी का रायता या दही इत्यादि ले सकते हैं।
  5. अपरान्ह : अपरान्ह में फल व सूखे मेवे ले सकते हैं अथवा चाय की तलब अधिक हो हर्बल टी शक्कर व दूध के साथ ले सकते हैं।
  6. सांयकालीन भोजन : रात्रि के भोजन के स्थान पर संध्या के थोडी देर बाद ही भोजन का समय बनावे क्योंकि सोने के तीन चार घंटे पहले भोजन लेना स्वास्थ्य के लिए हितकारी रहता है। भोजन में सुपाच्य हलका भोजन लंच की तरह या उम्र के हिसाब से दलिया अथवा खिचड़ी, इडली इत्यादि में से कुछ ले सकते हैं। रात्रि मे दही नहीं लेवे। भोजन संयमित मात्रा में ही ले।
  7. आजकल प्रत्यक्ष रुप से उपलब्ध पानी पूर्ण रुप से स्वच्छ नहीं होता है। अतः पानी की शुद्धता को जांच कर पानी का उपयोग करें। पानी भोजन के एक घंटा बाद ले एवं जब भी प्यास लगे अवश्य लें।
  8. भोजन हमेशा शुद्ध अन्न का होना चाहिए यानि अपनी नैतिकतायुक्त अर्जित कमाई का हो तथा पवित्र मन से पका हुआ हो। खाते समय भी प्रसन्नता पूर्वक उसका सेवन करना चाहिए। क्रोधी मन से खाया भोजन विकार उत्पन्न करता है। अखबार पढ़ते पढ़ते या टी.वी. देखते हुए अथवा दूसरों की आलोचना या शिकायतें सुनते सुनते भोजन करना आध्यात्मिक नियमों में वर्जित है।
  9. भोजन के तुरन्त बाद वज्रासन किया जा सकता है। पैरों को मोड़ कर अपने घुटनों के बल इस प्रकार जमीन पर बैठे कि पीछे पांव के अंगुठे मिले हुए हो, एड़िया खुली, एड़ियों पर नितम्ब हो तथा मेरुदण्ड सीधा हो व हाथों को सीधा रखते हुए सामने की ओर देखे। इस आसन से पाचन शक्ति बढ़ती है। इसको 1 मिनट से आरंभ करके कम से कम 5 मिनट अवश्य करें। अभ्यास हो जाने पर इस आसन पर बैठ कर समाचार पत्र पढ़ा जा सकता है। अम्लपित्त वालों के लिए यह आसन बहुत ही लाभकारी हैं।

भोजन को उदर भरण सामग्री नहीं मानते हुए उसे शरीर को निरोग रखने की औषधि मानकर उचित भोजन का चयन कर अच्छी भूख लगने पर धीरे-धीरे प्रसन्नता पूर्वक खाया जाता है तो वह भोजन यथार्थ में शरीर रक्षक औषधि बन जाती है एवं अन्य औषधियों की फिर आवश्यकता ही नहीं रहती। इसलिए भोजन का चयन एवं उसकी मात्रा बहुत ही महत्वपूर्ण है।

थोड़ी सी पेट में गड़बड़ महसूस होने पर उपवास एवं नींबू पानी का उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी रहता है। नैतिकता से अर्जित सात्विक भोजन स्वयं को प्रफुल्लित करता ही है साथ ही घर, परिवार व अपने व्यवसायिक सह कर्मियों को भी प्रसन्नता प्रदान करता है। इसलिए सुबह सुबह अपने अन्तर में कुछ देर देखिए, ध्यान कीजिए, विचार कीजिए तथा योगासन, प्राणायाम व ध्यान को अपने जीवन का मुख्य अंग बनाइए ताकि उदर रोग क्या किसी भी प्रकार का रोग आपका मेहमान नहीं बने।

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