रोग क्यों होते है उनके कारण प्रकार लक्षण और बचाव के उपाय

रोग क्या है ? : rog kya hai

हमारे शरीर की गन्दगी फेफड़ों और साँस द्वारा, त्वचा के असंख्य छिद्रों द्वारा पसीने के रूप में तथा पेट की गन्दगी मल-मूत्र के रास्ते सदा निकलती रहती है। यदि कभी इन साधारण मार्गों से शरीर का मल भली-भाँति सुचारु रूप से जब नहीं निकल पाता तो प्रकृति मजबूर होकर उसी कार्य के लिए असाधारण रूप धारण करती है। उन्हीं असाधारण रूपों को उचित भाषा में ‘रोग’ कहते हैं और प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान की भाषा में-मूल रोग के लक्षण कहते हैं जिसको निकालने के लिए प्रकृति ज्वर, दस्त, फोड़ा आदि उत्पन्न करती है।

इस प्रकार शरीर रक्षा के लिए, शरीर से मल निकालने के लिए, प्रकृति के प्रयत्न और प्रबन्ध को- रोग या रोग के लक्षण कह सकते हैं ।

प्रत्येक रोग शरीर में संचित विष को सहन की सीमा के अतिक्रमण का दूसरा नाम है। योगसूत्र के अनुसार कफ ही रोग है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि रोग चिह्न हमें चेतावनी देते हैं कि विजातीय द्रव्य रूपी शत्रु ने हमारे शरीररूपी भवन में केन्द्र स्थापित कर लिया है जिससे हमें सजग और सावधान होना चाहिए ।

रोग का एक और नाम शरीर की अस्वाभाविक अवस्था भी है। साधारण रूप में जब रोग सुषुप्तावस्था में विजातीय द्रव्य के रूप में शरीर के किसी अंग विशेष अथवा समस्त शरीर में व्याप्त रहता है। रोग का न तो कोई नाम होता है और न ही उसकी कोई आकृति होती है, किन्तु ज्यों-ही वह बाहर निकलने के लिए प्रकट रूप में आता है तो विविध नामों और रूपों में विख्यात होता है। जैसे-फोड़ा निकलने के बहुत पहले फोड़े का बीज शरीर में मल के रूप में आरोपित हो चुका रहता है जो बेनाम, बेशक्ल तथा बिना हमारी जानकारी के शरीर में पड़ा-पड़ा वृद्धि को प्राप्त होता है और समय पाकर जब वही बीजरूपी जल फोड़े का रूप धारण कर लेता है तब उसके कई रूप और नाम जैसे जहरबाद, कारबन्कल, चेचक, गलका, गूंगी आदि देखने तथा सुनने में आते हैं ।

इसी प्रकार शरीर का संचित मल समय और परिस्थितियों के अनुसार कभी ज्वर के रूप में प्रकट होता है तो कभी दस्तों के रूप में और कभी किसी और अन्य रोग के रूप में । कारण प्रत्येक स्थिति में एक ही होता है। परन्तु परिणाम भिन्न-भिन्न रूपों में तथा भिन्न-भिन्न नामों से दृष्टिगोचर होते हैं।

रोग और उसके कारण : rog kyu hota hai

प्रत्येक रोग के लिए-उस रोग के ‘कीटाणु’ विशेष को ही दोषी ठहराते हैं, परन्तु प्राकृतिक चिकित्साचार्यों का सिद्धान्त इस सम्बन्ध में इन सब विद्वानों से भिन्न है ।
प्राकृतिक चिकित्सक तो रोगों का कारण मूलतः स्वयं उस रोगी को ही मानते हैं जिसको कोई रोग होता है। रोग के मुख्यतः 2 कारण होते हैं –

  1. बाह्य (Objective)
  2. आन्तरिक (Subjective)

शारीरिक धर्म अथवा स्वास्थ्य सिद्धान्त के विरुद्ध आचरण करना रोग का बाह्य कारण और अनिष्टकारी मनोवृत्तियों का असंगत प्रयोग तथा अहितकर चिन्तन, कल्पना, भय आदि उसके आन्तरिक कारण होते हैं।

यदि हम रोगी हैं तो उसका एकमात्र यही कारण है कि प्रकृति तथा प्राकृतिक नियमों को भंग कर रहे हैं, अर्थात् हम प्राकृतिक जीवन व्यतीत नहीं कर रहे। इस प्रकार रोग होने के मुख्य कारण निम्नांकित हैं –

(1) अप्राकृतिक जीवनयापन –

प्राकृतिक जीवन ही आजकल फैली हुई असंख्य बीमारियों और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्त दोषों की एकमात्र औषधि है। वास्तव में हममें कुछ आदतें ही ऐसी हैं जो हमें स्वस्थ रहने ही नहीं देतीं, उनमें से मुख्य निम्नांकित हैं –

  1. भोजन सम्बन्धी बुरी आदतें।
  2. मानसिक कुविचार।
  3. आलस्य।
  4. मिथ्योपचार।
  5. पंचतत्त्वों का कम-से-कम उपयोग।
  6. अनियमित भोग-विलास।
  7. कृत्रिमता से अनुराग।

प्राकृतिक जीवन-

संयम का जीवन है । उसे सदाचार भी कहते हैं । संयम, सदाचार, सच्चरित्रता स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के नाम हैं । असंयम ही वस्तुतः समस्त रोगों की मूल जड़ है।

(2) विजातीय द्रव्य –

रोग होने का दूसरा मुख्य कारण है प्राकृतिक जीवनयापन के फलस्वरूप हमारे शरीरों में विजातीय द्रव्य का बढ़ जाना और उसका शरीर के मलमार्गों द्वारा साधारणतः न निकल पाना । वैद्यकशास्त्र में विजातीय द्रव्य को दोष कहते हैं और इस दोष को ही रोग का कारण माना गया है।

निकालकर उसे निर्मल बनाने की शक्ति नहीं होती। उसका सारा सौन्दर्य एवं आकर्षण धूल-धुसरित हो जाता है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, भूख मर जाती है, नींद हराम हो जाती है। शरीर का विकास रुक जाता है तथा शरीर में सदैव एक-न-एक रोग बना ही रहता है। शरीर की समस्त प्रकार की रुग्णावस्था का मूल कारण उसमें जीवनशक्ति का हास ही है।

जीवनशक्ति के ह्रास के मुख्य कारण निम्नांकित हैं :

  1. शक्ति से अधिक श्रम करना।
  2. रात्रि में कार्य करना।
  3. चिन्ता आदि मानसिक व्याधियाँ ।
  4. अप्राकृतिक औषधियों का सेवन आदि मिथ्योपचार ।

(3) वंशपरम्परा संस्कार –

वंशपरम्परा संस्कार भी रोगों की उत्पत्ति का मुख्य कारण है। रोगी और कमजोर माता-पिता की सन्तान भी रोगी और कमजोर होती है, यह एक प्राकृतिक नियम है। जैसा बीज बोया जाएगा, वैसा ही फल आएगा। ऐसी स्थिति में भी रोग का मुख्य कारण रोगी के शरीर में वंशपरम्पराजन्य वही विजातीय द्रव्य की उपस्थिति ही होता है क्योंकि विकार द्वारा गम्भीर रूप से आक्रान्त माता-पिता से सन्तान में उसी रक्त के प्रभाव से विकार आना स्वाभाविक ही है, भले ही वह सूक्ष्म या अतिसूक्ष्म रूप से हो अथवा विष के रूप में हो।

(4) मिथ्योपचार –

शरीर में एकत्रित अनावश्यक मल ही असल रोग है। इस सिद्धान्त को मानने वाला कभी नहीं चाहेगा कि उसके शरीर में बाहर से कोई विजातीय पदार्थ पहुँचकर रोग का रूप धारण कर ले । हैजा, प्लेग आदि रोगों से बचाव हेतु स्वस्थ शरीर में विषों की सुईयाँ जबरदस्ती देना, इसके उदाहरण हैं । यही मिथ्योपचार है। रोग होने पर ठीक कारण के निराकरण के बदले रोगी को ऊपर से अत्यन्त उग्र औषधियों का सेवन मिथ्योपचार का उदाहरण है, जिससे विविध प्रकार के बाहरी विष शरीर में प्रवेश कर विष की मात्रा यानि रोग को बढ़ा देते हैं तथा रोग को पुराना बनाने में मदद करते हैं।

(5) आकस्मिक दुर्घटना एवं बाह्य प्रहार –

स्वस्थ व्यक्ति को अचानक चोट लगने से अथवा आकस्मिक दुर्घटना, त्वचा, माँस, शिरा, हड्डी आदि के टूटने-फूटने से अभिघातज रोगों की उत्पत्ति होती है। शल्यक्रिया भी इसी श्रेणी में आती है क्योंकि चीरफाड़ भी तो सीधा बाह्य प्रहार ही है।

(6) रोगोत्पादक जीवाणु –

एक स्वस्थ और निर्मल शरीर में संसार के कीटाणु भी किसी रोग को प्रारम्भ नहीं कर सकते, किन्तु एक ‘मल’ भरे शरीर में कोई भी रोगाणु उद्रेक उत्पन्न करके रोग के लक्षण उत्पन्न कर सकता है। क्योंकि रोगाणु मल में ही जीते हैं और निर्मलता से वे नष्ट हो जाते हैं । इसलिए जो जीवाणु शरीर में रोग को उभार करने वाले सिद्ध होते हैं, उन्हें रोगोत्पादक जीवाणु कहा जाता है।

रोगों के प्रकार : rog ke prakar

स्वास्थ्य की दृष्टि से विद्वानों ने मानव-शरीर के 3 पहलू बताए हैं-1. आध्यात्मिक, 2. मानसिक और, 3. शारीरिक । पूर्णरूपेण स्वस्थ शरीर वह होता है जो आत्मा, मन और शरीर-तीनों से स्वस्थ हो । इनमें से किसी एक की उपेक्षा करके पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं रहा जा सकता । इन्हीं तीनों पहलुओं के अनुसार ही रोग भी 3 प्रकार के होते हैं । अर्थात्-आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक । आध्यात्मिक दुर्बलताओं से मानसिक रोगों की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार मानसिक दुर्बलताओं से शारीरिक रोगों की उत्पत्ति होती है। तीनों प्रकार के रोगों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। हमारे पूर्वज शास्त्रकारों के मतानुसार भी तीन ही प्रकार की व्याधियाँ होती हैं-1. भाग्य से उत्पन्न व्याधियाँ ‘आधिदैविक’ कहलाती है। 2. शारीरिक व्याधियों को ‘आधिदैहिक’ कहते हैं एवं 3. भूतों या तत्त्वों के सम्बन्ध से उत्पन्न रोग अथवा व्याघ्र, सर्प आदि जीवोकृत पीड़ाएँ ‘आधिभौतिक’ के नाम से जानी जाती हैं।

(1) आध्यात्मिक रोग –

शरीर, मन और आत्मा का ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध है कि इनमें से किसी एक के बिगड़ने पर शेष के बिगड़ने में देर नहीं लगती । शरीर की उपमा गुलाब के पुष्प के साथ दी गई है। गुलाब के फूल का ऊपरी भाग तो उसका शरीर है और सुगन्ध उसकी आत्मा । कागज द्वारा निर्मित गुलाब के फूल को कोई पसन्द नहीं करता। जैसे गुलाब के समान दिखाई देने वाले गन्धहीन फूलों को लोग फेंक देते हैं, वैसे ही ऐसे शरीर पर किसी का प्रेम नहीं हो सकता, जो ऊपर से देखने में अच्छा लगता है किन्तु उसके अन्दर रहने वाली आत्मा के व्यवहार ठीक नहीं होते। बुरे चरित्र के लोगों की निरोगी लोगों में गणना नहीं की जाती। शरीर और आत्मा का ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध है कि जिसका शरीर निरोग होगा उसकी आत्मा भी अवश्य ही बलवती होती है। जगत को उत्पन्न करने वाले ईश्वर में अविश्वास करना सबसे बड़ा आध्यात्मिक रोग है । असत्य, अज्ञान तथा आत्मनिग्रह का अभाव इसके बाद दूसरे नम्बर के आध्यात्मिक रोग हैं तथा दुश्चरित्रता तीसरे नम्बर का । प्राकृतिक चिकित्सा के प्रबल समर्थक महात्मा गाँधी ने ‘राम’ नाम को समस्त रोगों की साधारणतयः और आध्यात्मिक रोगों की मुख्यतः रामबाण औषधि बताई है। जिसका प्रयोग वह अपने जीवनकाल में सदैव ही करते रहे।

(2) मानसिक रोग –

मानसिक व्याधियाँ शारीरिक व्याधियों से भी अधिक भयानक और अनिष्टकारी होती है। ये मानसिक बीमारियाँ मामूली-से-मामूली बातों को लेकर उत्पन्न हो जाती हैं, जिनका हम थोड़ी-सी भी बुद्धि-विवेक से काम लेकर सरलतापूर्वक प्रतिकार कर सकते हैं । इन व्याधियों में कुछ के नाम हैं-घृणा, प्रतिहिंसा, आलस्य, लोभ, चिन्ता, अहंकार, निराशा, ईर्ष्या, अज्ञान, भय, कामलिप्सा, असहिष्णुता, अविश्वास, स्वार्थपरता, उन्माद और वहम आदि ।

मानसिक रोगों के कारण –

यद्यपि देखने में मानसिक रोग, शारीरिक रोगों से भिन्न प्रतीत होते हैं, किन्तु उनके कारणों में भिन्नता नहीं होती । उनकी उत्पत्ति भी एकमात्र शरीर में विजातीय पदार्थ के भार से ही होती है, जो वर्षों से एकत्रित होता रहता है। लुईकूने के मतानुसार-

‘ये रोग तभी होते हैं । जब विजातीय द्रव्य शरीर में बहुत बढ़ जाता है और पीठ की ओर से रीढ़ की हड्डियों को आक्रान्त करता हुआ मस्तिष्क की कोमल ज्ञानेन्द्रियों आदि पर अधिकार कर लेता है।’

जीवनशक्ति के ह्रास एवं अप्राकृतिक जीवन के परिणामस्वरूप पाचन के खराब होने से विजातीय पदार्थ अज्ञानतावश से धीरेधीरे एकत्र होकर मानसिक रोग पैदा कर देते हैं । इन रोगों का होना अथवा न होना विजातीय द्रव्य की वृद्धि और मात्रा पर निर्भर करता है। पृष्ठ भाग में विजातीय द्रव्य का भार बढ़ जाने पर आमाशय की नाड़ियों, सुषुम्ना आदि पर प्रभाव पड़ता है, जो मानसिक रोगों का मुख्य कारण होता है। संयमी और सात्विक विचार वाले व्यक्तियों को मानसिक रोग कम होते हैं।

मानसिक रोग अथवा मनोविकार शारीरिक स्नायु के मार्ग को अवरुद्ध करके तन्तुओं को नष्ट करके जीवनशक्ति की क्रिया में बाधक होकर तथा मल विसर्जन में रुकावट खड़ी करके शारीरिक रोग को भीषण बना देते हैं। अधैर्य, क्रोध और चिड़चिड़े से ज्वर बढ़ते हैं । फ्रायड तथा जुंग नामक पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि रक्ताल्पता, हृदयरोग, हिस्टीरिया, स्नायुदौर्बल्य, वीर्यदोष यहाँ तक कि लकवा और क्षय जैसे संहारक रोगों के मूल में मनोविकार का सबसे बड़ा हाथ होता है । अतः यह मिथ्या नहीं है कि मनुष्य के 90% रोग केवल मनःस्थिति से प्रारम्भ होते हैं । शरीर के रोग हमारे मन की ही देन है।

(1)-भय – भय एक मानसिक रोग है। इसका आघात बड़ा भयंकर होता है । भय के कारण लोग मरते तक देखे गए हैं। इसका आक्रमण जब होता है तो शरीर विष से भर जाता है और हृदय की गति अति तीव्र हो जाती है। नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जाती है और कभी कभी समाप्त तक हो जाती है। भूख हवा हो जाती है, दस्त या अन्य शारीरिक व्याधियाँ आ दबोचती हैं और रोगी थर-थर काँपते हुए निर्जीव-सा हो जाता है । पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भय के 27 रूप बताए हैं । इसी प्रकार भूतप्रेत के भय से, रस्सी को साँप समझ लेने आदि से लोगों का वर्षों बीमार रहना, प्रतिदिन की आम घटनाएँ हैं।

(2)- क्रोध – क्रोध, दूसरा भयानक मानसिक रोग है। इसके भी विविध रूप होते हैं । इस रोग से भी रोगी के शरीर में तीव्र विष की उत्पत्ति होती है, जो खून को जला डालता है और समस्त ग्रन्थियाँ ‘एड्रिनलीन’ नामक एक रासायनिक विषैला पदार्थ रुधिर के के अन्दर छोड़ने लगता है। क्रोध से पाचनक्रिया दूषित हो जाती है और पेट का पाचकरस, विष में परिवर्तित हो जाता है।

(3)- चिंता – तीसरा प्रसिद्ध मानसिक रोग चिन्ता है, जिसकी विभीषिका चिता से भी बढ़-चढ़कर बताई जाती है। चिन्ता स्वास्थ्य और सौन्दर्य की सबसे बड़ी दुश्मन है। भय चिन्ता की जननी है। चिन्ता से भी क्रोध की ही भाँति रक्त में रासायनिक परिवर्तन होता है, जिससे रक्त अशुद्ध होकर सूखने लगता है जिसके कुपरिणामस्वरूप शरीर सूखकर काँटा हो जाता है, त्वचा बदरंग हो जाती है, होंठ फीके पड़ जाते हैं, नाक नीली हो जाती है और गाल पिचक जाते हैं । ऐसे रोगियों की पाचन क्रिया बिगड़कर यक्ष्मा रोग शीघ्र ही दबोच लेता है । चिन्ताग्रस्त मनुष्य को नींद नहीं आती और उसे अपना जीवन भारस्वरूप लगने लगता है। सुप्रसिद्ध विद्वान आर्नल्डवन्नट के कथनानुसारयह निश्चित है कि हमारी 80% चिन्ता, वह कीड़ा है जो सुखरूपी वृक्ष की जड़ को खोखला बना डालता है। यदि इस बिल्कुल निःसार, मूर्खतापूर्ण एवं घातक चिन्ता से सर्वथा दूर रहना संभव हो जाए तो स्वर्ग ही पृथ्वी पर उतर आए।

(4)- ईर्ष्या-द्वेष – ईर्ष्या-द्वेष, चौथा मानसिक रोग है जिसके सम्बन्ध में केवल मनोविश्लेषकों ने ही नहीं बल्कि आधुनिक औषधि विज्ञान ने भी कई अनुसन्धानों से यह सिद्ध कर दिया है कि ईर्ष्या-द्वेष स्वास्थ्य के लिए उतना ही अधिक घातक सिद्ध हो सकता है जितना कि तपेदिक या हृदय रोग। इन ईर्ष्या के प्रहार से केवल मानसिक सन्तुलन में ही विकृति नहीं आती, वरन् लकवा, अन्धापन और कैंसर तक होने के प्रमाण मिले हैं। ईर्ष्या से हमारे रक्त में विष का संचार हो जाता है। लगभग 56% ‘वात-रोग’ ईर्ष्या के ही परिणाम होते हैं जो जेफक्राइल ने लिखा है ईर्ष्या से मानसिक तन्तुओं एवं स्नायुप्रणाली में सिकुड़न होने लगती है। अन्तर्मन के आदेशों पर ईर्ष्या के आदेशों की प्रधानता हो जाती है। शरीर के जोड़-जोड़ जकड़ जाते हैं तथा रक्त की गति में बाधा उपस्थित हो जाती है, परिणामतः शरीर के विभिन्न अवयव सुन्न पड़ने लगते हैं । डॉ. गिलर्ड ने अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध करने में सफलता पाई है कि पाचन सम्बन्धी अनेकों विकार ईर्ष्या से ही उत्पन्न होते हैं। पराकाष्ठा पर पहुँची ईर्ष्या पागलपन उत्पन्न करने में भी सफल होती है।

मानसिक रोगों से बचाव –

मानसिक रोग बड़े हठीले और दुःसाध्य होते हैं, पर असाध्य नहीं । किन्तु यदि आत्मबल कम हो, जीवनीशक्ति मर-सी गई हो और शरीर में विजातीय द्रव्य का स्थान ऐसा हो कि प्राकृतिक उपचारों द्वारा उसका निकाला जाना संभव न हो तो ऐसे रोगों को असाध्य ही समझना होगा। मानसिक रोगों को मिटाने में मानसोपचार में बड़ी सहायता मिलती है। मानसिक रोगों को रोकने में निम्नांकित नियमों के पालन से सहायता मिल सकती है –

  • मन के अशान्त-अशान्ति के कारण की ओर से मन को हटा लेने से प्रयत्न करना चाहिए और उसके सम्बन्ध में सोचना-विचारना एकदम बन्द कर देना चाहिए।
  • सदैव दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि हम किसी से अपने अधिकार का सम्मान तभी करा सकते हैं जब उसके अधिकार का सम्मान हम स्वयं करें।
  • हमें सदैव ‘नेकी कर दरिया में डाल’ की कहावत चरितार्थ करते हुए दूसरों पर उपकार करते जाना चाहिए, यदि उन उपकारों का बदला न मिले तो हमें कदापि दुःखी नहीं होना चाहिए।
  • उत्तेजित होना, उग्रता दिखाना, बहस करना, किसी को डराना-धमकाना, अपनी बात को ही सर्वोपरि रखना एवं अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा करना आदि मानसिक कमजोरियाँ हैं, उन्हें दूर करना चाहिए।
  • जो मानसिक कष्ट, दिक्कतें, अड़चनें और बाधाएँ उपस्थित होती हैं, वे मात्र हमारे साथ ही नहीं वरन् अन्य सभी के साथ भी हो सकती हैं। ऐसे सुविचारों से आत्म सन्तोष की उपलब्धि होती है।
  • संसार के समस्त कार्यों को भगवान की इच्छा समझते हुए अपने को निमित्त मात्र समझना चाहिए तथा ईश्वर के प्रति आत्म-समर्पण की भावना को अपना रक्षाकवच समझना चाहिए।
  • यदि मन चंचल हो जाए तो जोर-जोर से अच्छी पुस्तकों का पढ़ना ‘राम-राम’ आदि भगवन्नामों का जप आरम्भ कर देने के साथ एक गिलास ठण्डा पानी पी लेना चाहिए या उस स्थान से कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए।
  • मन के विकृत होने पर उससे लड़ना नहीं चाहिए जबकि मन को अपना गुलाम या आज्ञाकारी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए, जो उसका वास्तविक स्वरूप है।
  • अपने आप में आत्मनिर्भरता, आत्म सम्मान और आत्मबल सदा भरते रहना चाहिए।

( और पढ़े – मानसिक रोग के कारण व घरेलू उपचार )

शारीरिक रोगों का वर्गीकरण :

  1. व्याधियों के रूप और लक्षण अनेक होते हैं, जिनका विभाजन आयुर्वेद में 4 श्रेणियों में किया गया है –
  2. शरीर में विजातीय द्रव्यों के कारण जो रोग होते हैं, उन्हें शारीरिक रोग कहते हैं, जैसे-ज्वरादि।
  3. अभिघात आदि से जो पीड़ाएँ होती हैं, उन्हें ‘आगन्तुक रोग’ कहते हैं, जैसे पेड़ से गिरना जैसी दुर्घटना आदि।
  4. क्रोध, शोक, भय आदि रोगों को ‘निमित्तक मानसिक रोग’ कहते हैं ।
  5. क्षुधा, प्यास, जरा एवं मृत्युजन्य क्लेश ‘स्वाभाविक रोग’ कहलाते हैं।

शरीर में विजातीय द्रव्यों की उपस्थिति के फलस्वरूप जितनी व्याधियाँ होती हैं, उनको 2 भागों में बाँटा जा सकता है-

तीव्र रोग (Acute Disease) 2. मन्द या जीर्ण रोग (Chronic Disease) अर्थात् पुराने रोग।

तीव्र रोग किसे कहते हैं ? –

जिस रोग में तेजी हो, उसे तीव्र रोग कहेंगे। जैसे-हैजा, चेचक, दस्तादि। ये रोग जितनी तेजी से आते हैं, उचित उपचार से उतनी ही जल्दी चले भी जाते हैं । तीव्र रोग अपना उपचार स्वयं होते हैं। जब शरीर में या उसके किसी भाग में अधिक मल एकत्र हो जाता है तो उसका निष्कासन तीव्र रोगों के रूप में होने लगता है, जो कुछ ही दिनों रहकर अर्थात् उस संचित मल को शरीर से निकालकर स्वतः ही चले जाते हैं और शरीर को भला-चंगा तथा निर्मल छोड़ जाते हैं ।

तीव्र रोग बच्चों एवं युवाओं को अर्थात् जिनकी जीवनीशक्ति प्रबल होती है, उन्हें विशेष रूप से होते हैं । तीव्र रोग हठीले उस वक्त जरूर हो जाते हैं, तब शरीर से मल निष्कासन के प्रयत्न में उनके सामने रोड़े डालने की कोशिश की जाती है । तीव्र रोग के विभिन्न लक्षण तो इस बात की सूचना देते हैं कि शरीर अपने को शुद्ध करने के लिए रोग को निर्मूल करने के लिए क्या और कैसा प्रयत्न कर रहा है ? उन लक्षणों का स्वागत करना चाहिए न कि उन्हें दवाओं, सुइयों तथा शस्त्रोपचार से दबाना चाहिए ।

तीव्र रोगों में उपवास और पूर्ण विश्राम बड़े ही लाभदायक सिद्ध होते हैं । यही कारण है कि तीव्र रोग के रोगी को चारपाई पर पड़ जाने के लिए प्रकृति विवश करती है, साथ-ही-साथ भूख को भी हर लेती है। तीव्र रोग का होना इस बात का सबूत है कि शरीर में जीवनीशक्ति सजग और सतेज है ।

प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक लिण्डल्हार ने अपनी पुस्तक-‘नेचर क्योर’ में तीव्र रोगों की साधारणतः 5 अवस्थाएँ लिखी हैं-प्रथमावस्था को रोग की तैयारी की अवस्था कह सकते हैं। पूरे शरीर में या उसके किसी भाग में मल के भर जाने से उत्तेजना होती है। फिर संचित मल में उद्रेक की क्रियाएँ धीरे-धीरे और कभी-कभी जल्दी-जल्दी भी होने लगती हैं जिनसे रोग अपना एक खास रूप धारण करता है । यह अवस्था कुछ मिनटों से लेकर कई वर्षों में पूरी हो सकती हैं । इस अवधि में रोग उत्पन्न करने में सहायक मल, विष अथवा रोगाणु आदि उत्पन्न होकर एकत्रित होते रहते हैं। दूसरी अवस्था में रोग का रूप अधिक भयंकर हो उठता है। इस अवस्था में कष्ट बढ़ जाता है। तनाव, सूजन, सुर्सी, ज्वर बढ़ जाते हैं और रोगी चारपाई पर पड़कर कमजोरी और पीड़ा का अनुभव करने लगता है।

तीसरी अवस्था में रोगाक्रान्त स्थान के कण नष्ट होने लगते हैं, जिनसे राह बन जाती है, घाव हो जाता है, मवाद और रक्त बहने लगता है। जैसा कि फोड़ा होने की दशा में होता है। पसीना, पेशाब के साथ विष निकलने लगता है। साँस से दुर्गन्ध आने लगती है, दस्त होते हैं, वमन भी हो सकता है । मल निष्कासन के इस प्रयत्न में शरीर के कुछ उपयोगी तत्त्वों का भी मल के साथ ही निकल जाना स्वाभाविक ही होता है जिससे दुर्बल शरीर और भी अधिक शिथिल हो जाता है। मस्तिष्क काम नहीं करता, रोग की यही सबसे उग्र दशा है। ये जोखिम की घड़ी होती है तथा जीवनीशक्ति के परीक्षा का समय होता है। यदि जीवनीशक्ति इस अवस्था पर आकर हार गई या फेल हो गई हो तो रोगी का प्राणान्त तक हो जाता है और यदि जीवनीशक्ति प्रबल हुई तो संचित मल को निष्कासित करने में सफल होकर संकट की इस घड़ी को पार कर जाती है तथा रोगी को रोगमुक्त कर देती है ।

कुशल चिकित्सक इसी अवस्था में जीवनीशक्ति को उचित उपचार द्वारा सहायता पहुँचाकर यश और कीर्ति का भागीदार बनता है। चौथी अवस्था रोग के शमन की शुरूआत है। इसमें रोग के लक्षण 1-1 करके विदा होने लगते हैं । सूजन, तनाव, सुखी आदि सब कम होने लगती हैं । ज्वर कम हो जाता है । साँस की दुर्गन्ध कम हो जाती है । दस्त मामूली हो जाते हैं, वमन बन्द हो जाता है, पसीना स्वाभाविक रूप से आने लगता है और शरीर को थोड़ा-सा बल का अनुभव होने लगता है। पाँचवी तथा अन्तिमावस्था-रोग के पूरे तौर से शमन की होती है। शरीर मल से सर्वथा मुक्त हो जाता है और जो उपयोगी शरीर के नष्ट हुए तत्व हैं, वे धीरे-धीरे पुनः बनने लगते हैं और थोड़े ही दिनों में शरीर हृष्ट-पुष्ट हो जाता है।

जीर्णरोग किसे कहते हैं ? –

शरीर स्थित मल में उद्वेग होकर तेजी से निकलने की उग्र दशा का नाम जिस प्रकार तीव्र या उग्र रोग है, उसी तरह उसके भीतर प्रवेश करने, अनिष्ट दशा उत्पन्न करने और धीरे-धीरे थोड़े कष्ट के साथ बहुत काल तक शरीर में पड़े रहने की दशा का नाम ‘जीर्णरोग’ है। शरीर में तीव्र रोगों के रूप में सफाई की कोशिश में बारबार बहुधा उपस्थित होने के सहारे बार-बार दबाते रहने से दमा रोग हो सकता है और उसी प्रकार ज्वर को दबाते रहने से यक्ष्मा होने की संभावना बन जाती है।

तीव्र रोगों के लक्षणों को दबा देने से तात्कालिक स्थिति में तो सब कुछ ठीक-ठाक-सा लगता है किन्तु शरीर के भीतर से निकलती हुई गन्दगी शरीर में ही रुक जाती है और जीर्ण रोगों को उत्पन्न करती है । जीर्ण रोग से आक्रान्त क्षीण जीवनीशक्ति वाले माता-पिता से उत्पन्न सन्तान में भी उनके रोग बीज के रूप में स्वतः ही आ जाते हैं।

तीव्र रोगों में कष्ट अधिक सहन करने पड़ते हैं लेकिन जीर्णरोगों में तीव्र लक्षणों के न होते हुए भी जीवन अत्यन्त ही कष्टप्रद और नीरस बन जाता है । जीर्णरोगों को दूर करने के लिए विचारों की दृढ़ता, शुद्धता, धैर्य तथा अपने चिकित्सक में विश्वास की अत्यन्त आवश्यकता होती है । प्राकृतिक चिकित्सा से जीर्णरोग कठिनता से जाते हैं, किन्तु जाते जरूर हैं तथा जड़-मूल से जाते हैं।

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