प्रेतात्मा सम्बन्धी एक महान आश्चर्यजनक बिलकुल सत्य घटना

मुसलिम प्रेतात्मा देखते-ही-देखते एक सेर हलुवा खा गयी।

हमारे यहाँ आजसे नहीं अपितु अनादिकाल से आत्मा, भूत, प्रेत, पितर, देवी-देवता आदि को मानने की परम्परा चली आ रही है और मृतात्मा की शान्ति के निमित्त शास्त्रों में श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान आदि करने तथा ब्राह्मण-भोजन करानेका निर्देश दिया गया है। इसका पालन करनेसे भारतीय सनातनधर्मी हिन्दू सैकड़ों प्रकार की बीमारियों से बचते और बड़ी सुख-शान्ति से रहते चले आये हैं। जबसे हमने इन शास्त्रीय बातों को दकियानूसी माना है। और मृतात्मा की शान्तिके निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करना बंद किया है, तभी से उसका यह महान् भयंकर दुष्परिणाम सबके सामने प्रत्यक्ष देखनेमें आ रहा है कि आज मृतात्माएँ भूत-प्रेत आदि बनकर भूखी-प्यासी, मारी-मारी भटक रही हैं और घरघर में बड़ा उपद्रव मचा रही हैं।

एक मुसलिम प्रेतात्मा ने हिन्दू नवयुवक के शरीर में प्रवेश कर उसे किस प्रकार सताया और फिर उसने हलुवा खानेकी माँग की तथा हलुवा खिलाने पर वह संतुष्ट होकर किस प्रकार चला गया, इस सम्बन्धकी महान् आश्चर्यजनक सत्य घटना यहाँ प्रस्तुत है –

एक बारकी बात है, पिलखुवास्थित हमारे निवासस्थान पर दैनिक ‘वीर अर्जुन’ के समाचार-सम्पादक अयोध्यानाथ बल पधारे थे। जब उनसे हमारी बातें होनी प्रारम्भ हुईं तो हमने उन्हें कुछ भूत-प्रेतात्माके सम्बन्ध की बातें सुनायीं। उन्हें सुनकर झटसे उन्होंने कहा कि भक्तजी ! आप तो शास्त्र-पुराणों की और दूसरों के मुखसे सुनी हुई बातें सुना रहे हैं, पर हमने तो–‘एक मुसलमान जाति के मृत व्यक्तिकी आत्माने प्रेत बनकर एक हिन्दू नवयुवक को किस प्रकार सताया-यह आश्चर्यजनक सत्य घटना अपनी आँखोंसे देखी है। हम इन बातों को पहले कभी सत्य नहीं मानते थे, पर अब हम भूत-प्रेतादि की बातों को मानने के लिये बाध्य हो गये हैं। यह सुनकर हमने उनसे कहा कि क्या वह अपनी आँखों-देखी प्रेतात्मा-सम्बन्धी सत्य घटना हमें सुनाने की कृपा नहीं करेंगे?
माननीय बल साहबने कहा-‘क्यों नहीं ! अवश्य सुनायेंगे।’ फिर उन्होंने घटना सुनाना प्रारम्भ किया
‘प्रताप’ पत्र के एक कर्मचारीका १८ वर्षीय लड़का बड़ा दुबला-पतला था, पर था बिलकुल ठीक-ठाक और स्वस्थ। उसे किसी भी प्रकारकी कोई बीमारी नहीं थी। सितम्बर सन् १९६९ की बात है। एक दिन रात में उस लड़के के शरीरके अंदर एक अद्भुत आवेश आया और उसके अंदर प्रेतात्माका प्रवेश हुआ, जिसके कारण उसने अकस्मात् अपने घरके बरतन तोड़ने प्रारम्भ कर दिये। उस दिन उसका न तो किसीसे कुछ झगड़ा हुआ था और न ही वह किसी पर क्रुद्ध ही था। इसलिये घरवाले उसकी ये हरकतें देखकर हैरान हो रहे थे। एकाएक इसे आज यह क्या हो गया है? इससे पहले तो यह ऐसा कार्य कभी नहीं करता था। उससे जब इसका कारण पूछा गया तो उसने कुछ नहीं बताया। जब उसके माता-पिता तथा उसके अन्य दो भाइयोंने उसे पकड़कर डाँट-फटकार कर उसे शान्त करनेकी कोशिश की,तब वह और भी जोरसे चिल्ला पड़ा तथा उसने बड़ी जोर-जोरसे ‘अल्लाहो अकबर’, ‘अल्लाहो अकबर’ के नारे लगाने प्रारम्भ कर दिये। अब तो सब लोग बहुत परेशान हुए, यह किसी की भी समझमें नहीं आ रहा था कि इसे क्या हो गया है। जब वह बहुत जोर-जोरसे हो-हल्ला मचाने लगा और नहीं माना तो लाचार हो उसे चार आदमियों ने जबरदस्ती पकड़कर एक खाटपर डाल दिया और दो मोटी-मोटी रस्सियोंसे कसकर बाँध दिया। रस्सियों से बाँधे जानेपर भी उसका चिल्लाना, शोर मचाना तथा उपद्रव करना बराबर जारी रहा। उसने चिल्लाकर बड़े जोरसे कहा कि मुझे बाँधने की ताकत किसी में भी नहीं है। ‘अल्लाहो अकबर’, ‘अल्लाहो अकबर’ कहकर और चिल्ला चिल्ला कर उसने अपनी भुजाओं को जोर-जोरसे हिलाया, जिससे रस्सी टूट गयी। फिर उसने खुलकर खूब हुड़दंग मचाने और ‘अल्लाहो अकबर’, ‘या अली’ के जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर दिये। अब तो घरवाले बहुत परेशान हुए। किसी ने घरवालोंको सलाह दी कि इसके शरीरमें मुसलमान प्रेत प्रतीत होता है, इसी कारण यह ‘अल्लाहो अकबर’ और ‘या अली’ बोलकर उपद्रव मचा रहा है, इसका कोई उपचार-अभिचार कराओ। उसकी सलाहपर कुछ उपचार-अभिचार कराये गये, जिससे वह मुसलमान प्रेत कुछ देरके लिये एकदम शान्त हो गया और चला गया। अब वह लड़का भला-चंगा हो गया और पहले-जैसा ठीक-ठाक दिखलायी पड़ने लगा।

दूसरे दिन पहले-जैसा हो गया और वैसे ही उसने ‘अल्लाहो अकबर’ और ‘या अली’ के नारे लगाने, उपद्रव मचाने शुरू कर दिये। तंग आकर उस लड़के को एक बहुत अच्छे डॉक्टर के पास ले जाया गया। डॉक्टरने उसे बड़े गौरसे देखा और इंजेक्शन लगाया तथा दवा आदि दी, परंतु उसका भी कोई असर नहीं हुआ, उसने पहले-जैसा ही उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। डॉक्टरने उसे दिमागकी खराबीका कारण बताया, परंतु वह कोई ऐसी दवा न बता सका और न दे ही सका, जिससे वह लड़का ठीक हो सके।

जब डॉक्टरने जवाब दे दिया, तब उसे दिखाने के लिये कई झाड़-फूक करनेवाले बुलाये गये। उन्होंने झाड़फैंक का काम किया, परंतु उससे भी कोई लाभ नहीं हुआ। अन्तमें किसीने उसके घरवालों को परामर्श दिया कि सुदर्शन पार्क, नयी दिल्ली में एक सरदारजी रहते हैं, जो पराम्बा श्री भगवतीजी के बड़े अनन्य उपासक हैं, वे ऐसे भूत-प्रेतादि से सताये हुए लोगों को देखा करते हैं और अच्छा कर दिया करते हैं। इस कार्य में वे बड़े निपुण हैं। इसलिये इसे उनके पास ले जाकर दिखाया जाय तो अच्छा रहेगा और इसका यह रोग दूर हो जायगा। घरवाले उसे पकड़कर उन सिख सरदार जी के पास ले गये। उसने सिख सरदारजी के पास जाकर भी बड़ी उद्दण्डता दिखलायी और फिर वही पहले-जैसे ‘अल्लाहो अकबर’ तथा ‘या अली’ के नारे बड़े जोर-जोरसे लगाने प्रारम्भ कर दिये। सरदारजी इसके असली रहस्यको समझ गये और फिर उन्होंने उस लड़के को अपने सामने बैठाकर मन-ही-मन कुछ मन्त्र पढ़ना प्रारम्भ किया तो वह मन्त्र पढ़नेसे और भी ज्यादा बौखलाने लगा। जब सरदारजीने उसके सामने मुसलमानी कलमा पढ़ना शुरू किया तो वह कलमा सुनकर चुपचाप उनके पास बैठ गया। तब उन सरदारजीने उस लड़के के सिरपर अपना हाथ फेरा और उससे बड़े प्यारसे पूछा-
‘भाई ! यह बताओ कि तुम कौन हो?’
प्रेतात्माने रोते हुए कहा – मैं एक मुसलमान प्रेत हूँ।
सरदारजी – तुम्हारा नाम क्या है?
प्रेतात्मा – मेरा नाम रहमतअली है।
सरदारजी – तुम कहाँ के रहनेवाले हो ?
प्रेतात्मा – मैं पहाड़गंज, नयी दिल्लीका रहनेवाला हूँ।
सरदारजी – तुम प्रेत कैसे बने?
प्रेतात्मा – मैं टी०बी० का मरीज था, जब मैं टी०बी० के रोग से मरा तो उस समय मुझे कोई पानी देनेवाला भी मेरे पास नहीं था।
सरदारजी – अब तुम इस लड़के को क्यों सताते हो और इस लड़के का पिण्ड कैसे छोड़ोगे ?
प्रेतात्मा – मुझे हलुवा खाने की चाह है, यदि आप मुझे गरमगरम हलुवा खिलवा दें तो मैं इस लड़के को छोड़ दूंगा, अन्यथा नहीं।
सरदारजी – मुसलमान तो प्रायः हलुवा खाते नहीं, फिर तुम हलुवा खाने की इच्छा क्यों करते हो?
प्रेतात्मा – जब मैं मरा था तो उस समय मेरी अन्तिम ख्वाहिश गरम-गरम हलुवा खानेकी थी, वही आज भी बनी हुई है। जबतक हलुवा खाने की मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं होगी, तब तक मुझे शान्ति कदापि नहीं मिलेगी और जबतक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी, तबतक मैं इस लड़केको छोडूंगा नहीं। यदि तुमने मुझे हलुवा खिलवा दिया तो मैं इस लड़केको छोड़ दूंगा और इसके पास से चला जाऊँगा।
सरदारजी – अच्छा, कल हम तेरी हलुवा खाने की ख्वाहिश अवश्य पूरी कर देंगे। जब हम ऐसा कर देंगे तब तुम इसे कल छोड़ दोगे न और फिर कभी इसे सताओगे तो नहीं ?
प्रेतात्मा – मैं हलुवा खाकर इसे अवश्य छोड़ दूंगा और फिर इसे कभी नहीं सताऊँगा।
सरदारजी ने लड़के के पितासे कहा कि अब तुम अपने घर जाओ और अपने लड़के को भी साथ ले जाओ। कल सुबह इस लड़के के साथ जल्दी आना और अपने साथ घर से हलुवा बनवाकर लेते आना।

अगले दिन प्रात:काल उस प्रेत ग्रस्त लड़के का पिता उस लड़के को लेकर पुनः सरदार जी के पास आया; लेकिन घरसे हलुवा बनाकर नहीं ला सका, हलुवा बनाने के लिये आटा, घी, चीनी आदि सब सामान साथ में लेता आया और लाकर सरदारजी के सामने अदब से रख दिया।

सरदार जी के घरपर ही लगभग एक सेर हलुवा तैयार किया गया; फिर वह गरम-गरम हलुवा उस लड़के को खाने के लिये दिया गया। लड़के ने गरम गरम हलुवा अपने हाथ में लेकर एक ही बारमें सारा-का-सारा हलुवा खा डाला। हलुवा खाकर वह मुसलमान प्रेतात्मा बड़ा खुश हुआ। जो लड़का एक पाव भी हलुवा नहीं खा सकता था, वही लड़का एक सेर हलुवा एकाएक खा गया। यह देखकर सभी दंग रह गये।

सरदारजी ने प्रेतात्मा से कहा – क्यों भाई ! अब तो तुम गरम गरम हलुवा खाकर खुश हो न ?
प्रेतात्मा – जी हाँ सरदारजी ! मैं अब हलुवा खाकर तृप्त हो गया हूँ और आपसे बड़ा खुश हूँ।
सरदारजी – अब तुम इसे छोड़ दो और जाओ।
प्रेतात्मा – अब मैं जाता हूँ। अब मैं फिर कभी नहीं आऊँगा। ऐसा कहकर वह मुसलमान प्रेतात्मा उसके शरीरसे चला गया और वह लड़का बिलकुल ठीक हो गया।

यह है आँखों देखी एक महान् आश्चर्यजनक बिलकुल सत्य घटना। जिसे बड़े-बड़े डॉक्टर भी ठीक नहीं कर सके, उसे एक भगवती के उपासक सिख सरदारने अपनी मन्त्रशक्ति के बलपर बिलकुल ठीक कर दिया और उस प्रेतात्मा की भी इच्छा-पूर्ति कर उसे संतुष्ट कर दिया। आज के इस भौतिकवादी वैज्ञानिक युगमें जबकि कोई भूत-प्रेत, आत्मा-परमात्मा, मन्त्रशक्ति आदि को मानने के लिये तैयार नहीं है, यह सत्य घटना प्रत्यक्ष देखने में आयी है, जिसे देखकर महान् आश्चर्य होता है और बड़े-बड़े घोर नास्तिकों की भी बोलती बंद हो जाती है। उन्हें शास्त्रोंपुराणों की ऐसी बातों को सत्य माननेके लिये बरबस बाध्य होना पड़ता है।

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