प्रदूषण से फेफड़ों को कैसे बचाएं: अडूसा, मुलेठी, तुलसी

Last Updated on अक्टूबर 26, 2026 by admin
प्रदूषण से फेफड़ों को कैसे बचाएं, इसका आयुर्वेदिक उत्तर तीन स्तरों में है: धूल-धुएँ से बचाव, नाक-गले की रक्षा-परत को मज़बूत रखना और कफ को जमने न देना। अडूसा कफ को ढीला करता है, मुलेठी सूखे गले को स्निग्ध बनाती है और तुलसी श्वास-मार्ग को खुला रखती है। साथ में नस्य, भाप और हल्का, गर्म आहार।
संक्षेप में
- स्मॉग वाले दिनों में सुबह-शाम बाहर व्यायाम न करें, धूप चढ़ने पर ही निकलें।
- अडूसा कफ वाली खाँसी में, मुलेठी सूखी खाँसी और गले की खराश में, और तुलसी हर रोज़ की रक्षा के लिए सबसे उपयुक्त है।
- नाक में घी या अणु तैल का नस्य और तिल तैल का गण्डूष (कुल्ला) धूल के विरुद्ध पहली ढाल है।
- ठंडा, भारी और दही वाला भोजन कफ बढ़ाकर फेफड़ों पर बोझ डालता है।
- साँस फूले, छाती में दर्द हो या होंठ नीले पड़ें तो घरेलू उपाय छोड़कर तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ।
आयुर्वेद प्रदूषण को फेफड़ों का रोग-कारण क्यों मानता है?
आयुर्वेद में साँस की पूरी व्यवस्था को प्राणवह स्रोतस् कहा गया है, जिसका मूल हृदय और महास्रोत (पाचन तंत्र) माना गया है। इसीलिए साँस का रोग केवल छाती का नहीं, अग्नि का भी विषय है।
अक्सर लोग यह नहीं जानते कि चरक संहिता के हिक्का-श्वास चिकित्सा प्रसंग में श्वास रोग के कारणों की सूची धूल और धुएँ से ही शुरू होती है: “रजसा धूमवाताभ्यां शीतस्थानाम्बुसेवनात्”। अर्थ: धूल, धुआँ, तेज़ हवा, ठंडे स्थान पर रहना और ठंडा पानी पीना, ये सब श्वास रोग के कारण बनते हैं। जाड़े का स्मॉग इन्हीं में से तीन (धूल, धुआँ, ठंड) का एक साथ आया रूप है।
स्मॉग में फेफड़ों पर क्या असर होता है? दोष की दृष्टि से समझिए
स्मॉग के सूक्ष्म कण रूखे और खुरदरे होते हैं, इसलिए पहले वात बढ़ता है। गला सूखता है और चुभती खाँसी आती है। रूखेपन से बचने के लिए शरीर कफ बनाता है। ठंड और भारी भोजन मिलने पर यही कफ गाढ़ा होकर श्वास-नलियों में जमने लगता है।
इसलिए प्रदूषण की खाँसी दो रूप लेती है:
- वात प्रधान: सूखी खाँसी, गले में खराश, आवाज़ बैठना, रात में खाँसी बढ़ना।
- कफ प्रधान: छाती में भारीपन, गाढ़ा बलगम, सुबह उठते ही खाँसी, भूख कम लगना।
यह भेद समझना ज़रूरी है। सूखी खाँसी में तीखी, कफ निकालने वाली चीज़ें गले को और रूखा करती हैं। कफ वाली खाँसी में अकेली मीठी-स्निग्ध औषधि कफ बढ़ा सकती है। जिनकी अग्नि मंद है, उनमें आम (अधपचा रस) कफ से मिलकर खाँसी को लंबा खींचता है।
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प्रदूषण से फेफड़ों को कैसे बचाएं: अडूसा, मुलेठी और तुलसी की भूमिका
ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। समझिए कि कौन किस अवस्था में काम का है।
अडूसा (वासा): जमे कफ को ढीला करने वाला
अडूसा को संस्कृत में वासा या वासक, हिंदी में अडूसा या बांसा और अंग्रेज़ी में Malabar Nut कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम Justicia adhatoda है और पुराना नाम Adhatoda vasica। इसका रस तिक्त-कषाय (कड़वा-कसैला), गुण लघु-रूक्ष और वीर्य शीत है, इसलिए यह कफ और पित्त दोनों को शांत करता है। गाढ़े बलगम और छाती की जकड़न में अडूसा काढ़ा पारंपरिक रूप से प्रयोग होता है।
आयुर्वेद की एक प्रसिद्ध उक्ति है: “वासायां विद्यमानायामाशायां जीवितस्य च। रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थमवसीदति॥” अर्थ: जब तक अडूसा उपलब्ध है और जीने की आशा है, तब तक रक्तपित्त, क्षय या खाँसी का रोगी निराश क्यों हो।
अडूसा काढ़ा: कुछ ताज़े पत्ते कूटकर दो कप पानी में धीमी आँच पर उबालें और आधा रहने पर छान लें। गुनगुना होने पर शहद मिलाएँ, उबलते काढ़े में कभी नहीं। मात्रा वैद्य के मार्गदर्शन में ही तय करें।
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मुलेठी (यष्टिमधु): सूखे, छिले गले का मरहम
मुलेठी को संस्कृत में यष्टिमधु या मधुक और अंग्रेज़ी में Liquorice कहते हैं (Glycyrrhiza glabra)। यह मधुर, गुरु-स्निग्ध और शीत वीर्य है, इसलिए वात और पित्त को शांत करती है। चरक संहिता में मधुक को कण्ठ्य महाकषाय में रखा गया है, यानी स्वर और गले के लिए हितकर दस द्रव्यों में।
खाँसी में मुलेठी सूखी खाँसी, खराश और बैठी आवाज़ में सबसे अच्छा काम करती है। इसकी छोटी डंडी धीरे-धीरे चूसना पुराना उपाय है। सूक्ष्म बात यह है कि मुलेठी स्वयं कफ को पिघलाती नहीं। इसलिए गाढ़े कफ में इसे अडूसा या सोंठ-पिप्पली जैसी उष्ण वस्तुओं के साथ लें।
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तुलसी (सुरसा): रोज़ की रक्षा
तुलसी का शास्त्रीय नाम सुरसा है। वानस्पतिक नाम Ocimum tenuiflorum है, जिसे Ocimum sanctum भी कहते हैं, और अंग्रेज़ी में Holy Basil। इसका रस कटु-तिक्त, गुण लघु-रूक्ष और वीर्य उष्ण है, इसलिए यह कफ और वात को शांत करती है। चरक संहिता के श्वासहर महाकषाय (साँस की तकलीफ दूर करने वाले दस द्रव्य) में सुरसा का नाम आता है। आधुनिक शोध भी बताते हैं कि तुलसी शरीर को औद्योगिक प्रदूषकों और भारी धातुओं के रासायनिक तनाव से बचाने में सहायक है।
प्रदूषण के मौसम में यह सबसे सुलभ दैनिक उपाय है: सुबह कुछ ताज़े पत्ते, या तुलसी-सोंठ-काली मिर्च की हल्की चाय। तुलसी उष्ण है। पित्त प्रकृति वाले, या जिन्हें नकसीर, छाले या जलन रहती हो, वे इसे सीमित मात्रा में और मिश्री या मुलेठी के साथ लें।
सांस की तकलीफ और स्मॉग में रोज़ के आयुर्वेदिक उपाय
ये उपाय धूल-धुएँ को फेफड़ों तक पहुँचने से पहले रोकते हैं:
- नस्य: सुबह स्नान के बाद दोनों नथुनों में गाय के घी या अणु तैल की दो-दो बूँद डालें। इसे प्रतिमर्श नस्य कहते हैं और यह रोज़ किया जा सकता है। नाक की स्निग्ध परत पर धूल के कण चिपक जाते हैं।
- गण्डूष: तिल का तेल मुँह में भरकर कुछ देर घुमाएँ, फिर थूक दें। इससे गला और मसूड़े रूखे नहीं होते।
- भाप: अजवाइन या तुलसी के पत्ते डालकर उबले पानी की भाप शाम को लें। भाप बहुत गर्म न हो, और दिन में बार-बार भी न लें।
- गुनगुना जल: दिन भर गुनगुना पानी पिएँ, क्योंकि फ्रिज का पानी कफ को जमाता है।
- बाहर से लौटकर: चेहरा, आँखें और नाक साफ पानी से धोएँ।
- घर के भीतर: स्मॉग अधिक हो तो सुबह-शाम खिड़कियाँ बंद रखें और दोपहर में खोलें।
प्राणायाम कब और कैसे
अनुलोम-विलोम और भ्रामरी साँस की लय सुधारते हैं, पर स्मॉग के दिनों में इन्हें घर के भीतर करें। साँस फूली हो या बुखार हो तो भस्त्रिका और कपालभाति न करें। दमा या हृदय रोग वाले इन्हें योग्य शिक्षक की देखरेख में ही करें।
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प्रदूषण के मौसम में क्या खाएँ और क्या न खाएँ?
पथ्य (क्या खाएँ), और क्यों:
- गर्म, ताज़ा, हल्का भोजन: मूँग दाल, सब्ज़ियों का सूप, दलिया। लघु और उष्ण होने से अग्नि ठीक रहती है।
- सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, अदरक: इनका कटु रस और उष्ण वीर्य कफ को पिघलाता है।
- आँवला: शीत वीर्य वाला रसायन है, जो पित्त बढ़ाए बिना बल बढ़ाता है।
- हल्दी वाला गुनगुना दूध: रात को लें, जब कफ अधिक न हो।
- शहद (बिना गर्म किए): लेखन गुण के कारण जमे कफ को खुरचता है।
अपथ्य (क्या न खाएँ), और क्यों:
- दही, विशेषकर रात में: अभिष्यंदी है, यानी स्रोतसों में चिपचिपाहट बढ़ाता है।
- ठंडा पानी, आइसक्रीम, ठंडे पेय: इनका शीत गुण कफ को जमाता है।
- तली चीज़ें और भारी मिठाइयाँ: गुरु और स्निग्ध होने से आम और कफ बढ़ाती हैं।
- देर रात भारी भोजन और दिन में सोना: ये कफ बढ़ाने के प्रमुख कारण हैं।
विरुद्ध आहार से बचें, जैसे दूध के साथ नमक या खट्टे फल, और गर्म किया हुआ शहद।
प्रदूषण से जुड़ी खाँसी में कौन सी आयुर्वेदिक औषधियाँ मिलती हैं?
रोज़ के उपायों के बाद भी तकलीफ बनी रहे, तो वैद्य अवस्था देखकर इन शास्त्रीय औषधियों में से चुनते हैं:
| औषधि | रूप | मुख्य घटक | किस अवस्था या लक्षण में सहायक | विशेष सावधानी |
|---|---|---|---|---|
| सितोपलादि चूर्ण | चूर्ण | मिश्री, वंशलोचन, पिप्पली, छोटी इलायची, दालचीनी | सूखी या हल्के कफ वाली खाँसी, गले में जलन | मिश्री अधिक है, मधुमेह में वैद्य से पूछें |
| वासावलेह | अवलेह | वासा (अडूसा), मिश्री, घी, पिप्पली, शहद | पुरानी खाँसी, गाढ़ा कफ, कफ में रक्त की लकीर | मधुमेह में सावधानी; कफ में रक्त हो तो पहले जाँच |
| कण्टकारी अवलेह | अवलेह | कण्टकारी, पिप्पली, भारंगी, कर्कटशृंगी | बार-बार की खाँसी, साँस फूलना | मधुमेह में सावधानी; गर्भावस्था में वैद्य से पूछें |
| लवंगादि वटी | वटी | लौंग, काली मिर्च, बहेड़ा, कत्था | गले की खराश, बार-बार की सूखी खाँसी | निगलें नहीं, धीरे-धीरे चूसें |
| च्यवनप्राश | अवलेह (रसायन) | आँवला, दशमूल, पिप्पली, घी, शहद | बार-बार संक्रमण, प्रदूषण के मौसम में बल-वृद्धि | मंद अग्नि और मधुमेह में वैद्य से पूछें |
बाज़ार में कुछ निर्माताओं के अपने उत्पाद भी हैं, जिनमें अडूसा, मुलेठी या तुलसी प्रमुख घटक हैं:
| उत्पाद | निर्माता | रूप | मुख्य घटक | किसमें सहायक |
|---|---|---|---|---|
| Honitus Cough Syrup | Dabur | सिरप | तुलसी, मुलेठी, बनफ्शा, कण्टकारी, तालीसपत्र, वासा, शहद | विभिन्न प्रकार की खाँसी और गले की खराश |
| Bresol Tablet | Himalaya | टैबलेट | तुलसी, वासा, हल्दी | एलर्जिक राइनाइटिस, एलर्जिक ब्रोंकाइटिस, परागकण एलर्जी |
| Koflet Syrup | Himalaya | सिरप | तुलसी, मुलेठी, शहद | ऊपरी और निचले श्वास-मार्ग के संक्रमण की खाँसी, धूम्रपान से होने वाली खाँसी |
ये औषधियाँ प्रकृति, रोग की अवस्था और वैद्य की सलाह के अनुसार ही ली जाएँ, स्वयं चुनकर नहीं।
किन्हें सावधान रहना चाहिए और कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?
- गर्भवती महिला: परंपरा में अडूसा गर्भावस्था में वर्जित है। मुलेठी और तुलसी भी वैद्य की सलाह से ही लें।
- उच्च रक्तचाप या हृदय रोग: मुलेठी का लंबे समय तक सेवन रक्तचाप बढ़ा सकता है और शरीर में पानी रोक सकता है।
- मधुमेह की दवा लेने वाले: तुलसी शर्करा घटा सकती है, और अवलेह व चूर्ण में मिश्री होती है।
- खून पतला करने की दवा या सर्जरी से पहले: तुलसी अधिक मात्रा में न लें।
- शिशु और छोटे बच्चे: काढ़े और अवलेह की मात्रा केवल वैद्य तय करें।
- चल रही दवा: दमा, रक्तचाप या शुगर की दवा स्वयं बंद न करें।
तुरंत डॉक्टर से मिलें यदि साँस लेने में तेज़ तकलीफ हो, छाती में दर्द या दबाव हो, होंठ या नाखून नीले पड़ें, खाँसी में खून आए, तेज़ बुखार हो, या दमे का दौरा सामान्य दवा से न रुके। ऐसी स्थिति में घरेलू नुस्खे पर निर्भर न रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. प्रदूषण में फेफड़ों को साफ करने के लिए सबसे अच्छा घरेलू उपाय कौन सा है?
A: फेफड़ों को “एक दिन में साफ” करने का कोई उपाय नहीं है। नस्य, भाप, गुनगुना पानी, हल्का भोजन और तुलसी-सोंठ की चाय मिलकर शरीर की अपनी सफाई-प्रक्रिया को सहारा देते हैं।
Q2. क्या अडूसा काढ़ा रोज़ पी सकते हैं?
A: अडूसा काढ़ा कफ वाली खाँसी में कुछ दिनों के लिए लिया जाता है, यह रोज़ का पेय नहीं है। रूक्ष होने के कारण सूखी खाँसी में लंबे समय तक लेने पर यह रूखापन बढ़ा सकता है, इसलिए अवधि वैद्य से तय कराएँ।
Q3. खाँसी में मुलेठी कैसे लें?
A: सूखी खाँसी और खराश में मुलेठी की डंडी चूसना या उसका चूर्ण शहद के साथ लेना पारंपरिक तरीका है। उच्च रक्तचाप हो तो इसे लंबे समय तक न लें।
Q4. Pollution mein lungs ke liye tulsi kaise le?
A: तुलसी के कुछ ताज़े पत्ते सुबह खाली पेट चबाए जा सकते हैं, या तुलसी, सोंठ और काली मिर्च का हल्का काढ़ा दिन में एक बार लिया जा सकता है। पित्त प्रकृति वाले इसे मिश्री के साथ और सीमित मात्रा में लें।
Q5. क्या स्मॉग में सुबह की सैर करनी चाहिए?
A: स्मॉग वाले दिनों में सुबह और देर शाम हवा सबसे भारी रहती है, इसलिए उस समय खुले में तेज़ व्यायाम न करें। धूप निकलने के बाद, या घर के भीतर हल्का व्यायाम करना बेहतर है।
फेफड़ों की रक्षा किसी एक काढ़े से नहीं, रोज़ की छोटी आदतों से होती है: नाक में घी, गुनगुना पानी, हल्का भोजन और अवस्था के अनुसार अडूसा, मुलेठी या तुलसी। कल सुबह से प्रतिमर्श नस्य शुरू करें और दो सप्ताह तक रात का दही बंद रखें।
पुरानी खाँसी, दमा या कोई गंभीर रोग हो तो कोई भी औषधि शुरू करने से पहले योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।





