पुराने दस्त का आयुर्वेदिक इलाज – Purane Dast ka Ayurvedic Ilaj in Hindi

Last Updated on October 30, 2020 by admin

इस लेख में ऐसे रोगियों के लिए चर्चा की जा रही है, जो कई दिनों से दस्त से पीड़ित हैं या जिन्हें आँव हो रही हो।

पुराने दस्त व्याधि के संकेत और लक्षण (Symptoms of Chronic Diarrhea in Hindi)

  • ज़रा सा खा लेने पर पेट में मरोड उठता है। तुरंत शौच के लिए जाना पड़ता है। पानी की तरह पतले दस्त होते हैं।
  • मूत्र त्याग से पहले ही दस्त हो जाता है।
  • कभी मल कम मात्रा में पर आँव के रूप में होता है परंतु मल त्याग कठिनाई से हो पाता है। बहुत ज़ोर लगाने पर भी मल त्याग नहीं हो पाता। पेट साफ हो जाने का संतोष प्राप्त नहीं होता। ऐसे में रोगी बारबार शौच करना चाहता है और बार-बार ज़ोर लगाता है। कई बार तो ज़ोर लगाने की आवाज़ सुनकर परिवार के सदस्य परेशान होकर शौचालय का दरवाज़ा तक खटखटाने लगते हैं। इतना सब करने के बाद भी मल त्याग बहुत कम मात्रा में होता है। रोगी थक सा जाता है।
  • प्रतिदिन इतना ज़ोर बार-बार लगाने से मलद्वार के आस-पास के हिस्से पर दबाव पड़ता है।उस अंग की मांसपेशियाँ शिथिल होकर लटक जाती हैं।
  • महिलाओं में गर्भाशय की मांसपेशियाँ शिथिल हो जाने पर जिस तरह गर्भाशय बाहर आने लगता है उसी तरह आँत गुदा भाग से बाहर आने लगती है। इसे चिकित्सकीय भाषा में ‘गुद भ्रंश’ कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति में रोगी को अत्यधिक दर्द होता है।
  • आँव पड़ने लगती है, शौच कभी पतला तो कभी सामान्य होता है, रोगी ज़ोर लगाने से कमज़ोरी महसूस करता है, पेट दर्द और गैस की शिकायत रहती है, भूख नहीं लगती, कमज़ोरी महसूस होती है, चक्कर आते हैं, मांसपेशियाँ खिंचने लगती हैं, कमर और पीठ में दर्द रहता है, रक्ताल्पता हो जाती है।
  • रोगी जो कुछ खाता है, कुछ भी नहीं पचता या बहुत कम पचता है। अगर भोजन पच गया तो मल त्याग सही होता है। यदि नही पचा तो पतला, दुर्गंधयुक्त, लेसदार और पेट दर्द के बाद ही मल त्याग होता है। मल अत्यधिक दुर्गंधयुक्त होता है। रोगी के बाद कई घंटे अन्य कोई उस शौचालय का उपयोग करना नही चाहता।
  • कुछ रोगी बार-बार शौचालय जाते हैं पर मल की मात्रा अल्प होती है तो कुछ रोगी कम बार शौच जाते हैं लेकिन मल की मात्रा अधिक होती है।
  • भोजन का अवशोषण नहीं हो पाता।
  • दिन के समय अधिक बार शौच जाना पड़ता है, दोपहर और रात के समय कम बार जाना पड़ता है। शौच कम बार जाना पड़ता है लेकिन मल की मात्रा अधिक होती है।
  • ऐसे में रोगी का भार कम हो जाता है।
  • कमज़ोरी, मुँह में छाले, नाभि के आस-पास दर्द रहता है।
  • पेट हमेशा भारी-भारी रहता है, मुँह में पानी आता है, मुँह में चिपचिपा सा पदार्थ जमा सा लगता है, मुँह बेस्वाद सा रहता है, भूख कम-कम हो जाती है, रक्ताल्पता, कड़वी-खट्टी डकारें आती हैं, उल्टी हो जाती है, भोजन देर से पचता है आदि लक्षण दिखाई देते हैं।
  • बीमारी बढ़ जाने पर पैरों पर सूजन आ जाती है।
  • कुछ रोगियों के पेट में इतनी अधिक संख्या में कृमि हो जाते हैं कि बार-बार दस्त होते हैं और हर बार कृमि बाहर आते हैं।

वे रोग जिनसे हो सकती है दस्त की समस्या :

  1. कई रोगियों को कब्ज़ की शिकायत रहती है। उन्हें महसूस होता है कि पेट अंदर से साफ करना चाहिए। गंदगी निकाल देनी चाहिए। रोगी पेट साफ करने की दवाओं और चूर्ण के विज्ञापन पढ़कर और सुनकर उनका प्रयोग स्वतः ही करते हैं और पेट को हानि पहुँचाते हैं। जिन्हें पुराना कब्ज़ हो उन पर इन दवाओं का कोई असर नहीं होता। ये रोगी तेज़ दस्त होनेवाली दवाइयाँ लेते हैं और जब दस्त नहीं रुकते तो डॉक्टर के पास जाकर दस्त रोकने की दवा माँगते हैं।
  2. कुछ रोगियों को दूध, गेहूँ, ठंडे पदार्थ, कोल्ड ड्रिंक और खमीर उठे पदार्थ खाने के बाद दस्त होते हैं। मधुमेह के रोगियों में वात नाड़ियों को हानि पहुँची हो तो आँतों की संवेदक वातनाड़ियों को हानि होने से दस्त या कब्ज़ की शिकायत हो सकती है।
  3. यदि आँतों में टी.बी. संक्रमण हो तो आँतों में घाव हो जाते हैं, जिससे तीन से छह बार मध्यम पतले दस्त हो सकते हैं।
  4. थाइरॉइड की कुछ बीमारियों में भी दस्त हो सकते हैं।
  5. दस्त होते हैं फिर भी भूख लगती है लेकिन वज़न कम होता जाता है। भूख कम होने पर भी वज़न और स्वास्थ्य में अधिक फर्क नहीं होता लेकिन दस्त होते ही रहते हैं। ऐसा इरीटेबल बॉवेल सिंड्रोम नामक बीमारी में होता है।
  6. कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण जैसे पित्त कम करनेवाली दवाओं, रक्तचाप, हृदयरोग, कैंसर आदि की कुछ दवाओं और कुछ प्रतिजैविक दवाओं से भी दस्त हो सकते हैं। आँतों में संक्रमण होने पर आँव और दस्त हो सकते हैं।

पुराने दस्त व्याधि के कारण (Causes of Chronic Diarrhea in Hindi)

अब तक हमने दस्त किन-किन तरीकों से और बीमारियों में हो सकते हैं इस बारे में जानकारी प्राप्त की। अब दस्त किन कारणों से होते हैं इसकी जानकारी प्राप्त करें।

  • पचने में भारी भोज्य पदार्थों का अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से दस्त हो सकते हैं जैसे पुरनपोली दो के स्थान पर 4 या 5 एक बार में खाई जाए।
  • तला, अति शीत, अति गर्म, सूखे-रूखे पदार्थ अत्यधिक मात्रा में खाएँ जाएँ,
  • अजीर्ण हो जाने और खट्टी डकारें आने पर भी भोजन करना,
  • भोजन का समय निकल जाने पर देर से भोजन करना,
  • पेट तन जाने तक आकंठ भोजन करना,
  • पीने का पानी दूषित होने या बदल जाने,
  • किसी बात का भय जैसे परीक्षा, मानसिक तनाव, चिंता, अत्यधिक दुःख,
  • समय पर मल, मूत्र का त्याग न करना और पेट में कृमि होने से दस्त हो सकते हैं।
  • पेट और आँतों की शल्यक्रिया के बाद भी दस्त हो सकते हैं।

दस्त के साथ होनेवाली अन्य तकलीफें :

गैस होना, पेट में भारीपन, दर्द, भूख कम होना, कमज़ोरी, पैरों की नसें खिंचना, बदन दर्द, वज़न कम होना, आँखें धंस जाना, हिमोग्लोबिन कम होना, बार-बार छाले होना, प्यास लगना, सीने में दर्द, मानसिक कमज़ोरी, चिड़चिड़ापन, शीघ्रकोप, रोना आना, दस्त के भय से न खाना, मुख निस्तेज होना, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन कम होना, बवासीर, गुदभ्रंश, गुदा भाग में जलन, दर्द आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

( और पढ़े – दस्त रोकने के 33 घरेलू उपाय )

पुराने दस्त का आयुर्वेदिक उपचार (Chronic Diarrhea Ayurvedic Treatment in Hindi)

नीचे दिए 5 कारणों से 5 या एक कारण हो तो दस्त हो सकते हैं –

  1. आँतों में सूजन या संक्रमण
  2. आँतों के स्रावों में गड़बड़ी
  3. पाचन में गड़बड़ी
  4. आँतों की शोषण शक्ति में गड़बड़ी
  5. आँतों के रक्त संचार और संवेदना संस्थान में गड़बड़ी

उपरोक्त 5 कारणों से दस्त हो सकते हैं। इलाज करते समय इन 5 कारणों का इलाज करना होगा अर्थात-

  • आँतों का संक्रमण और सूजन दूर करना होगा।
  • आँतों के स्रावों में नियमितता लाना।
  • आँतों की पाचन शक्ति में सुधार।
  • पचे हुए भोजन का उत्तम अवशोषण हो।
  • आँतों का स्वास्थ्य सुधारने के लिए आँतों में सही तरीके से रक्त संचार और संवेदना।

ये पाँच चीजें दुरूस्त हों तो स्वास्थ्य में सुधार होता है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार उपचार के समय दीपन, पाचन, ग्राही, स्तंभक और मृदु अनुलोमक आदि दवाएँ दी जाती हैं। आइए, इन दवाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करें।

1) दीपन : इसे अंग्रेजी में एपिटायज़र या भूख तेज़ करने की दवा कहा जाता है। हींग, काली मिर्च, सोंठ, लहसुन, अदरक, मिर्ची, कढीपत्ता, राई, अजवाइन, कच्चा आम, इमली और कोकम।

2) पाचन : इसे अंग्रेजी में डायजेस्टिव कहा जाता है। इससे भोजन ठीक तरह पचता है। उदा. जीरा, सैंधव, बड़ी सौफ, अजवाइन, अदरक, लहसुन।

3) ग्राही : पाचन के समय यदि आँतों से निकलते पाचक रस बहुत पतले हो जाएँ तो यह द्रव सोखने का काम ये दवाएँ करती हैं। यदि पतली शौच होती हो, कुछ खाने पर शौच जाना पड़े, ऐसी स्थिति में ये दवाएँ बहुत गुणकारी होती हैं। उदा. कुडा, बेल, नागरमोथा, जीरा, सौंठ, बड़ी सौंफ, धायटी का फूल।

4) स्तंभन : स्तंभन का अर्थ है अंदर से रोकना या अवरोध करना। इस तरह की दवाएँ अवरोध न करते हुए केवल सोखने का कार्य करती हैं। ऐसी दवाएँ आँतों के स्रावों को बाहर जाने न देते हुए रोक लेती हैं। अगर अधिक संख्या में पतले दस्त हों तो शरीर से पानी कम हो जाने का भय होता है। ऐसे समय स्तंभन कारक दवाओं का उपयोग किया जाता है। उदा. जायफल, अफीम, जामुन, बरगद, गूलर और पीपल।

5) मृदु अनुलोमक : इस तरह की दवाएँ भोजन को ठीक तरह से पचने के बाद जो त्याज्य भाग बचा रहता है उसे बिना किसी कष्ट के गुद भाग से बाहर निकल जाने में सहायता करती हैं। उदा. अंगूर, हरड़, गर्म दूध + घी। आयुर्वेद में रात को गर्म दूध और घी, भोजन में छाछ और सुबह उठकर गुनगुना पानी पीने की सलाह दी जाती है।

रोग से बचने के उपाय :

इस बात का ध्यान रखें –

  • निकृष्ट भोजन न खाएँ।
  • भूख से कुछ कम खाएँ।खासकर पार्टी, भोज आदि के दौरान भरपेट भोजन और मीठा खाया जाता है, सावधान रहें। अन्यथा अपच और दस्त होना निश्चित है।
  • अति शीत पेय पदार्थ, रूखे-सूखे पदार्थ, तले हुए गरिष्ठ भोज्य पदार्थ न खाएँ तो बेहतर है।
  • भोजन निश्चित समय पर ही करें।
  • छाछ संजीवनी या अमृत की तरह है। प्रतिदिन सेवन करें।

इस लेख में एक रोग का उल्लेख करना चाहती हूँ, जो दस्त नहीं है। कुछ रोगियों को बार-बार अजीर्ण होने से उनके पेट की मांसपेशियाँ इतनी कमज़ोर हो जाती हैं कि वे पचे भोजन को आँतों की ओर धकेलने में असमर्थ हो जाती हैं और वमन के लिए ऊपर की ओर भी नहीं धकेल पातीं। फिर अधपचा भोजन आँतों में ही पड़ा रहता है। अगर और भोजन किया जाए तो वह भी जमा होने लगता है।

फिर पेट दर्द होने लगता है। न नीचे से गैस पास होती है न डकार आती है। न शौच होता है न वमन। प्यास बहुत लगती है। पानी पीने से पेट फूल जाता है। ऐसे रोगी को अस्पताल में भर्ती करके नाक में नली डालकर पेट में जमा हुआ सब बाहर निकाला जाता है। फिर तो जिस तरह गुब्बारे से हवा निकाली जाने पर गुब्बारा चपटा हो जाता है उसी तरह पेट मूल आकार में आ जाता है। अगर यह इलाज न किया गया तो भोजन पेट में सड़ने से शरीर में दर्द हो जाता है और गंभीर समस्या हो सकती है।

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