संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण के उपाय | Sankraman ki Roktham ke Upay

संक्रमण की रोकथाम के उपाय :

संक्रमण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिए।

  1. सूचना (Notification)
  2. पृथक्करण (Isolation)
  3. रोगाणुनाशक (Disinfection)
  4. रोग प्रतिरक्षा (Immunisation)
  5. सङ्गरोध अवधि (Quarantine Period)

1). सूचना

संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए यह अनिवार्य है कि इसकी फैलने की सूचना जनता को सही समय पर दें दी जाये। राजकीय चिकित्सालय के प्रभारी चिकित्सक का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने क्षेत्र में कहीं पर भी संक्रामक रोग फैल रहे हैं, उसकी सूचना रखें, उसको नियन्त्रण करने हेतु उसकी रोकथाम के लिए सार्वजनिक स्थानों पर जनता के लिए विज्ञप्ति प्रसारित करे एवं रोकने के उपायों पर प्रकाश डालें। जनता का भी यह दायित्व है कि उनके क्षेत्र में अगर संक्रामक रोग फैल गया है तो उसकी सूचना निकट के स्वास्थ्य केन्द्र में दें।

2). पृथक्करण

पृथक्करण से तात्पर्य यहां इससे लिया जाना चाहिए कि संक्रामित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति को अलग रखना ही है। क्योंकि संक्रामक रोग फैलता हुआ समय नहीं लेता है, इसलिए संक्रामक रोग से पीड़ित व्यक्ति के पास स्वस्थ व्यक्ति को नहीं जाना चाहिए। रोगी को अलग कमरे में रखा जाये। उसके बर्तन, वस्त्रादि भी अलग रखें। परिचारक के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों को यथासम्भव रोगी व्यक्ति से दूर रखा जाये। अगर रोग सार्वजनिक रूप में फैल गया हो तो उस रोगी को संक्रामक चिकित्सालय में भर्ती कर देना चाहिए। डाक्टर की सहायता से उस रोगी को उस मौहल्ला से दूर स्थानान्तरित कर देना चाहिए, जिससे कि रोग की रोकथाम की जा सके।

3). रोगाणु नाशक

हैजा, मियादी बुखार, प्लेग, पेचिश आदि रोगों के रोगाणु शरीर में किसी न किसी साधन द्वारा प्रवेश करके एक स्वस्थ व्यक्ति को आक्रान्त कर देते हैं। अत: इन रोगाणुओं का फैलाव रोकना अनिवार्य ही नहीं अपितु अपरिहार्य है। जहां तक सम्भव हो इन रोगाणुओं का नाश करना ही हितकर है। इन रोगाणुओं को नष्ट करने में जिन साधनों का प्रयोग किया जाता है उन्हें रोगाणनाशन कहते हैं। इसमें अग्नि तथा कार्बोलिक एसिड।
रोगाणुओं की वृद्धि कई पदार्थों द्वारा रोकी जाती है उन्हें प्रतिरोधि (Antiseptics) कहा जाता है जैसे अत्यधिक सर्दी तथा बोरिक एसिड। कुछ पदार्थ दुर्गन्ध का नाश करते हैं, ऐसे पदार्थों को गन्धहर पदार्थ (Deodorants) कहते हैं। इसमें फिनाइल आदि आते हैं।

रोगाणुनाशक पदार्थों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. प्राकृतिक
  2. भौतिक
  3. रासायनिक

(1) प्राकृतिक रोगाणुनाशन –

प्राकृतिक रोगाणुनाशन में प्रकृति द्वारा प्रदत साधन आते हैं। इनमें वायु तथा धूप प्रमुख हैं। शुद्ध वायु रोगाणुनाशन में बहुत ही धीमी गति से काम करती है। आक्सीजन रोगाणुओं का नाश करती है। इससे रोगाणुओं की वृद्धि भी रुक जाती है। सूर्य का प्रकाश भी रोगाणुनाशक है। सूर्य की तीव्र किरणें रोगाणुओं को नष्ट करने में सक्षम हैं। क्षय के कीटाणु धूप में प्रकाश के कारण आधा घण्टा में नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार टाईफाइड के रोगाणु भी धूप के कारण नष्ट हो जाते हैं। धूप में एक प्रकार की अल्ट्रा वायलेट किरणें निकलती हैं जोकि इन कीटाणुओं के लिए घातक होती हैं। अत: रोगी के कपड़ों आदि को धूप में सुखा देना चाहिए, जिससे कि वे पदार्थ रोगाणु रहित हो लाते हैं। धूप में विटामिन ‘डी’ भी पर्याप्त मात्रा में होता है। यह भी शरीर में विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक है।

(2) भौतिक रोगाणुनाशन-

भौतिक रोगाणुनाशन निम्नलिखित साधन उपयोग में लाते हैं –

(अ) उबालना – ज्यादातर मनुष्य इस विधि का रोग जीवाणुनाशन हेतु उपयोग में लाते हैं। १०० सेन्टीग्रेट ताप जीवाणुनाश हेतु उपयुक्त है। जल में रख कर उसमें रोगी के वस्त्र, बर्तन आदि को इस तापक्रम पर उबाल लेना चाहिए। आजकल डाक्टर लोग भी इस विधि से अपने यन्त्रादि जीवाणुरहित कर लेते हैं। क्योंकि वातावरण में हर समय जीवाणु विद्यमान रहते हैं। अत: उस यन्त्रादि के भी जीवाणु लगे रह सकते हैं। अत: उसको उबालने से वह जीवाणु रहित हो जाता है। इसी प्रकार इन्जेक्शन लगाने से पूर्व सिरिंज को भी उबाल कर प्रयोग में लाते हैं।

(ब) जलाना – रोग से संक्रमित पदार्थों को जीवाणु रहित करने के लिये कई बार इस विधि को उपयोग में लाते हैं। इस विधि में उस वस्तु को अग्नि में जलाते हैं जिससे जीवाणु अग्नि के द्वारा नष्ट हो जाते हैं। लेकिन सभी वस्तुओं को जलाया नहीं जा सकता है। सस्ती वस्तुओं को ही इस विधि से नष्ट करना चाहिए।

(स) भाप – भाप का उपयोग भी जीवाणुनाश हेतु उपयोगी पाया गया है। इसके द्वारा जीवाणु पूर्णरूप से समाप्त हो जाते हैं। जो जीवाणु गरम शुष्क वायु में 4 घन्टे में नष्ट होते देखे गये हैं, वे भाप से पांच मिनट में नष्ट हो जाते हैं। भाप का दाब बढ़ाकर बड़े-बड़े एवं भारी वस्त्र, चटाइयों को इसी विधि से रोगाणुनाशन किया जाता है। बड़े-बड़े चिकित्सालयों एवं नगरपालिकाओं के द्वारा संचालित डिस्पेन्सरियों में रोगाणु नाशन हेतु कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। संक्रामक रोगों से पीड़ित रोगियों के वस्त्रादि को रोगाणुनाशन औषधियों द्वारा उस विधि से कीटाणु रहित किया जाता है।

(द) शुष्क गरम वायु – कई वस्तुएं ऐसी होती हैं जिनमें उबालने पर उनका अस्तित्व ही नहीं रहता है। ऐसी वस्तुओं को शुष्क गरम वायु द्वारा जीवाणु रहित किया जाता है। पुस्तकों, चमड़ें की वस्तुएं, रबड़ादि के लिए यह विधि उपयुक्त है। वस्त्रादि को इस विधि से रोगाणुरहित करना उचित नहीं रहता है क्योंकि इसमें रोगाणुनाशन शक्ति कम होती है एवं समय ज्यादा लगता है।

(3) रासायनिक रोगाणु नाशक –

रासायनिक पदार्थ ठोस, द्रव एवं गैस तीनों अवस्थाओं में मिलते हैं। इनका उपयोग भी जीवाणुओं की समाप्ति के लिए किया जाता है, जोकि जीवाणुओं को शीघ्र नष्ट करता है। निम्नलिखित रासायनिक पदार्थ रोगाणुनाशन हेतु प्रयोग में लाये जाते हैं –

पोटैशियम परमैंगनेट, चूना, रस कपूर, क्रियोसोल, फिनाइल, कार्बोलिक एसिड, डी०डी०टी०, सल्फरडाईआक्साइड, क्लोरीन, फार्मेल्डीहाइड।

पोटैशियम परमैंगनेट – पोटैशियम परमैंगनेंट को साधारण बोलचाल की भाषा में लाल दवा के नाम से पुकारा जाता है। यह गहरे बैंगनी रङ्ग का कणदार चूर्ण होता है। इसको जल में घोलकर उपयोग में लाते हैं। जब रोग सार्वजनिक रूप में फैलता है तो कुओं, तालाबों तथा वाबड़ियों में इसको डाला जाता है।

चूना – बुझा हुआ एवं साधारण दोनों प्रकार का चूना जीवाणु को नष्ट करने में प्रयुक्त होता है। यह सस्ता पदार्थ है। घरों में सफेदी इसीसे की जाती है। इस सफेदी से दीवारों पर चिपके सैकड़ों कीड़े इससे नष्ट हो जाते हैं। इसका प्रयोग कुओं के पानी को शुद्ध करने में भी प्रयुक्त किया जाता है। सामान्य चूने की अपेक्षा बुझे हुये चूना में रोगनाशन शक्ति अधिक होती है। इसका 20% घोल मल, फर्श आदि के रोगाणुनाशन के लिए सक्षम होता है। चूने में क्लोरीन गैस गुजारने से ब्लीचिंग पाउडर बनाया जाता है। यह पानी शुद्ध करने में एक सस्ता एवं स्थाई रोगनाशक रासायनिक पदार्थ है। पानी की टकियों में सप्लाई से पूर्व यह डाला जाता है।

रस कपूर – यह पारे का यौगिक होता है, इसमें रोगाणुनाशक की शक्ति बहुत अधिक होती है। इसको घोल के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसका एक भाग ,100 भाग जल में मिलाकर प्रयोग करने से हैजा, डिफ्थीरिया, मोतीझरा आदि के कीटाणु दस मिनट में मर जाते हैं। यदि इसका एक भाग पांच सौ भाग में डाल दिया जाये, तो यह अधिक शक्तिशाली होकर स्पोर्स (Spores) को मारने, कपड़े, बिस्तर आदि के लिए प्रभावशाली रासायनिक रोगाणुनाशक हो सकता है। यह अत्यधिक विषैला पदार्थ है, इसलिए दुर्घटनाओं से बचने के लिए इसमें नीला रंग मिलाकर गोलियां बनायी जाती हैं।
उपदंश, गर्मी-सुजाक जैसे भयंकर संक्रामक रोगों में यह औषधि के रूप में प्रयुक्त की जाती है। इसका चिकित्सा में सावधानीपूर्वक प्रयोग करते हैं।

क्रियोसोल – यह सस्ता काले रंग में उपलब्ध है। इसको घोल के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। घोलने पर यह सफेद रंग में परिवर्तित हो जाता है। नलियों, गन्दे वस्त्रों एवं अन्य संक्रमित वस्तुओं को रोगाणुरहित करने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है। यह विषैला पदार्थ नहीं है।

फिनाइल – इसका उपयोग भी हम दैनिक जीवन में करते हैं। यह कार्बोलिक एसिड से दुगना तीव्र होता है। यह सस्ता रोगाणुनाशक पदार्थ है जिसका प्रयोग नालियों, शौच स्थानों को साफ करने में होता है।

कार्बोलिक एसिड – इसका उपयोग हैजा, पेचिश, टाईफाइड, दस्त आदि के रोगी के मल-मूत्र आदि को रोगाणु रहित करने में प्रयुक्त किया जाता है। इसका एक भाग ,जल के बीस भाग में मिलाकर प्रयुक्त करना चाहिए।

डी०डी०टी० – यह सफेद रंग का एक पाउडर होता है, जिसका उपयोग प्राय: घरों में मच्छरों को मारने आदि के लिये किया जाता है। सरकार द्वारा घरों में इसके घोल की स्प्रे करवायी जाती है। इसके प्रयोग से मक्खियां, चीटियां, जुऐं तथा अन्य कीड़े-मकोड़े नष्ट हो जाते हैं।

सल्फर डाई-आक्साइड – यह एक गैस रूप में रासायनिक पदार्थ होता है। इसमें तीव्र गंध होती है। कमरों की शद्धि के लिए इस गैस का उपयोग किया जाता है। इसकी एक किलो ग्राम की मात्रा तीस घन मीटर स्थान की शुद्धि के लिए पर्याप्त होती है। इसकी क्रियाशीलता के लिए नमी अनिवार्य है।

क्लोरीन – हरे रंग की भारी गैस होती है। यह भी कमरे के शुद्धिकरण में प्रयोग में ली जाती है। इसकी क्रियाशीलता के लिए भी नमी अनिवार्य है।

फार्मेल्डीहाइड – यह बहुत ही शक्तिशाली रोगाणुनाशक गैस है। इसका तरलरूप भी होता है। इन दोनों रूप में इसका प्रयोग होता है। सल्फर डाई आक्साइड एवं क्लोरीन दोनों की अपेक्षा यह शीघ्र फैलती है एवं तीव्र असरकारक है। यह कमरों के शुद्धिकरण में प्रयुक्त होती है। धातुओं पर इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है।

(4) रोग प्रतिरक्षा-

रोगों को टीके लगाकर उनके फैलने से रोका जा सकता है। कृत्रिम सक्रिय अर्जित प्रतिरक्षात्मक तरीके ही सबसे अधिक उपयुक्त और लाभदायक हैं। इससे जो शक्ति अर्जित होती है वह लम्बे समय तक टिकी रहती है और कहीं अधिक शक्तिवर्धक होता है।
इसके लिए हमें जीवाणु या विषाणुओं को ताप द्वारा, कुछ रसायन द्वारा अथवा उसके संवर्धन द्वारा व्याधि उत्पन्न करने की क्षमता क्षीण करनी होती है। लेकिन इनकी प्रतिरक्षी उत्पन्न करने की शक्ति बनी रहती है, जिससे ये प्रतिरक्षात्मक हो जाते हैं। जीवाणु जन्य टीके ताप से या फिनोल अथवा एलुमिनियम हाइड्रोक्साइड द्वारा प्रतिरक्षात्मक बनाये जाते हैं।
इसके मुख्य उदाहरण हैं-
रोहिणी, कुकर-खांसी व धनुःस्तम्भ टीका, हैजा का टीका आदि।
बी.सी.जी. का टीका क्षय के जीवाणुओं को संवर्द्धित कर बनाया जाता है। पोलियो जैसे विषाणुजन्य रोग के टीकों को भी संवर्द्धित कर बनाया जाता है।

(5) संगरोध अवधि –

जिन लोगों के रोगी होने की संभावना हो उस व्यक्तियों को उस क्षेत्र या उस गांव या शहर में जाने से रोक देना चाहिए, जहां पर इसका प्रसार है।

इस प्रकार से उपर्युक्त साधनों के द्वारा संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। सभी का यह नैतिक कर्तव्य है कि संक्रामक रोगों को रोकने में मदद करें। संक्रामक रोगों को रोकने में यही साधन अनिवार्य नहीं हैं, बल्कि व्यक्तिगत स्वच्छता तथा स्वास्थ्य के सामान्य नियमों का पालन भी अनिवार्य है।

अस्वीकरण :- यह लेख और जानकारी केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ पर दी गयी जानकारी का उपयोग किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या बीमारी के निदान या उपचार हेतु बिना विशेषज्ञ की सलाह के नहीं किया जाना चाहिए।

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