संतों के संग का प्रभाव (बोध कथा) | Motivational Story in Hindi

प्रेरक हिंदी कहानी : Hindi Storie with Moral

★ डाकू रामखान भयानक वेश, डरावना चेहरा, क्रूर भुजाओं से युक्त, ऐसा था कि सामने आनेवाला व्यक्ति उसे देखते ही शक्तिहीन हो जाये । परंतु महात्मा हरनाथ ने उससे न घृणा की, न चिन्ता की, न भय किया । वे आगे बढते गये ।

★ डाकू रामखान पाँच ही कदम दूर रह गया था । वह भी न पीछे हटा, न आगे बढा, फिर भी भीतर से संत की निगाह मात्र से इतना आगे बढ गया कि देखते-देखते ही उसकी यात्रा हो रही थी ।
‘‘हे महात्मन् ! हे प्रभु ! हे चलते-फिरते भगवान ! मैं बहुत पापी हूँ, मैंने बहुत पाप किये हैं, कई खून किये हैं, कई निर्दोषों की संपत्ति हडप ली है । संपत्ति छीनकर उनके हाथ-पैर तोड दिये या उन्हें यमपुरी पहुँच दिया । मैंने कितने, कौन-कौन से पाप किये हैं वह मैं गिना नहीं सकता । हे महात्मन् ! मैं अनाथ ! जन्मों का भटका हुआ जीव आपकी शरण में हूँ । मुझे कोई रास्ता बताइए । मुझे शरण में स्वीकार कर लीजिए ।

★ महात्मा हरनाथ ने अपनी गुणातीत दृष्टि, पुण्य-पाप से परे, सुख-दुःख से परे, साम्य अवस्था की दृष्टि डाली । महात्मा के समक्ष डाकू रामखान ने अपने पापों का प्रायश्चित किया, अपनी गलती को स्वीकार किया ।

★ जो गुरु, संत, महापुरुष के आगे अपनी गलती, पाप को स्वीकार करता है उसके पाप तो कटते हैं, लेकिन जो उनके आगे गलती करता है, झूठ-कपट करता है या कुछ अंट-संट कहता है उसकी गलती और पाप खतरे का रूप ले लेते हैं, बहुत बढ जाते हैं ।
अन्यक्षेत्रे कृतं पापं तीर्थक्षेत्रे विनश्यति ।
तीर्थक्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ।।

★ और जगह किया हुआ पाप तीर्थक्षेत्र में जाओ तो मिट जाता है परंतु तीर्थक्षेत्र में किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है । तीर्थ बनता है महापुुरुष की चरणरज से । भगवान या भगवत्प्राप्त महापुरुषों की चरणरज से वह जगह तीर्थ बनती है । ऐसे साकार महापुरुषों के आगे जो अपने पापों का प्रायश्चित करता है उनके पाप जल जाते हैं । जबकि ऐसे महापुरुषों के आगे जो कूड-कपट, जिद्द, हठ करता है उसके पुण्य जल जाते हैं ।

★ डाकू रामखान ने और तो कईयों को सताया परंतु एक महापुरुष को रिझा लिया । एक सत्पुरुष के आगे वह हृदयपूर्वक पापों का प्रायश्चित करते हुये, आँखों से गंगा-यमुना बहाते हुये, सच्चे हृदय से उन महापुरुष के चरणों को दूर से प्रणाम किया । ‘मैं अधम हूँ, पापी हूँ । मुझे संतों के चरण छूने का अधिकार ही नहीं है ऐसा सोचकर मन ही मन प्रणाम किया । उसका यह शुभ भाव देखकर जोगी हरनाथ मन ही मन खूब प्रसन्न हुये और मधुर वाणी में कहा :

★ ‘‘रामखान ! लोग तुझे डाकू कहते हैं, यह तेरी प्रकृति के गुणों का काम है । तू अपने स्वरूप को पहचानने के लिए भगवान के नाम की थोडी सहायता ले । प्राणायाम, ध्यान और भगवन्नाम का सहारा, ये तीन चीजें तुझे शुद्ध कर देगी । तू ध्यान की विधि मुझसे सीख ले । भगवन्नाम की दीक्षा ले ले । प्राणायाम करने की कला सीख ले । तेरे सारे पाप जल जायेंगे और तेरी छुपी हुई शक्तियाँ जाग्रत होगी वत्स !

★ उस डाकू को संत हरनाथ वत्स कह रहे हैं, पुत्र कह रहे हैं । ‘‘तुमने संत के आगे पापों का प्रायश्चित किया । अब तुम्हारे पाप रहे कहाँ ? पाप तो चले गये । अब पुण्यों को और प्रभु को प्रगट करना ही तेरा कर्तव्य है । ‘मैं पापी हूँ, डाकू हूँ यह चिन्तन मत कर । तूने पाप-ताप मेरे आगे रख दिये, वे सब प्रायश्चित की अग्नि में स्वाहा हो गये ।

★ साधु-संग अति पापी को भी पुण्यात्मा बना देता है । अति घृणित को भी श्रेष्ठ बनाने का सामर्थ रखता है । डाकू रामखान महात्मा से दीक्षित हुआ, उसे सच्चे प्रेम की एक निगाह मिली । उसने संसार से कँटीले मार्ग का त्याग करके संन्यास मार्ग को ग्रहण किया । गुरु महाराज के उपदेश के अनुसार वृंदावन में, श्रीकृष्ण की लीलास्थली में रहने लगा । थोडे ही समय में उसकी सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत हुई । प्राणायाम आदि से क्रियाशक्ति में बढोत्तरी हुई । भगवन्नाम से हृदय केन्द्र विकसित हुआ । गुरुमहाराज के सत्संग से ज्ञान का केन्द्र विकसित हुआ । तीन शक्तियों को विकसित करके संसार के तीन गुणों से पार होने लगा । एक सिद्ध संन्यासी हो गया ।

★ कहाँ तो एक खूँखार डाकू और कहाँ एक सिद्ध संन्यासी ! मनुष्य में बहुत सारी संभावनाएँ हैं । बहुत सारी योग्यताएँ छिपी हुई हैं । प्रेम, सद्भावना, शुभकामना उसका मंगल करती हैं । संत का संग एवं कृपा बहुत कुछ कर जाती है ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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