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Sarva Pitru Amavasya 2026: 10 अक्टूबर को करें पितरों को प्रसन्न करने के ये विशेष उपाय

📅 1 अक्टूबर 2026 ✍️ admin ⏱️ 12 मिनट
Sarva Pitru Amavasya 2026: 10 अक्टूबर को करें पितरों को प्रसन्न करने के ये विशेष उपाय

Last Updated on अक्टूबर 2, 2026 by admin

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष के 16 दिनों का विशेष महत्व होता है और इन 16 दिनों का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है – सर्वपितृ अमावस्या। इसे पितृमोक्ष अमावस्या और महालया अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस साल Sarva Pitru Amavasya 2026, 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन पितर पृथ्वी लोक से अपने लोक के लिए विदा लेते हैं। इसलिए इस दिन किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज सभी पितरों तक पहुंचता है, चाहे उनकी मृत्यु तिथि याद हो या न हो। यदि पितृपक्ष में किसी कारणवश आप किसी पितर का श्राद्ध नहीं कर पाए हैं, तो सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने से सभी का श्राद्ध पूर्ण माना जाता है। इस लेख में हम आपको सर्वपितृ अमावस्या की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व की सम्पूर्ण जानकारी देंगे।

सर्वपितृ अमावस्या क्या है? – Pitru Paksha का अंतिम दिन

पितृ पक्ष के अंतिम दिन पड़ने वाली अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। ‘सर्व’ का अर्थ है सभी और ‘पितृ’ का अर्थ है हमारे पूर्वज। यानी यह वह अमावस्या है जो सभी पितरों को समर्पित होती है। इसी कारण इसे सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या, पितृ अमावस्या और महालया अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार यह तिथि अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आती है। पितृ पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर इसी अमावस्या पर समाप्त होता है।

शास्त्रों के अनुसार जिन लोगों को अपने पितरों की पुण्यतिथि याद नहीं होती, या किसी कारणवश वे पूरे पितृ पक्ष में श्राद्ध नहीं कर पाए हों, वे केवल इसी एक दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करके सभी पितरों को तृप्त कर सकते हैं। इसलिए इस दिन का फल पूरे 16 श्राद्धों के बराबर माना गया है और इसी दिन पितरों की विदाई भी की जाती है।

सर्वपितृ अमावस्या 2026 कब है? तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस दिन शनिश्चरी अमावस्या का भी दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन किए गए दान और पितृ तर्पण का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। पंचांग के अनुसार इसी दिन पितरों की विदाई होगी और नवरात्रि की शुरुआत का प्रतीक महालया भी मनाया जाएगा।

श्राद्ध कर्म हमेशा कुतुप और अपराह्न मुहूर्त में करना सबसे फलदायी माना जाता है।

विषयविवरण
सर्वपितृ अमावस्या तिथि10 अक्टूबर 2026, शनिवार
अमावस्या तिथि प्रारंभ10 अक्टूबर 2026, सुबह 03:45 बजे से
अमावस्या तिथि समाप्त11 अक्टूबर 2026, सुबह 01:52 बजे तक
कुतुप मुहूर्तसुबह 11:44 से दोपहर 12:31 बजे तक
अपराह्न कालदोपहर 01:18 से 03:38 बजे तक

नोट: श्राद्ध के लिए दोपहर का समय ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। स्थानीय सूर्योदय के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग को अवश्य देखें।

सर्वपितृ अमावस्या का धार्मिक और पौराणिक महत्व

हिंदू धर्मशास्त्रों में सर्वपितृ अमावस्या को पितरों को मोक्ष दिलाने वाली सबसे पवित्र तिथि माना गया है। इसका महत्व स्वयं गरुड़ पुराण और ब्रह्म पुराण में विस्तार से बताया गया है।

  1. पुराणों में उल्लेख: गरुड़ पुराण के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान सीधे पितरों की आत्मा को शांति देता है और उन्हें पितृलोक में उच्च स्थान प्राप्त होता है। ब्रह्म पुराण कहता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया एक भी दान सौ गौदान के बराबर फल देता है।
  2. पितरों की विदाई का दिन: मान्यता है कि पितृ पक्ष के 16 दिनों के लिए हमारे पितर पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों के द्वारा दिए गए अन्न-जल को ग्रहण करते हैं। सर्वपितृ अमावस्या उनके पृथ्वी से विदा लेने का अंतिम दिन होता है। इसलिए इस दिन तर्पण करके उन्हें आदरपूर्वक विदा किया जाता है, ताकि वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देकर जाएं।
  3. सभी पितरों के लिए एक श्राद्ध: जिन पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो, जिनका श्राद्ध पितृपक्ष में छूट गया हो या अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों का श्राद्ध भी केवल इसी एक दिन करने से सभी पितर तृप्त हो जाते हैं। इसी कारण इसे पितृमोक्ष अमावस्या भी कहते हैं, क्योंकि यह पितृ ऋण से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।

सर्वपितृ अमावस्या की पौराणिक कथा – Story

सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा महाभारत के दानवीर कर्ण से जुड़ी है।

कहा जाता है कि कर्ण अपने जीवन में सोना, चांदी और हीरे-जवाहरात का दान तो खूब करता था, लेकिन उसने कभी अन्न और भोजन का दान नहीं किया था। मृत्यु के बाद जब उसकी आत्मा स्वर्ग पहुंची तो उसे खाने के लिए सोना और आभूषण ही दिए गए।

तब कर्ण ने देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा। इंद्रदेव ने कहा – “तुमने जीवन भर सोने का दान किया, इसलिए तुम्हें सोना मिल रहा है, लेकिन अन्नदान न करने के कारण तुम्हें भोजन नहीं मिल सकता।” तब कर्ण ने कहा कि उसे अपने पितरों के बारे में ज्ञान ही नहीं था।

इस पर प्रसन्न होकर इंद्रदेव ने कर्ण को 16 दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा, जहाँ उसने अन्नदान किया, पितरों का तर्पण और श्राद्ध किया। उन्हीं 16 दिनों को पितृ पक्ष कहा गया और अंतिम अमावस्या, जिस दिन कर्ण ने पितरों को विदा किया, वह सर्वपितृ अमावस्या कहलाई।

सर्वपितृ अमावस्या की सम्पूर्ण पूजा विधि और तर्पण मंत्र

सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया श्राद्ध, तर्पण और दान ही पितरों तक सीधे पहुंचता है, इसलिए इस दिन की पूजा विधि को शास्त्रों के अनुसार सही क्रम में करना बहुत जरूरी है।

1. तर्पण और पिंडदान की विधि – Step-by-Step

  • स्नान और संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी या गंगाजल मिले जल से स्नान करें। पितरों के नाम का ध्यान कर हाथ में जल, कुश, काले तिल और फूल लेकर श्राद्ध का संकल्प लें।
  • दिशा और आसन: श्राद्ध के लिए हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। जनेऊ को दाएं कंधे से बाएं (अपसव्य) करें।
  • तर्पण करें: तांबे के लोटे में जल, काले तिल, जौ और कुश डालें। अपने पितरों, गोत्र का नाम लेकर तीन बार जलांजलि दें।
  • पिंडदान: पके हुए चावल, जौ के आटे और काले तिल को मिलाकर 3 पिंड बनाएं और कुश पर रखें। यह पिंड पितरों के शरीर का प्रतीक माना जाता है।

2. ब्राह्मण भोज और पंचबली भोग

तर्पण के बाद भोजन बनाकर सबसे पहले पंचबली निकालें। इसमें 5 हिस्से होते हैं – 1. गाय के लिए, 2. कुत्ते के लिए, 3. कौए के लिए, 4. देवताओं के लिए और 5. चींटियों के लिए। कौए को पितरों का रूप माना जाता है, इसलिए कौए को भोजन कराना सबसे महत्वपूर्ण है। इसके बाद सम्मानपूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराएं और यथाशक्ति दक्षिणा दें।

3. पितरों के लिए प्रार्थना मंत्र

तर्पण और भोजन के समय इन मंत्रों का जाप करें –

तर्पण मंत्र: ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहणन्तु जलान्जलिम्
पितृ गायत्री मंत्र: ॐ पितृ देवतायै नमः
प्रार्थना मंत्र: ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः।

मान्यता है कि इस दिन पूरी श्रद्धा और पवित्रता से किया गया तर्पण पितरों को मोक्ष देता है और पितृदोष से मुक्ति दिलाता है।

सर्वपितृ अमावस्या पर पितृ सूक्त और गीता के मंत्र

सर्वपितृ अमावस्या पर केवल तर्पण ही नहीं, बल्कि वैदिक मंत्रों का पाठ भी पितरों को परम शांति देता है।

शास्त्रों के अनुसार इस दिन पितृ सूक्त का पाठ सबसे फलदायी माना जाता है। ऋग्वेद में वर्णित पितृ सूक्त के श्रवण और पाठ से पितर प्रसन्न होते हैं और वंश की रक्षा करते हैं। इसके साथ ही श्रीमद्भगवद् गीता के सातवें और पंद्रहवें अध्याय का पाठ करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पूजा के समय इस पितृ गायत्री मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें –

ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृ प्रचोदयात्।

मान्यता है कि इस दिन पितृ स्तोत्र, पितृ कवच और गीता पाठ करने से पितृदोष शांत होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

सर्वपितृ अमावस्या पर दान का विशेष महत्व – क्या दान करें?

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया दान अक्षय फल देता है और पितरों की आत्मा को सीधे तृप्त करता है। इस दिन किया गया दान ही पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है।

इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार इन चीजों का दान करना सबसे शुभ माना जाता है:

  • अन्न दान: चावल, गेहूं, दाल और भोजन का दान – इसे महादान माना गया है
  • काले तिल और जौ का दान: पितरों को तिल अत्यंत प्रिय हैं, इससे पितृदोष शांत होता है
  • वस्त्र और घी का दान: ब्राह्मण को धोती, वस्त्र और घी का दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं
  • गुड़ और चांदी का दान: पितरों की कृपा और समृद्धि के लिए

2026 में विशेष संयोग: इस बार सर्वपितृ अमावस्या शनिवार को पड़ रही है, इसलिए इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जाएगा। ऐसे में काले तिल, सरसों के तेल, काले वस्त्र और लोहे की वस्तुओं का दान शनि दोष और पितृ दोष दोनों को शांत करता है। दान हमेशा किसी गरीब, जरूरतमंद या ब्राह्मण को सम्मान के साथ दें।

इस दिन क्या करें और क्या न करें? – महत्वपूर्ण नियम

सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों की कृपा पाने के लिए पवित्रता और नियमों का पालन करना बहुत जरूरी है। एक छोटी सी गलती भी श्राद्ध के फल को नष्ट कर सकती है।

क्या करें – Do’sक्या न करें – Don’ts
सुबह स्नान कर पितरों का ध्यान कर तर्पण करेंइस दिन तामसिक भोजन – लहसुन, प्याज, मांस, शराब का सेवन बिल्कुल न करें
घर में सात्विक भोजन बनाएं और गाय, कुत्ते, कौए को भोजन जरूर कराएंबाल, नाखून काटना और दाढ़ी बनाना वर्जित माना जाता है
पीपल के पेड़ में जल, काले तिल और फूल अर्पित करेंघर में कलह, झूठ बोलना और किसी का अपमान न करें
श्रीमद्भगवद् गीता का पाठ और पितृ मंत्रों का जाप करेंइस दिन किसी से उधार लेना या देना अशुभ माना जाता है
ब्राह्मण, गरीब और जरूरतमंद को सम्मान के साथ दान-दक्षिणा देंचने, मसूर और सत्तू का सेवन न करें

विशेष नियम: इस दिन दोपहर के समय ही श्राद्ध करें और भोजन में खीर, पूड़ी और सफेद वस्तुओं को शामिल करना शुभ माना जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या और पितृदोष निवारण के अचूक उपाय

कुंडली में पितृदोष होने पर व्यक्ति को जीवन में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे – विवाह में देरी, संतान प्राप्ति में बाधा, नौकरी-व्यापार में असफलता और घर में लगातार कलह। सर्वपितृ अमावस्या पितृदोष को शांत करने का सबसे उत्तम दिन माना गया है।

इस दिन पितृदोष निवारण के लिए ये अचूक उपाय करें:

  • पीपल पूजा: सुबह पीपल के पेड़ पर काले तिल मिला जल अर्पित करें और शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाएं। पीपल में पितरों का वास माना जाता है।
  • तर्पण और ब्राह्मण भोज: इस दिन विधि-विधान से तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज कराने से पितृदोष शांत होता है।
  • गाय और कौए को भोजन: गाय को हरा चारा और कौए को खीर-पूड़ी खिलाएं।
  • दान: गरीबों को अन्न, वस्त्र और काले तिल का दान करें।

मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर सच्चे मन से किया गया एक भी उपाय पितरों को प्रसन्न कर पितृदोष से मुक्ति दिला देता है।

सर्वपितृ अमावस्या पर बनने वाले विशेष संयोग 2026

साल 2026 की सर्वपितृ अमावस्या बेहद दुर्लभ और शुभ संयोग लेकर आ रही है, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ गया है।

इस बार सर्वपितृ अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाएगा। शास्त्रों में शनिश्चरी अमावस्या पर किया गया पितृ तर्पण, पिंडदान और शनि से जुड़ा दान पितृदोष के साथ-साथ शनिदोष को भी शांत करता है।

इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग जैसा शुभ योग भी बन रहा है, जिसमें किया गया हर शुभ कार्य सिद्ध होता है। मान्यता है कि इस दुर्लभ शनि अमावस्या पर पीपल की पूजा, काले तिल और सरसों के तेल का दान करने से पितर प्रसन्न होकर वंश को सुख, समृद्धि और मोक्ष का आशीर्वाद देते हैं।

निष्कर्ष – Conclusion

सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अवसर है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और पितृ ऋण से मुक्ति का दिन है।

मान्यता है कि इस दिन सच्ची श्रद्धा से किया गया तर्पण, दान और ब्राह्मण भोज सीधे पितरों तक पहुंचता है और वे प्रसन्न होकर अपने वंश को सुख-समृद्धि, संतान सुख और सफलता का आशीर्वाद देकर विदा लेते हैं। इसलिए यदि आप पूरे पितृ पक्ष में श्राद्ध नहीं कर पाए हैं, तो 10 अक्टूबर 2026 को इस पावन अमावस्या पर पितरों को अवश्य याद करें।

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