शिक्षाप्रद कथा प्रसंग : योग से जुड़ी दिव्य सिद्धियाँ-विभूतियाँ

ईश्वर से बढ़कर दुनिया में कोई और योगी नहीं। इसलिए योग-विभूतियों को ईश्वरीय विभूतियाँ ही कहना चाहिए। यह इस मार्ग के प्रत्येक पथिक में प्रकट होती और बताती हैं कि जीवन को योग के अनुशासन में यदि ढाल लिया जाए तो वह इतना चमत्कारिक और अद्भुत हो जाता है कि उसकी उपमा अनुपम से दी जा सके।

योग क्या है ? :

अपने को ईश्वर से, ईश्वरीय विधिव्यवस्था से जोड़ लेना ही योग है। इसमें साधक को खोनाही-खोना पड़ता है। पाना तो कुछ होता नहीं, कारण कि जो कुछ पाया जाता है, वह तो पहले से ही मौजूद है। उसके ऊपर कल्मषों का आवरण चढ़ा होता है, अतएव उसकी अनुभूति नहीं हो पाती। जब उस आवरण को हटाया मिटाया जाता है तो धीरे-धीरे उसका प्रकाश बाहर प्रकट होने लगता है। इसी के साथ सिद्धियों का द्वार खुल जाता है। वे प्रत्यक्ष होने लगती हैं। साधक जब बिना किसी आकर्षण के एकनिष्ठ भाव से उस मार्ग में आगे बढ़ता जाता है तो अंततः परमात्मा की प्राप्ति होती है और उसका संपूर्ण ऐश्वर्य भी उसके हाथ आ लगता है। वह ईश्वरतुल्य बन जाता है। वास्तविक योग यही है।

योग की विचित्र सिद्धियों और विभूतियों के चमत्कार :

पहली कथा – योगी की अलौकिक शक्ति

योगदर्शन के विभूतिपाद में ऐसी अनेक सिद्धियों और विभूतियों का वर्णन है, जो योग-साधना के आगे बढ़ने के साथ-साथ साधक के जीवन में प्रकट होती हैं। साधना मार्ग में अष्टसिद्धियाँ और नवनिधियाँ प्रमुख हैं, पर इनके अतिरिक्त और भी सैकड़ों प्रकार की योग-विभूतियाँ हैं, जिनके आने से साधक चमत्कारपूर्ण और कृतकृत्य अनुभव करने लगता है। ऐसी ही एक सिद्धि का उल्लेख स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती ने अपने ग्रंथ ‘ब्रह्म विज्ञान’ में किया है।

वे लिखते हैं कि अमृतसर के पंडित आत्माराम अमृतसरी उनसे बहुत स्नेह करते थे। उनने बड़ौदा में एक कन्या गुरुकुल खोल रखा था, इस कारण से अधिकांश समय वह वहीं रहते, पर जब कभी उनका अमृतसर आगमन होता तो योगेश्वरानंद से अवश्य मिलते। एक बार वे और पंडित आत्माराम भरतपुर गए।वहाँ उन्हें योगदर्शन पर व्याख्यान देना था।व्याख्यान की समाप्ति पर वहाँ के आर्य समाज के प्रधान पंडित जी के पास आए। उन्होंने योगदर्शन के विभूतिपाद पर अपनी शंका प्रकट की, कहा कि महर्षि पतंजलि ने यह सब मनगढ़त लिख दिया है। इस पर आत्माराम बहुत नाराज हुए। दोनों में इस विषय पर बहुत वाद-विवाद हुआ, पर कोई हार मानने को तैयार
नहीं हुआ। दोनों अपनी-अपनी बात पर डटे रहे। पंडित आत्माराम का कहना था कि महर्षि ने जो कुछ अपने ग्रंथ में लिखा है, वह सब अनुभूतिजन्य है और अनुभव करने के उपरांत ही लिखा होगा।योगमार्ग का यह एक महान मार्गदर्शक शास्त्र है। इस पर अब तक किसी ने उँगली नहीं उठाई है। आप पहले व्यक्ति हैं, जो ऐसा कह रहे हैं। पर इतने से आर्यसमाज के प्रधान संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने पंडित जी को एक उपाय बतलाया, जिससे विवाद का सर्वमान्य समाधान निकल सकता था।

भरतपुर से लगभग ३६ कि.मी. दूर वन में एक योगी रहा करते थे। प्रधान ने पंडित जी को वहाँ चलने का सुझाव दिया, जिसे वे मान गए। दोनों योगदर्शन लेकर उस योगी के पास पहुँचे। प्रधान साथ में एक माचिस भी ले गए। योगी के पास पहुँचकर प्रधान ने कहा कि या तो आप विभूतिपाद की कोई सिद्धि हमें दिखाएँ अथवा इस ग्रंथ को जलाकर राख कर दें। योगी बोले कि वह अपने पथप्रदर्शक ग्रंथ का इतना निंदित और घृणित अपमान कैसे कर सकता है? योगमार्ग का यह एक अनुपम ग्रंथ है। ऐसा करके वह इसमें वर्णित सचाई को नहीं झुठला सकता। “तो फिर आप इसकी कोई सिद्धि दिखाएँ?” प्रधान बोले।

योगी ने कहा कि इसके लिए आपको आज रात यहाँ रुकना पड़ेगा।दोनों मान गए। तब योगी ने कहा कि प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व आप लोग मेरी कुटिया के बाहर आकर बैठ जाएँ। गरमी का मौसम था। दोनों ने पास के पेड़ के नीचे रात गुजारी और बड़े सबेरे आकर योगी की कुटिया के बाहर बैठ गए। अभी सूर्योदय होने में करीब दो घंटे बाकी थे। वे उत्सुकतापूर्वक सूर्य निकलने का इंतजार करने लगे। योगी अपनी कुटीर के अंदर थे। जब सूर्योदय का समय समीप आया तो वे उससे बाहर निकले और कुटिया के आगे खड़े हो गए। पूर्व दिशा में भगवान भुवन भास्कर भासमान हुए। उसकी टेढ़ी-तिरछी किरणें पृथ्वी पर पड़ने लगीं। दोनों अधीर हो उठे कि अब क्या होने वाला है, तभी उन्होंने देखा कि योगी उन किरणों पर ठीक उसी प्रकार चढ़ते चले जा रहे हैं, जैसे कोई तिरछी बाँधी रस्सी पर आगे की ओर झुकते हुए चढ़ता हो। दोनों दंग रह गए। उन्होंने काफी देर वहाँ रहकर योगी के लौटने की प्रतीक्षा की, पर वे फिर वापस नहीं आए।

किसी प्रकार की सात्विक साधना में दंभ का कोई स्थान नहीं है। वे एक-दूसरे के विरोधी हैं। दोनों साथ-साथ कभी नहीं रह सकते। योग भी इसका अपवाद नहीं। योग तो आत्मा-परमात्मा के मधुर मिलन का नाम है और यह मिलन तब तक संभव नहीं, जब तक हम आत्मा को, अपने आपे को परमात्मा के समतुल्य परम पवित्र न बना लें। वास्तविक योग इसी स्थिति में घटित होता है। इसमें अहंकार गलकर समाप्त हो जाता है। उसका अल्पांश अवशेष भी नहीं बचता, किंतु कई बार इस मार्ग में आगे बढ़ने वाले साधक यह गलती कर बैठते हैं, जिससे उन्हें क्षति उठानी पड़ती है और अनेक बार दंड भी भुगतना पड़ता है।

दूसरी कथा – योगी माणिकनाथ की कथा

ऐसा ही एक प्रसंग नाथ परंपरा में दीक्षित योगी माणिकनाथ के साथ घटित हुआ। उन्हें अपनी सिद्धियों पर बड़ा गर्व था और बात-बात पर वे लोगों को दंडित करने पर उतारू हो जाते थे। उनका आश्रम गुजरात में माणिक नदी के तट पर था। यह उन दिनों की बात है, जब वहाँ के शासक अहमदशाह थे। वे अपने नाम पर ‘अहमदाबाद’ नामक एक नया नगर बसाना चाहते थे और अपने राज्य की राजधानी भी उसे ही बनाना चाहते थे। जब इसके लिए स्थान चयन की बात आई तो उसी क्षेत्र को चुना गया, जहाँ माणिकनाथ का आश्रम था। कुछ ही दिनों में आश्रम के सामने निर्माणकार्य शुरू हो गया। इससे माणिकनाथ बड़े कुपित हुए और अपनी सिद्धि के बल पर निर्माणकार्य में अड़चन पैदा करने लगे।सुलतान परेशान हो गए। वे एक दिन माणिकनाथ के पास गए और विनती करने लगे कि आप जैसे महापुरुषों को यह बात शोभा नहीं देती।आप तो चमत्कारी पुरुष हैं। आप में अद्भुत शक्ति है। उस शक्ति से निर्माणकार्य में हमें मदद करनी चाहिए, यही प्रार्थना करने हम आए हैं।

अपनी प्रशंसा सुनकर योगी गर्वोन्नत हो गए। वे कहने लगे, तुम्हें आश्रम के आगे यह निर्माणकार्य हमसे पूछकर करना चाहिए। बिना पूछे करने से योगी का अपमान होता है। मैं महान सिद्धियों का स्वामी हूँ, इसलिए तुम्हें मुझसे भय करना चाहिए। मैं चाहूँ तो आकाश में विहग की तरह उड़ जाऊँ अथवा सामने रखे इस गंगासागर लोटे में समा जाऊँ। बोलो, अपनी कौन-सी सिद्धि दिखाऊँ ? कुछ सोचकर सुलतान ने कहा, महाराज पक्षियों को तो आकाश में उड़ते हुए बहुत देखा है। आप भी पक्षी बनकर नभ में विचरण करने लगें तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। अचंभा तो तब होगा, जब आप इस लोटे में समा जाएँ। इतनी बड़ी काया और इतना छोटा लोटा। यह कैसे संभव होगा? इसे मैं देखना चाहता हूँ। सुलतान की सोच में कुटिलता थी। वह जान-बूझकर माणिकनाथ को गंगासागर में प्रवेश करने के लिए उकसा रहा था। माणिकनाथ भी फूले नहीं समा रहे थे। उन्होंने अपनी सिद्धि का प्रयोग कर अपने को एकदम लघु बना लिया और लोटे में प्रविष्ट कर गए। जैसे ही वे उसके अंदर गए, सुलतान ने अपने दीवान को इशारा किया। दीवान ने तुरंत गंगासागर और उसकी टोंटी का मुँह बंद कर दिया। योगी मुश्किल में फँस गए। पहले तो उन्होंने तरह-तरह की धमकी दी कि तुम्हारा सर्वनाश कर डालूँगा, तुम्हारे राज्य का विध्वंस कर दूंगा, पर इन धमकियों का कोई असर जब सुलतान पर नहीं पड़ा तो उनने कहा कि सावधान ! अब मैं लोटा फोड़कर बाहर आ रहा हूँ और तुम्हें पाठ पढ़ाऊँगा।

माणिकनाथ वज्रास्त्र का प्रयोग करने को उद्यत हुए, पर यह क्या वे तो सब कुछ भूल गए। दूसरी सिद्धियों को भी अजमाया, किंतु समय पर कोई भी काम न आई । वास्तव में उन पर गुरु का शाप था कि अहंकार-प्रदर्शन के समय तुम संपूर्ण विद्या भूल जाओगे। यही हुआ। अपनी यह हालत देखकर वे रो पड़े और गुरु का स्मरण करने लगे। गोरखनाथ लोटे के भीतर प्रकट हुए और शिष्य से कहने लगे कि अहंकार योगियों के लिए उचित नहीं। तुम सुलतान के काम में विघ्न पैदा न करो और उसे अपना निर्माणकार्य करने दो।

इतना कहकर गोरखनाथ अंतर्ध्यान हो गए।माणिकनाथ को बोध हुआ। उनने करुणाविगलित स्वर में सुलतान से कहा कि अब तुम लोटे का मुँह खोल दो।मैं तुम्हारे काम में बाधा नहीं डालूँगा। अभी-अभी मेरे गुरु मुझे समझा गए हैं कि ज्ञानियों के लिए हठधर्मिता समीचीन नहीं, अतः मेरी बात मानो और मुझे बाहर आने दो। मैं तुम्हारा कुछ भी अहित नहीं करूंगा।

सुलतान के संकेत पर लोटे का मुँह खोल दिया गया।वे उससे बाहर आए।सुलतान उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा। योगी ने उसे अभयदान और आशीर्वाद दिया। इसके बाद उसी स्थान पर अपने शरीर का परित्याग कर दिया। उन्हीं की स्मृति में सुलतान ने नगर के परकोटे के एक बुर्जका नाम माणिक बुर्ज और नगर के मुख्य चौक का नाम माणिक चौक रख दिया। अहमदाबाद का माणिक बुर्ज और माणिक चौक आज भी योगी माणिकनाथ का स्मरण दिलाते हैं।

योग आत्मकल्याण और लोककल्याण का पर्याय है। जो इस दृष्टि से इसे साधते हैं, वे वास्तव में अपना और योग का हित-साधन ही करते हैं, किंतु जो लोग इसे दुराग्रह और अहंकार-प्रदर्शन का माध्यम बना लेते हैं, वे दोनों का अहित करते हैं। योग की सिद्धियों का सुनियोजन ही होना चाहिए।

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