श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) का आयुर्वेदिक इलाज – Leucoderma Ayurvedic Treatment in Hindi

श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) क्या है ? (What is Leucoderma in Hindi)

safed daag kya hota hai –

श्वेत कुष्ठ एक ऐसी बीमारी है जिससे कोई भी व्यक्ति बचना चाहेगा । यह त्वचा से संबंधित एक ऐसा रोग है जिसमें इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति को शारीरिक परेशानी से ज्यादा मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। शरीर पर किसी भी तरह के सफेद रंग के दाग पड़ने को ही श्वेत कुष्ठ कहते हैं। इसे सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा भी कहते है। ल्यूकोडर्मा ‘ल्यूको’ तथा ‘डर्मा’ नामक ग्रीक शब्द से मिलकर बना है जिसका अर्थ ‘सफेद त्वचा’ होता है इसमें व्यक्ति की त्वचा पर सफेद चकते बनना प्रारम्भ हो जाते है और कई बार यह पूरे शरीर पर फैल जाते है।

श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) के कारण (Leucoderma Causes in Hindi)

safed daag kyon hota hai –

आयुर्वेद में श्वेतकुष्ठ को श्वित्र रोग कहते है। ‘श्वितावर्णे’ धातु से श्वित्र शब्द बना है जिसका अर्थ होता है-त्वचा का वैकारिक रुप से सफेद हो जाना। शरीर के जिस हिस्से पर इसका प्रभाव पड़ता है वहां से मेलेनोसाइटस पूरी तरह से खत्म हो जाते है। मेलेनोसाइटस त्वचा की परत में पायी जाने वाली वो कोशिकाएं है जो मेलेनिन नामक रंजक पदार्थ उत्पन्न करती है। मेलेनिन त्वचा को स्वाभाविक रंग प्रदान करने वाला तत्व है। श्वेत कुष्ठ किन कारणों से होता है, वो अभी स्पष्ट नहीं है। फिर भी कुछ संभव कारण है –

  • मेलेनिन नामक रंजक पदार्थ का कम बनना या पूर्ण रुप से बनना बंद हो जाना।
  • अत्यधिक कब्ज, आमाशय की खराबी, आन्त्र कृमियों का संक्रमण।
  • लीवर का ठीक प्रकार से कार्य न करना या पीलिया रोग ।
  • टाइफाइड जैसी बीमारी या पेट में कीड़ों का होना।
  • मादक द्रव्यों का सेवन करना।
  • विटामिन ‘बी’ समूह की कमी, थाइराइड ग्रन्थि के रोग, मधुमेह आदि के साथ श्वेत कुष्ठ का कुछ हद तक संबंध रहता है।
  • प्लास्टिक तथा चमड़े के कार्य में प्रयुक्त होने वाले रसायनों के लगातार सम्पर्क में रहना, घटिया सौन्दर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल आदि कारण सम्मिलित है।
  • किसी पदार्थ से एलर्जी से भी सफेद दाग उत्पन्न हो सकते है। महिलाओं में माथे पर जहां बिंदिया लगायी जाती है वहा सफेद दाग उभरते देखे जाते है।
  • मानसिक तनाव व फास्टफूड या मिलावटी पदार्थों के सेवन से भी यह हो सकता है।
  • फिरंग, ग्रेविस डिसीज, पारा विष, नाड़ी जन्य विकार या रीढ़ की हड्डी जन्य विकार या सेप्टिक फोकस आदि इस रोग को पनपाने में उत्तरदायी है।

त्वचा की परत एपिडर्मिस में पायी जाने वाली मेलेनोसाइट कोशिकाओं में मेलेनिन नामक रंजक उत्पन्न होता है। मेलेनोसाइटस कोशिकाओं में टायरोसिन नामक एक एमीनो एसिड़ पाया जाता है जो मेलेनोसाइट कोशिकाओं को मेलेनिन नामक रंजक पदार्थ को सामान्य रुप में उत्पन्न करने में मदद करता है।

टायरोसिन नामक एमीनो एसिड़ दूध के केसीन नामक प्रोटीन में काफी मात्रा में रहता है। टायरोसिन की सक्रियता सूर्य की अल्ट्रा वॉयलेट किरणों, एस्कॉर्बिक एसिड या विटामिन ‘सी’ और तांबे के प्रति अति संवेदनशील होती है और उनके प्रभाव से ही मेलेनिन का उत्पादन नियंत्रित रहता है। अग्र पिट्यूट्री ग्रन्थि के मेलेनोसाइट स्टीम्यूलेटिंग हार्मोन (MSH) द्वारा भी मेलेनिन का उत्पादन सीधे रुप से प्रभावित होता है। यदि यह टायरोसिन असक्रिय अवस्था में रहता है तो त्वचा की मेलेनोसाइट कोशिकाएं अपना सामान्य कार्य अर्थात मेलेनिन का उत्पादन नही कर पाती। जिससे उन कोशिकाओं में मेलेनिन की कमी होने लगती है। त्वचा के जितने हिस्से में मेलेनिन का अभाव होता है वहां सफेद दाग दिखाई देता है। यदि पूरे शरीर की त्वचा में मेलेनिन का अभाव हो तो उस व्यक्ति का पूरा शरीर सफेद दिखाई देता है। जब किसी व्यक्ति में टायरोसिन की मात्रा बिल्कुल भी उत्पन्न नहीं होती है तो उसकी त्वचा जन्म से ही श्वेत वर्ण की बनी रहती है। श्वेत वर्ण की त्वचा वाले लोगों को एल्बिनिज्म कहा जाता है। सफेद दाग का रोग आनुवांशिक भी होता है।

आयुर्वेदानुसार श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) के कारण –

आयुर्वेद के अनुसार सफेद दाग के निम्लीखित कारण हो सकते है ।

  • अजीर्ण होने पर भी भोजन करना ।
  • दूध, दही, ताक, मांस, कुलत्थ तथा स्नेह द्रव्यों का एक साथ प्रयोग करना ।
  • लकुच, तिल, उड़द, खट्टे, नमकीन, अलसी तथा काकमाची का ज्यादा मात्रा में सेवन करना ।
  • भारी, चिकनाई युक्त तथा द्रव पदार्थो का अधिक सेवन करना।
  • उल्टी तथा अन्य अधारणीय वेगों को रोकना ।
  • भय, श्रम, गर्मी से आने पर तुरन्त ठण्डा पानी पीना ।
  • दिन में सोना और रात में जागना ।
  • सूर्य की किरणों के सम्पर्क में न रहना ।
  • अस्वाभाविक रहन-सहन, व्रण (घाव), अम्लपित्त, अतिसार की ठीक प्रकार से चिकित्सा न करने पर।
  • कृमि रोग के बहुत दिनों तक रहने पर भी श्वेत कुष्ठ रोग होने की सम्भावना रहती है।

आयुर्वेद में देवताओं की निंदा करना,गुरुजनों का अपमान करना, असत्य बोलना, पापकर्मों में लिप्त रहना, अनादर भाव रखना, पर स्त्रीगमन करना आदि कारण भी बताए गए है।

श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) के लक्षण क्या है ? (Leucoderma Symptoms in Hindi)

safed daag ki pehchan aur lakshan kya hai –

  • श्वेत कुष्ठ की शुरुवात आमतौर पर सफेद चकते के रुप में त्वचा और श्लेष्मा के संगम वाले स्थान जैसे हाथ, अंगुलियों, कोहनी, होंठ, टखनों, जननेन्द्रिय के आस-पास ही देखी जाती है। जो धीरे-धीरे अन्य स्थानों पर फैलता जाता है। इस तरह शरीर के किसी हिस्से की त्वचा का पूर्णतया रंगहीन हो जाना श्वेत कुष्ठ का सामान्य लक्षण है।
  • प्रारम्भ में त्वचा का रंग फीका पड़ता है फिर क्रमशः यह भाग रंगहीन हो जाता है। शुरु में इसका आकार छोटा होता है जो क्रमशः बढ़ता जाता है। शरीर का वह हिस्सा लगभग पूरा सफेद हो जाता है।
  • त्वचा पर बने हुए सफेद दाग विभिन्न आकार-प्रकार के होते है। किसी-किसी रोगी का अधिकांश शरीर इन सफेद दागों से भर जाता है यहां तक कि बाल भी सफेद होते है।
  • श्वेत कुष्ठ से पीड़ित रोगी की त्वचा सूर्य की धूप और आग के प्रति अति संवेदनशील होती है अतः जिसे श्वेत कुष्ठ हो गया हो
  • वह भाग गर्मी या धूप में खुला नहीं रखा जाता है क्योंकि धूप या आग की गर्मी में वह भाग दाह (जलन) कर सकता है।
  • श्वेत कुष्ठ वाली त्वचा पर रसायनों का असर भी तेजी से होता है।
  • श्वेत कुष्ठ से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर में विटामिन ‘डी’ के निर्माण की प्रक्रिया भी कुछ हद तक बाधित होने लगती है और शरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है तथा उन्हें कई तरह के संक्रामक रोगों के प्रति संवेदनशील बना देती है।

श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) का आयुर्वेदिक उपचार (Leucoderma ka Ayurvedic ilaj in Hindi)

safed daag ka ayurvedic upchar kya hai –

1). बाकुची – श्वेत कुष्ठ के उपचार में प्रयोग की जाने वाली औषधियों में बाकुची प्रमुख औषधि है। बाकुची का प्रयोग आन्तरिक सेवन तथा बाहरी लेप दोनो रुपों में लाभदायक होता है। बाकुची के बीज तथा तेल का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। श्वेत कुष्ठ से प्रभावित स्थान पर बाकुची तैल का लेप करके सुबह तथा शाम सूर्य की किरणों को खुली त्वचा पर 10 मिनट तक पड़ने दिया जाता है। कभी-कभी इसके प्रयोग से सफेद दाग वाली त्वचा पर फफोले पड़ जाते है।

इन फफोलों को विसंक्रमित सूई से भेदकर सफेद त्वचा को निकाल दिया जाता है। कुछ दिनों तक इस पर तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा घाव के ठीक होने पर पुनः इसका प्रयोग करना चाहिए। घाव पर नीम का तेल लगाने पर धीरे-धीरे त्वचा में स्वाभाविक वर्ण उभरने लगता है।
यह उपचार किसी योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख में ही करना चाहिए।
काले तिल तथा बाकुची का लगभग एक साल तक आन्तरिक सेवन प्रयोग आयुर्वेद में बताया गया है।

2). महातिक्त घृत – श्वेत कुष्ठ के उपचार में महातिक्त घृत का प्रयोग आचार्य सुश्रत ने लाभदायक बताया है।

3). फिटकरी – हरताल, गंधक तथा फिटकरी को जल में पीसकर श्वेत कुष्ठ वाले स्थानों पर लगाने से लाभ होता है।

4). कठगूलर – कठगूलर की छाल, बाकुची के बीज, चित्रक, गो मूत्र में पीसकर श्वेत कुष्ठ में लेप लगाने से लाभ होता है।

5). मूली के बीज – मूली के बीज भी सफेद दाग में हितकर है। लगभग 30 ग्राम बीज सिरका में घोलकर पेस्ट बनाकर सफेद दाग पर लगाते रहने से लाभ होता है।

6). काली मिर्च – एक अनुसंधान के अनुसार काली मिर्च में एक तत्व होता है- पीपराईन । यह काली मिर्च को तीक्ष्ण मसाले का स्वाद देता है। काली मिर्च के प्रयोग से त्वचा का रंग वापस लौटाने में मदद मिलती है।

7). पानी – श्वेत कुष्ठ रोगी के लिये रातभर तांबे के पात्र में रखा पानी प्रातः काल पीना फायदेमंद होता है।

8). बथुआ – रोज बथुआ की सब्जी खानी चाहिए, बथुआ उबाल कर उसके पानी से सफेद दाग को धोये, बथुआ का रस दो कप निकाल कर आधा कप तिल का तेल मिलाकर धीमी आंच पर पकायें जब सिर्फ तेल रह जाए तो उतार कर शीशी में भर कर रख लेते है। इसे सफेद दागों पर लगातार लगाते रहने से लाभ होता है।

9). लहसुन – लहसुन के रस में हरड़ को घिसकर लेप करे तथा साथ-साथ सेवन भी करने से लाभ होता है।

10). नीम – नीम की पत्ती, फूल, निंबोली, सुखाकर पीस लें प्रतिदिन लगभग 3 gm की मात्रा में लेने से लाभ होता है। सफेद दाग वाला व्यक्ति नीम के नीचे जितना रहेगा उतना ही फायदा होगा, नीम खायें, नीम लगायें, नीम के नीचे सोएं जिसका लाभ सफेद दाग वाले व्यक्ति को मिलता है।

11) सप्लीमेंट – सफेद दाग रोगी में विटामिन B-12 और फोलिक एसिड की कमी पाई जाती है। अतः इनके सप्लीमेंट लेना आवश्यक है। साथ ही कॉपर और झिंक तत्व के सप्लीमेंट भी लेना चाहिए।

आयुर्वेद में श्वेत कुष्ठ के उपचार में सबसे पहले पंचकर्म या संशोधन फिर उसके बाद शमन कर्म किया जाता है। संशोधन या पंचकर्म में सर्वप्रथम स्नेहन स्वेदन कराया जाता है फिर वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण किया जाता है। संशोधन के बाद संसर्जन कर्म या पथ्य आहार को देना चाहिए। यह सब प्रशिक्षित आयुर्वेद विशेषज्ञ से कराना चाहिए।

आयुर्वेद चिकित्सा की शुरुआत प्रायः लंघन या उपवास कराने के बाद होती है। श्वेत कुष्ठ की चिकित्सा लम्बे समय तक चल सकती है इसलिए आयुर्वेद चिकित्सक के निर्देशानुसार ही धैर्य पूर्वक चिकित्सा करानी चाहिए । पथ्यापथ्य का पूर्ण रुप से पालन करते हुए ही चिकित्सा करानी चाहिए।

श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) की आयुर्वेदिक दवा (Leucoderma Ayurvedic Medicine in Hindi)

safed daag ka ayurvedic dawa kya hai –

आयुर्वेदिक चिकित्सा के अंतर्गत श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) में निम्न औषधियों का प्रयोग चिकित्सक परामर्शानुसार प्रयोग करने पर लाभदायक है।

खदिर, आरोग्यवर्धिनी वटी, महामंजिष्ठा घन वटी, त्रिफलादि चूर्ण, पंचनिम्ब चूर्ण, महामंजिष्ठादि क्वाथ, खदिरारिष्ट, खदिर छाल का चूर्ण, रसमाणिक्य, शुद्ध गन्धक, स्वर्णमाक्षिक आदि का प्रयोग लाभदायक सिद्ध होता है।

श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) में खान-पान और परहेज (Leucoderma Diet in Hindi)

क्या खाएं (safed daag me kya khana chahiye)

  • गेंहू, चना, पुराने चावल, मूंग, अरहर, परवल, लौकी, पालक, नीम के पत्ते, पुनर्नवा के पत्ते, गाय का घी, मधु, मूली, सैंधव नमक, आँवला, करेला, काजू, मूंगफली, सरसों का तेल आदि का सेवन करना चाहिए।
  • इस रोग में उपवास लाभप्रद है ।अतः सामर्थ्य अनुसार उपवास करना चाहिए, उपवास के समय नींबू पानी का सेवन करना चाहिए तथा उसके बाद फलों का रस पीना चाहिए।

क्या न खाए (safed daag me kya kya nahi khana chahiye)

  • श्वेत कुष्ठ में लवण वर्जित आहार का प्रयोग किया जाता है।
  • नमक (सैंधव नमक का प्रयोग किया जाता है), विषम भोजन, देर से पचने वाला भोजन, मछली, कटहल, दही, भैंस का दूध, दूध से बने पदार्थ, मुख्यतः सफेद पदार्थ, मदिरा, गुड, गरम मसाला, उड़द की पीठी, तेज धूप, दिन में सोना तथा मैथुन का त्याग कर देना चाहिए।
  • चिकित्साकाल में स्नान तथा ब्रम्हचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए।
  • जिन कारणों के सेवन से श्वेत कुष्ठ होता है उन सबका त्याग कर देना चाहिए। सबसे जरुरी है कि इसकी चिकित्सा बड़े धैर्य के साथ करानी चाहिए।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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