बाबची के फायदे ,औषधीय गुण ,उपयोग और नुकसान

बाबची का सामान्य परिचय : Introduction of Bakuchi

बाबची के पौधे बरसात के दिनो में बहुत पैदा होते हैं। ये एक से लेकर ४ फीट तक ऊँचे होते हैं । इनकी डालियां सीधी होती हैं । इसके पत्ते ग्वार के पत्तों से मिलते जुलते होते हैं। इन पत्तों पर काले रङ्ग के कुछ छींटे पड़े हुये रहते हैं। इन पत्तों के कोनों में से १ से ३ इञ्च तक लम्बे डङ्खल निकलते हैं और उन डङ्खलों के ऊपर फीके और गहरे बैगनी रङ्ग के अनेकों छोटे -छोटे फूल आते हैं । इन फलों का आकार तुलसी की मंजरी की तरह दिखलाई देता है । इन फूलों में से बारीक और तोते के समान हरे रङ्ग की फलियां निकलती हैं जो पकने पर काली पड़ जाती हैं। इन फलियों में से काले रङ्ग के बीज निकलते हैं जिनको बाबची के बीज कहते हैं।

अलग-अलग भाषाओं में इसके नाम :

✦ संस्कृत – सोमराजि, कृष्णफला, कुष्ठनाशिनी, सोमवल्ली, कालमेषिका, चन्द्रलेखा, सुप्रभा, कुष्ठ हंब्री, कांबोजि, पूतिगन्धा, चन्द्र राजी इत्यादि
✦ हिन्दी – बाबची, बकुची
✦ बंगाल – बावची, हकुच, लता कस्तूरी
✦ बम्बई – बाबची
✦ गुजराती – बाबची
✦ मराठी – बाबची
✦ पंजाब – बाबची
✦ तामील – करपोकृषी, करपूव्हरीशी
✦ तेलगू – भवंजी, कालागिजा
✦ उर्दू – बाबची
✦लेटिन – Psoralea Corlifolia ( सोरेलिया कीरिलीफोलिया )।

आयुर्वेदिक मतानुसार बाबची के औषधीय गुण :

☛ आयुर्वेदिक मत से बाबची मधुर, कड़वी, पचने में चरपरी होती है ।
☛ यह धातु परिवर्तक, कब्जियत को दूर करने वाली है ।
☛ यह शीतक, रुचिकारक, सारक, कफ और रक्तपित्त को नाश करने वाली है ।
☛ यह रूखी, हृदय के लिये हितकारी तथा श्वास, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर और कृमियों का विनाश करने वाली होती है।
☛ बाबची का फल पित्त जनक, कुष्ठनाशक, कफ और वात को दूर करने वाला है ।
☛ बाबची का फल कड़वा, केशों को उत्तम करने वाला, कांतिवर्धक तथा वमन नाशक होता है ।
☛ इसका फल श्वास, मूत्रकृच्छ्र, बवासीर, खांसी, सूजन, आम और पांडुरोग का नाश करने वाला होता है।
☛ बाबची की एक दूसरी जाति और होती है जिसको संस्कृत में श्वित्रारि कहते हैं । यह जाति कुष्ठ, त्रिदोष, रक्त विकार, वातरक्त और श्वेत कुष्ठ को दूर करती है ।
☛ बाबची की जड़ दांतों की सड़न को दूर करती है।
☛ इसके पत्ते अतिसार को रोकने में उपयोगी है।
☛ इसके फल कड़वे, मूत्रल, पित्त को पैदा करने वाले है।
☛ इसके फल गलित कुष्ठ को दूर करने वाले तथा चर्मरोग, कफ, वात, वमन, श्वास, कुष्ठ, बवासीर ब्रोकाइटीज, सूजन और पाण्डु रोग में लाभदायक है।
☛ इसके बीज कड़वे, ज्वर और तृषा को मिटाने वाले, धातु परिवर्तक, मृदुविरेचक, कृमिनाशक और ज्वरनाशक होते हैं।
☛ इसके बीज कफ और रक्तपित्त को दूर करते हैं और हृदयरोग, दमा, श्वेत कुष्ठ तथा अनैच्छिक वीर्यस्राव में लाभदायक है।
☛ इसके बीज जख्म, चर्म रोग और गीली खुजलीमें ये फायदा पहुंचाते हैं ।
☛ इनका तेल हाथी पांव में उपयोगी होता है।

यूनानी मत के अनुसार बाबची के औषधीय गुण :

☛ यूनानी मत से यह दूसरे दर्जे में गरम और खुश्क होती है।
☛ वायु को बिखेरती है। दिल और मेदे को कूबत देती है ।
☛ बावची भूख पैदा करती है ।
☛ यह आमाशय के कीड़ों को नष्ट करती है ।
☛ श्वेत कुष्ठ, स्याह कुष्ठ, खुजली, कोढ़ और रक्त के उपद्रव को मिटाती है। इन बीमारियों में इसका खाना और लगाना दोनों मुफीद है ।
☛ बावची के बीज गाढ़े कफ को पतला करते हैं ।
☛ बावची के बीज खांसी को मिटाते हैं ।
☛बावची के बीज मसूड़ों को मजबूत करते हैं ।
☛ इसके बीज प्राणवायु को उत्तेजित करते हैं ।

बाबची के फायदे और उपयोग : Bakuchi Benefits and Uses

१- श्वेत कुष्ठ में बाबची के फायदे –

✦ बाबची के बीज भारतवर्ष में बहुत प्राचीन काल से श्वेत कुष्ठ की एक प्रामाणिक औषधि की तरह काम में लिये जाते हैं। महर्षि चरक अपनी चरकसंहिता में लिखते हैं कि चार भाग बावची के बीज और १ भाग तबकिया हड़ताल को लेकर गाय के मूत्र में पीसकर सफेद कुष्ठ पर लेप करने से यह रोग नष्ट हो जाता है । आगे चलकर यह महर्षि लिखते हैं।

तीव्रण कुष्ठेन पुरीतमर्ती, यः सोमदाजी नियमेन खादेत् ।
संवत्सरं कृष्णतिल द्वितीयां स सोमराजी वपुषातिशेते ।।
अर्थात् तीव्र कुष्ठ रोग से जिसका शरीर खराब हो गया वह मनुष्य यदि एक वर्षतक बावची और काले तिल को मिलाकर प्रतिदिन सेवन करे तो उसका रोग नष्ट होकर उसका शरीर चन्द्रमा की कांति के समान शोभायमान हो जाता है।

✦ महर्षि वाग्भट लिखते हैं कि बाबची के बीजों के ऊपर के छिलके निकाल कर उनकी मगज का चूर्ण करके उस चूर्ण को दूध में डालकर उस दूध का दही जमाना चाहिए। उस दही को बिलोकर उसमें से जो मक्खन निकले, उस मक्खन को शहद में मिलाकर चाट लेना चाहिये और उसके ऊपर उसी दही से निकले हुये मद्रु को पी जाना चाहिये ।

कुष्ठ के रोग से जिसका शरीर बिगड़ गया हो और हाथ पैर की उगलियां तथा नाक का भाग भी गलकर गिर पड़ा हो । ऐसे असाध्य मनुष्य भी अगर इस प्रयोग को दीर्घकाल तक सेवन करें तो जिस प्रकार वृक्ष की कटी हुई डाली के स्थान पर फिर से नवपल्लव युक्त दूसरी डाली फूट जाती है उसी प्रकार उसके शरीर का पुनरुद्धार हो जाता है।

✦ बंगसेन लिखते हैं कि अगर खैर और आंवले के काढ़े के साथ बाबची के बीजों का प्रतिदिन सेवन किया जावे तो शङ्क और कुंद के पुष्प के समान फैला हुआ श्वेत कुष्ठ भी आराम हो जाता है।

✦ इन प्राचीन आप्त वाक्यों के साथ जब हम इस सम्बन्ध में की हुई नई खोजों का मिलान करते हैं तो काफी साम्य नजर आता है।
रायबहादुर कन्हैयालाल बावची के बीजों का पाताल यन्त्र के द्वारा निकाला हुआ ओलियोरेजिन्स एक्स ट्रैक्ट को मक्खन के साथ मिलाकर श्वेत कुष्ठ पर लगाने की जोरदार सिफारिश करते हैं। उनका कथन है कि इस औषधि को थोड़े दिन तक लगाने से कुष्ठ के सफेद चढ़े वाला भाग लाल रङ्ग में बदलता हुआ दिखाई देता है और उसमें कुछ वेदना तथा जलन भी मालूम होती है। कभी -कभी उसमें छाले उठे हुए भी दिखलाई देते हैं। इन छालों को स्पर्श न करते हुए अगर इनको ज्यों का त्यों रहने दिया जाय तो अपने आप जल्दी सुख जाते हैं और उनकी जगह एक काला दाग पड़ जात, है । यह काला दाग धीरे धीरे बढ़ता जाता है और तमाम सफेद दाग की जगह घेर लेता है और सफेद दाग काले दाग के रूप में परिणत हो जाता है। धीरे धीरे काला दाग भी मिटकर चपड़े के स्वाभाविक रूप में मिल जाता है।

✦ बावची के बीजों को हलदी और मूली के बीजों के साथ पीस कर इतवार की रात को जमाये हुए गाय के दही के तोड़ (खट्टा पानी ) में मिलाकर सफेद कुष्ठ के दाग पर मालिश करें तो बहुत लाभ होता है।

✦ गेरू पाव भर, बावची आधा पाव, आमलासार गंधक एक पाव इन सब चीजों को बासी पानी के साथ ६ प्रहर तक खरल करें, फिर गोलियां बांधकर दिन को धूप में और रात को खुली छत पर सुखावें । जरूरत के वक्त इन गोलियों को पानी में पीसकर सफेद दागों पर लगाने से बहुत लाभ होता है । इसके साथ ही आधा सेर बावची और आधा पाव नमक को पीसकर इस चूर्ण में से हथेली भर चूर्ण रोज खा लिया करे और पथ्य में सिर्फ चने की रोटी खाने तो श्वेत कुष्ठ में बहुत लाभ होता है ।

✦ बावची के बीजों को गोमूत्र में इस प्रकार भिगोवे कि गोमत्र उससे ४ अंगुल ऊपर रहे । जब बीज खूब अच्छी तरह से तर हो जाये तब उनको निकालकर छाया में सुखाकर जितने बीज हो उनसे आधा जीरा मिलाकर पानी के साथ पीस कर अरीठे के बराबर गोलियां बना लें। इनमें से एक २ गोली रोज खाने से और पथ्य के साथ रहने से सफेद दागों में बहुत लाभ होता है ।

गोमूत्र में भिगोते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि बीजों की कोंपलें न फूटने पावें।

२-बदगांठ के उपचार में बाबची के लाभ –

बावची के बीजों को पानी में पीसकर लस्सी की तरह पका कर बांधने से बदगांठ एक दिन में बैठ जाती है ।

( और पढ़े –गाँठ कैसी भी हों यह रहे 9 रामबाण घरेलु उपाय )

३- बेहोशी और मूर्छा में इसके लाभ –

राबर्टस के मतानुसार सीलोन में सर्पदंश के केसों में इसके बीजों को पीसकर पानी के साथ उसका द्रव बनाकर बेहोशी और मूर्छा में नाक के अन्दर टपकाया जाता है और इसके बीजों का चूर्ण बनाकर मुह के द्वारा खिलाया जाता है।

( और पढ़े – बेहोशी दूर करने के उपाय )

४- पौष्टिक औषधि बाबची –

चीन और मलाया में इसके बीज पौष्टिक और कामोद्दीपक माने जाते हैं और यह कुछ विशेष प्रकार के चर्म रोगों के उपयोग में लिये जाते हैं ।

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५- उदर शूल में इसके लाभ –

इण्डोचायना में इसका फल उदर शूल, अनैच्छिक वीर्यस्राव और कुछ विशिष्ट चर्म रोगों के काम में लिया जाता है।

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६- संधिवात में बाबची के लाभ –

अनाम में इसके बीजों का अलकोहल में तैयार किया हुआ द्रव संधिवात और स्त्रियों के रोगों में काम में लिया जाता है।

( और पढ़े – वात नाशक आयुर्वेदिक उपचार)

७- मज्जा तन्तुओं के लिये उत्तेजक और पौष्टिक –

अमेरिका में इसके बीजों से तैयार की हुई अनेक प्रकार की बनावटें मज्जा तन्तुओं के लिये उत्तेजक और पौष्टिक समझी जाती हैं । वहां पर गलित कुष्ठ के रोगियों पर भी आंशिक सफलता के साथ इसके प्रयोग किये गये हैं।

८- ओलियोरेजिन रोग में इसके लाभ –

कोमान का कथन है कि इसके बीजों का चूर्ण श्वेत कुष्ठ के रोगियों को खिलाया गया और इसके बीजों का ओलियोरेजिन रोगग्रस्त पर लगाया गया। कुछ दिनों के प्रयोग से श्वेत कुष्ठ के दाग लाल रङ्ग में परिवलित होते दिखाई देने लगे, मगर इस औषधि की जलन और वेदना इतनी अधिक थी कि रोगियों ने इस प्रकार के इलाज में रहना अस्वीकार कर दिया ।

९- दाद रोग में इसके लाभ –

गवार के बीजों के साथ बाबची के बीजों का चूर्ण बनाकर उसको नींबू के रस में मिलाकर दाद के ऊपर प्रयोग किया गया और उसका परिणाम बहुत संतोषजनक रहा ।

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सेवन की मात्रा :

बावची के बीजों के चूर्ण की ३ ग्राम , काढ़े को १२ ग्राम ।

बाबची से निर्मित आयुर्वेदिक दवा :

माप  :-
1 तोला = 12 ग्राम
1 सेर = 932 ग्राम

1- श्वेत कुष्ठ हर लेप-

बाबची के बीज ४ तोला,हरताल ४ तोला , सफेद चिरमी के बोज ४ तोला, चित्रक की जड़ की ताजी छाल ४ तोला, मेंसिल २ तोला और काला भांगरा २ तोला।

लाभ- इन सबको लेकर बारीक पीसकर कुछ दिनों तक गोमूत्र में खरल करना चाहिये । फिर सफेद कुष्ठ के दागों को कुछ रगड़ कर उन पर इस लेप को लगाने से लाभ होता है।

2- श्वेत कुष्ठ नाशक तेल-

बावची के बीज २५ तोला, पवांर के बीज ५ तोला, सफेद चिरमी के बीज २ तोला, काली मिरची २ तोला, में सिल ३ तोला, हरताल ४ तोला और चित्रक की जड़ की ताजी छाल २ तोला ।

लाभ– इन सब चीजों को कूटकर आतशी शीशी में भरकर बालुका गर्भ यन्त्र से मंदाग्नि के द्वारा तेल निकालना चाहिये । इस तेल को नियमित रूप से लगाने से श्वेत कुष्ठ, दाद, छाजन इत्यादि रोग नष्ट होते हैं ।

3- बृहत् सोमराजि तेल-

बावची के बीज ५ सेर, पवांर के बीज ५ सेर ।

इन दोनों को कूटकर ४० सेर पानी के साथ उबालना चाहिये। जब १० सेर(1 सेर = 932 ग्राम ) पानी शेष रह जाय तब उसको छानकर उस काढ़े में २५६ तोला गोमूत्र और ६४ तोला सरसों का तेल मिलाकर नीचे लिखी औषधियों की लुग्दी उसमें रखकर मंदाग्नि से औटाना चाहिये । जब पानी का भाग जलकर सिर्फ तेल का भाग शेष रह जाय तब उसको उतार कर छान लेना चाहिये ।

लुग्दी की औषधियां- चित्रक की जड़, कलिहारी की जड़, सोंठ, हलदी, करंज के बीज, हरताल, मेंसिल अनन्त मूल, आकड़े की जड़, कनेर की जड़, सप्तपर्ण की छाल, गाय का गोबर, खैर सार, नीम के पत्ते, काली मिर्च और कसोंदी के बीज । इन सब चीजों को एक २ तोला लेकर पानी के साथ खरल खरके इनकी लुगदी बनाकर उसमें रख देना चाहिये ।

लाभ- इस तेल का मालिश करने से श्वेत कुष्ठ, खाज, चित्रकुष्ठ, इत्यादि अनेक रोग दूर होते हैं।

रोगी के शरीर का अगर बहुत हिस्सा सफेद हो गया हो तो सारे भाग पर एक ही साथ दवा नहीं लगाना चाहिये । क्योंकि बावची के बीजों से बनाई हुई औषधियां बहुत प्रदाहक होती हैं और इनको लगाने से बहुत जलन होती है। इसलिये थोड़े-थोड़े भाग पर ऐसो औषधियों को लगाना चाहिये । जब वह भाग अच्छा हो जाय तब दूसरें भाग पर औषधि लगाना चाहिये ।

बावची के बीज कुछ अंशों में मिलाने का स्वभाव रखते हैं । इसलिये नाजुक प्रकृति वाले रोगियों को खिलाने से या उनके रोगग्रस्त अङ्ग पर लगाने से रोगग्रस्त अङ्ग पर जलन पैदा होकर छोटी २ फुन्सियां पैदा हो जाती हैं । इन फुन्सियों के फूटने और उनके अच्छा होने के साथ ही चमड़ी का रङ्ग बदल जाता है। अगर किसी व्यक्ति को इसकी जलन सहन न हो तो तिल और खोपर के पानी के साथ पीस कर लेप वाली जगह पर लगाने से और तिल तथा खोपरे को खिलाने से उपद्रव की शान्ति हो जाती है।

बाबची के नुकसान :

1- बाबची लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
2- इसका अधिक सेवन पित्त को बढ़ाता है और बुखार में नुकसान पहुंचाता है। कोई – कोई कहते हैं कि बाबची आंख की रोशनी को कम करती है। धातु को सुखाती है और खांसी में नुकसान पहुंचाती है।

दर्पनाशक- शिकंजबीन और दूसरी खटाइयां ।