भगवान वामन — श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ जी
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भगवान वामन नामक पौराणिक उपन्यास सुदर्शन सिंह चक्र की लिखी है। शीर्षक-पृष्ठ पर पौराणिक उपन्यास और भगवान वामन बड़े अक्षरों में अंकित है, उसके नीचे लेखक और सुदर्शनसिंह चक्र लिखा है। प्रकाशक श्रीकृष्ण-जन्मस्थान वैदा-संस्थान, मथुरा-२८१००१ है। प्रथम संस्करण विजयदशमी, श्री २०५० वि० / १६ अक्टूबर १९९३ को प्रकाशित हुआ और मूल्य 12 रुपये 50 पैसे रखा गया। मुद्रक शून्य देव, बहरा, दिल्ली रोड है। पुस्तक लगभग दो सौ चवालीस पृष्ठों की है।
आवरण पर एक मूर्तिकला-शैली का चित्र बना है, जिसमें वामन खड़े दिखाए गए हैं — माथे पर लम्बा ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, गले और शरीर पर यज्ञोपवीत की कई मालाएँ, कमर पर जनेऊ, एक हाथ में जलपात्र और दूसरा हाथ आशीर्वाद-मुद्रा में ऊपर उठा हुआ। पीछे एक बड़ा गोलाकार चक्र-सी आकृति बनी है। पुस्तक में छबीस अध्याय हैं, जिनमें अपनी बात, उपक्रम, बलि विधि जैसे अध्यायों के बाद क्रमशः देवताओं की चर्चा, धूलि-नागराज, देवराजा इन्द्र और अंत में एक हरी जैसे अध्याय आते हैं। प्रकाशन-विवरण के बाद संस्कृतिक कहानियाँ नामक पृष्ठ दिया गया है, जिसमें पाँच उपन्यासों की सूची और उनके मूल्य अंकित हैं। यह उपन्यास पौराणिक कथा को कथा-शैली में आगे बढ़ाता हुआ चलता है।
पौराणिक कथाओं को उपन्यास-शैली में सुनाने की यह परंपरा हिन्दी साहित्य में बहुत पुरानी है, और उसमें धार्मिक कथा के साथ-साथ सामाजिक और मानवीय दृष्टि भी आ जाती है। कथा-वर्णन में सीधे-सादे प्रसंग हैं, जिन्हें सरल हिन्दी में सहज भाषा में पढ़ा जा सकता है। श्रीकृष्ण-जन्मस्थान वैदा-संस्थान से प्रकाशित यह पुस्तक कालक्रम में उपलब्ध होने के कारण शहीरों में भी सरलता से मिल जाती है। पढ़ते समय ध्यान रखें कि यह साहित्यिक रूपक है — इसे अनुयाथियों के आचरण का आधार न मानें, और केवल साहित्य-अध्ययन के उद्देश्य से ही इसे पढ़ा जाना चाहिए।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- योगासन तथा उनकी विधि
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