भजन संग्रह भाग-2 | Bhajan Sangrah Part-2
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भजन संग्रह का दूसरा भाग श्रीविजयी हरिजी द्वारा संकलित और संपादित है, जो मुद्रक तथा प्रकाशक धनऱ्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा छपा है। संग्रह में लगभग 1500 भजन हैं, जिनमें 1948, 1958, 1959, 1991, 1992 और 1993 से संबंधित अंक स्पष्ट रूप से अंकित हैं। पृष्ठभूमि में बताया गया है कि यह भक्त-पंथी और दुर्गा-भक्त साधुओं के लिए संकलित किया गया संग्रह है।
पुस्तक की प्राक्कथन में भक्ति-मार्ग का महत्त्व बताया गया है। स्पष्ट कहा गया है कि शुद्ध, अनन्य और हृदय-स्पर्शी भक्ति ही साधन को शुद्ध करती है, संसार-बन्धन से मुक्त करती है और पवित्र आत्मा को दर्ज करा देती है। संकलक ने यह भी इच्छा व्यक्त की है कि जिन पाठकों ने इन भजनों का सदुपयोग किया हो, उनका अनुभव पुस्तक में दर्ज कराया जाए।
यह किताब उन भक्तों के लिए है जो श्रीकृष्ण, दुर्गा और अन्य भगवानों के भजन नित्य पढ़ना या गाना पसंद करते हैं। गीताप्रेस की यह भजन श्रृंखला लंबे समय से भक्ति-साहित्य पाठकों की माँग पर लगातार छपती रही है। छपाई पुरानी होने के कारण चित्र-वर्णन और जोड़-तिर्याकों में थोड़ी भिन्नता दिख सकती है, परंतु भजन-संग्रह के रूप में यह पुस्तक अपने विषय में पूर्ण है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- भजनों तथा पदों का संग्रह (भाग 2)
- हिंदी अर्थ सहित
- कीर्तन करने की विधि
- भक्ति तथा नाम-जप
पुस्तक की मुख्य बातें
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