ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास (भाग 1) – Braj Ka Sanskritik Itihas
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आवरण-पृष्ठ के बाद शीर्षक-पृष्ठ पर पुस्तक का नाम ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास अंकित है और उसके नीचे प्रथम भाग होने का उल्लेख मिलता है। साथ ही दो खण्डों के नाम भी दिए गए हैं, पहला ब्रज सांस्कृतिकी की भूमिका और दूसरा ब्रज का इतिहास। रचयिता के रूप में प्रभुदत्त मौल का नाम आया है और प्रस्तावना ढेढक के रूप में डॉ० वामुदेवशरण ध्रुवजी का नाम मुद्रित है। प्रकाशन भाषा मण्डल, मधुरा का है।
प्रकाशन-विवरण में सन् पंद्रह से पहले और पंद्रह से पन्द्रह वर्ष बाद की दो तिथियाँ अंकित हैं, साथ ही मूल मूल्य बत्तीस रुपये भी दिया गया है और पुनर्मुद्रण सम्बन्ध राजस्थान पत्रिका से जोड़ा गया है। इसके बाद प्राक्कथन नामक अनुभाग आता है, जिसमें लेखक और समर्पक दोनों ने ब्रज की सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा की है और भारतीय भाषाओं, विशेषकर ब्रजभाषा के संरक्षण पर बात कही है। पाठ में बाद में ब्रज के इतिहास का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें मध्यकालीन शासकों और विदेशी आक्रमणकारियों का उल्लेख तथा इतिहासकारों के उद्धरण भी आए हैं।
यह पुस्तक ब्रज-क्षेत्र के साहित्यिक, धार्मिक और सामाजिक इतिहास पर एक विस्तृत अध्ययन है जिसमें स्थानीय परंपराओं और उनके विकास का भी उल्लेख मिलता है। सांस्कृतिक इतिहास और ब्रजली के अध्ययन के लिए यह पाठ उपयोगी माना जाता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
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