दश महाविद्या तन्त्रसार – Dash Mahavidya Tantra Saar
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शीर्षक-पृष्ठ पर पुस्तक का नाम दश महाविद्या तन्त्रसार अंकित है। लेखक एवं संरचक के रूप में योगीराज यशपाल भारती का नाम दिया गया है। प्रकाशन राणधीर प्रकाशन, हरिद्वार से हुआ है और विक्रेता के रूप में राणधीर बुक सेंटर, रेलवे रोड, हरिद्वार बताया गया है। पृष्ठ पर संस्करण सन् दो हजार आठ अंकित है, मुद्रक राजा ओंकारेश प्रिंटर्स, दिल्ली है और अन्तरराष्ट्रीय पुस्तक-क्रमांक भी दिया गया है। आवरण-पृष्ठ पर महाकाली, योगिनी, वास, सिंह और भूधर के चित्र बने हुए हैं।
शीर्षक-पृष्ठ पर ब्रह्म-विज्ञान-कुल, प्रजापति और पद्मिनी से लिए गए गीता के उद्धरण दिए गए हैं। पाठ में दस महाविद्याओं की उपासना-विधियाँ क्रम से दी गई हैं, जिनमें शाका गजा के नाम से प्रसिद्ध दस महाविद्याएँ प्रमुख हैं। पाठकों से वाले पृष्ठ में कालीमण्डल की साधनाओं का भी वर्णन है, जिसमें काली, नाग, भुवनेश्वरी और हिमवती आते हैं। इसके बाद श्रीकुञ्ज की उपासना दी गई है, जिसमें गोडगी, बाला, मंगला, करणी, भुवनेश्वरी और मालिनी का नाम आता है। समापन में योगराज भस्कर का हस्ताक्षर-मय उल्लेख मिलता है।
दश महाविद्या तन्त्रसार ऐसी ग्रन्थों में गिना जाता है जिनमें दस महाविद्याओं की साधना को एक साथ संकलित करने का प्रयास किया गया है और इसलिए यह परंपरागत तान्त्रिक साहित्य के अध्ययन के लिए उपयोगी माना जाता है। पाठ का स्वरूप मुख्यतः धार्मिक और साधनात्मक है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यहाँ वर्णित मंत्र और अनुष्ठान आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं हैं और इनका कोई चिकित्सकीय दावा नहीं है। किसी भी तांत्रिक या साधनात्मक अभ्यास से पहले योग्य गुरु से मार्गदर्शन लें। शारीरिक या मानसिक समस्या होने पर चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें और किसी तांत्रिक के कहने पर कोई उपाय आरंभ न करें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- दस महाविद्याओं का तंत्र
- साधना तथा पूजा-विधि
- मंत्र तथा यंत्र
- नियम तथा सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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