मायामृत का उद्धार और मूलशंकर – Mayamrit Ka Uddhar
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मायामृत का उद्धार और मूलशंकर नामक ग्रंथ का शीर्षक-पृष्ठ "मूल संस्कृत व हिन्दी" यानी दोनों भाषाओं में छपा है। आवरण पर एक चित्र बना है, जिसमें पंचमान रावण के सिर पंक्ति में लगे हुए दिखाए गए हैं, एक हाथ में कटा हुआ शिशु लिए और सामने जलती आग — यही कथा का सार है। पुस्तक में पारो-उत्तर के रूप में प्रश्न और उत्तर दिए गए हैं। अंत में संवत् की गणना के साथ एक भविष्यवाणि का सार दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि मूलशंकर का जन्म काशी के गोकुलनगर में होगा।
पुस्तक का आरंभ उस कथन से होता है कि परमपिता परमेश्वर की अशीम कृपा से यह ग्रंथ लेखक तक पहुँचा, और यह उस समय की बात है जब गोस्वामी तुलसीदास प्रभु के ध्यान में मनन चल रहा था। लेखक कहते हैं कि प्रभु की कृपा से उन्हें मायामृत की कथा स्पष्ट हुई और आदेश मिला कि कलयुग में होने वाले मूलशंकर के प्रभाव से बचने के लिए इस ग्रंथ की रचना की जाए। इसके बाद पाठ बराबर आगे बढ़ता है — एक देवता की आवाज़ और उनके सामने खड़े प्रश्नकर्ता "पार्थ" के बीच बातचीत चलती है, जिसमें साधना, उद्धार और देवताओं के वचन के बारे में बातें कही गई हैं।
इस छोटी पुस्तक में संस्कृत श्लोक और उनका हिन्दी अनुवाद साथ-साथ दिया गया है, इसलिए श्लोकों का अर्थ सरल भाषा में समझ आता है। ध्यान दें कि स्वयं ग्रन्थ में बताया गया है कि इसमें पाँच हज़ार से अधिक श्लोक हैं, जबकि इस पीडीएफ़ में केवल नौ पृष्ठ का भाग दिया गया है — यानी यह पूरी पुस्तक का एक छोटा अंश है, पूरा ग्रन्थ नहीं। यह पुस्तक केवल साहित्य और पौराणिक जिज्ञासा के लिए उपलब्ध कराई गई है; किसी भविष्यवाणी को सच न मानें और इसे किसी धर्म-साधना का निर्देश न समझें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
- मोबाइल व कंप्यूटर पर पढ़ने योग्य PDF
पुस्तक की मुख्य बातें
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