गरुड़ पुराण – Garuda Puran
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गरुड़ पुराण भागवत पुराण के अंतर्गत आने वाला प्राचीन संस्कृत महापुराण है, जिसका पूरा नाम गरुड़ महापुराण अथवा महामृत्युंजयापरं पुराण माना जाता है। ग्रंथ की उत्पत्ति के किए अनुसार महामृत्युंजय नामक ऋषि की मृत्यु के बाद गरुड़ जी ने भगवान विष्णु से मृत्यु के भय से मुक्ति का उपाय पूछा, और उन्हीं के उपदेश से यह ग्रंथ रचा गया। प्रस्तुत संस्करण पौराणिक विज्ञान मंडल, वाराणसी से प्रकाशित है।
गरुड़ पुराण का मुख्य केंद्र भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के मध्य हुई संवाद-कथा है। प्रथम खंड में विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन मिलता है। द्वितीय खंड में मरण के बाद की अवस्था तथा यमलोक-नरक-स्वर्ग की व्यवस्था का विस्तृत वर्णन है। तृतीय खंड में धर्म, कर्म और परलोक-गति से संबंधित नैतिक तथा आध्यात्मिक उपदेश दिए गए हैं।
यह पुराण धर्म-ग्रंथों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जीवन के प्रति दृष्टिकोण, मृत्यु-भय से मुक्ति तथा कर्म के फल से संबंधित सिद्धांतों को जानने के लिए आज भी अध्ययन किया जाता है। अध्यात्म-अभ्यासी, सांस्कृतिक जिज्ञासु तथा धर्मशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए यह पुराण अत्यंत उपयोगी साहित्य है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- सृष्टि-रचना तथा विष्णु-भक्ति का वर्णन
- मृत्यु के बाद जीव की गति, प्रेत-योनि तथा नरक-लोक
- श्राद्ध तथा पितृ-कर्म का महत्व
- धर्म, कर्म तथा मोक्ष के उपदेश
पुस्तक की मुख्य बातें
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