गौमाता पंचगव्य चिकित्सा | Gaumata Panchgavya Chikitsa
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शीर्षक-पृष्ठ पर पुस्तक का नाम गोमाता पंचगव्य चिकित्सा अंकित है और उसके नीचे कोष्ठक में बताया गया है कि यह पाठ गोवर, गोमूत्र, गोचर, गोमय और गुप्त आधारित त्वच-रोगों की विशेष और योग-विधि से संबंधित है। लेखक राजीव दीक्षित का नाम आवरण और शीर्षक-पृष्ठ दोनों पर दिया गया है। प्रकाशक स्वदेशी प्रकाशन है और तेजपुरा, उत्तर प्रदेश का पता मुद्रित है। प्रथम संस्करण का वर्ष बारह अंकित है और उसके साथ छपी प्रतियों की संख्या तथा मूल्य भी दिया गया है। आवरण के नीचे यह भी लिखा है कि यह पुस्तक लेखक की पुस्तक-संग्रह का आठवाँ भाग है।
पुस्तक का आरंभ समर्पण-पृष्ठ से होता है जिसमें इसे एक विशेष संत और उनके अनुयायी समूह को अर्पित किया गया है और उनके आदर्श सेवा-कार्य का वर्णन है। इसके बाद पंचगव्य अनुभव शीर्षक का अध्याय आता है जिसमें गोवर, गोमूत्र, गोचर और गोमय के उपयोग का वर्णन है। पाठ में अनेक श्लोक और उद्धरण दिए गए हैं, जिनमें गोमूत्र के गुणों और पंचकर्म में उसके उपयोग पर बल दिया गया है। साथ ही त्वच-रोग, बाल-रोग और अन्य आयुर्वेदिक उपचारों से जुड़े अनुभव भी दिए गए हैं और अंत में लेखक ने अपनी अनुभव-यात्रा का सारांश प्रस्तुत किया है।
यह पुस्तक गौ-पय और पंचगव्य पर आधारित आयुर्वेदिक उपचार-विधियों पर केंद्रित है और समाज में गौ-सेवा को बढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई है। आयुर्वेद के इतिहास और लोक-चिकित्सा के अध्ययन के लिए यह पाठ उपयोगी माना जाता है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यहाँ दी गई चिकित्सा-विधियां और औषधियां शास्त्रीय हैं, आधुनिक चिकित्सा से प्रमाणित नहीं हैं और इनका कोई चिकित्सकीय दावा नहीं है। किसी भी बीमारी के लिए केवल इस पुस्तक के भरोसे पर निर्भर न रहें, बल्कि योग्य चिकित्सक से परामर्श लें और गंभीर स्थिति में आधुनिक चिकित्सक की सलाह को पहले लें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- पंचगव्य (गो-द्रव्य) की चिकित्सा
- रोगों में उनका उपयोग
- विधि तथा मात्रा
- सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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