गीता मकरन्द (दूसरा भाग) – Gita Makarand
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गीता मकरन्द भगवद्गीता पर आधारित आत्म-कथा ग्रंथ है और यह पुस्तक उसका दूसरा भाग है। शीर्षक-पृष्ठ पर शीर्षक गीता मकरन्द बड़े अक्षरों में और नीचे भाग - २ अंकित है। ग्रंथ के प्रवर्तक के रूप में श्री श्री श्री विद्याप्रकाशनंद गिरि स्वामीजी का नाम दिया गया है। हिन्दी रूपांतरकर्ता श्री वेमूरी राधाकृष्णमूर्ति हैं। पुस्तक लगभग दो सौ सत्तर पृष्ठ की है।
पुस्तक में श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद को आत्म-कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मूल महाभारत के संवाद को छोड़कर लेखक ने उसे ऐसे ढंग से सजाया है जिसमें शिष्य और गुरु का अनुभव स्पष्ट हो। गीता के श्लोकों की व्याख्या भी इसी शैली में दी गई है। पहले भाग में जो कथा आरंभ हुई थी, उसका यह भाग आगे बढ़ाता है। हिन्दी रूपांतरण होने के कारण पाठ संस्कृत ज्ञान के बिना भी समझ आ जाता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो गीता को सूत्र-बद्ध श्लोकों के रूप में नहीं बल्कि कहानी और संवाद के रूप में पढ़ना चाहते हैं। श्रीकृष्ण के उपदेश जीवन-अनुभव के रूप में सामने आते हैं, इसलिए पाठक को सीधे जुड़ाव महसूस होता है। हिन्दी रूपांतरण में मूल भाव बरकरार रखा गया है। श्रीकृष्ण-सम्प्रदाय के पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। गीता-अध्ययन करने वालों के लिए यह पुस्तक परंपरागत टीकाओं के साथ एक अलग और आधुनिक दृष्टि देती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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