Jeena Ki Kala By Shri Paramhans Yoganand Ji
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यह पुस्तक जीने की कला नाम से प्रकाशित हुई है और अंग्रेज़ी उपशीर्षक The Art of Living दिया गया है। लेखक श्री श्री परमहंस योगानन्द हैं और पृष्ठ पर उनका यह वाक्य छपा है कि यह सबसे सुन्दर है ईश्वर को देखने की चाही तस्वीर चसक से देखने की शैली है। प्रकाशक Yogoda Satsang Society of India है। पैमाना लगभग 59 पृष्ठ का है।
प्रस्तावना में आत्मा की पृथ्व और अन्तर्मुख विवेक की भाव की प्रवृत्ति बताई गई है, और यह स्पष्ट किया गया है कि हमारा शरीर इस समय बुद्धि, कर्म और अहंकार की अवस्था में है। इसके बाद श्री श्री परमहंस योगानन्द की आत्मकथा आती है, जिसमें आत्मा की तीन ऐश्वर्यपूर्ण अवस्थाओं का वर्णन है।
विषय-सूची में जीने की कला, अहंकार वैश्वलीप करें, दूसरा साधना कैसे करें, समाज नहीं बनता तो और बच्चे की फोटो बनाम जैसे पाँच अध्याय दिए गए हैं। यह पुस्तक आध्यात्मिक जीवन-शैली पर आधारित आत्म-ज्ञान और साधना पर केंद्रित है, इसलिए आत्म-चिंतन और ध्यान में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- जीना सीखने की कला
- सुख-दुःख तथा संतुलन
- ध्यान तथा जीवन-शैली
- प्रेरक निर्देश
पुस्तक की मुख्य बातें
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