लिंग पुराण – Ling Puran
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श्री लिंग पुराण नामक ग्रन्थ के शीर्षक-पृष्ठ पर 'सती तथा नैपीय ऋषियों का संवाद' शीर्षक डाला गया है और पाठ का आरम्भ नाटद जी द्वारा भगवान शंकर के पूजन से होता है। आरंभ में ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के शिव के पास आकर प्रश्न पूछने का वर्णन है, जिसमें महिला-सती को लेकर विवाद का प्रसंग भी आता है। हर पृष्ठ के शीर्षक-पाठ में '॥ श्री लिंग पुराण ॥' छपा है और इस खंड के मुद्रित पृष्ठ लगभग 11 से आरंभ होते हैं, यानी यह बड़े ग्रन्थ का एक अंश है।
इस खंड में भगवान शिव के लीला-वर्णन, शिव तथा अन्य देवताओं के संवाद और शिव के विभिन्न रूपों का परिचय मिलता है। महामृत्युंजय मंत्र के बारे में एक विशिष्ट अध्याय आया है, जिसमें बताया गया है कि इस मंत्र का वर्णन अन्य ग्रन्थों में नहीं मिलता और इसी कारण इसे संकलित ब्रह्मांड का सर्वाधिक आदि पंक्तिदर्श माना गया है। साथ ही लिंग की पूजा की विधि, स्थान, शीर्त और मूर्ति के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।
शिव-पुराण के इस अंश में भक्ति-मार्ग के साथ-साथ लिंग-पूजा की दीक्षा-विधि भी दी गई है, और इसे शिव-पूजा को सरल बनाने वाला ग्रन्थ कहा गया है। शिव-भक्तों और अध्यात्म-अध्ययन से जुड़े पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत प्रिय और उपयोगी रहा है तथा शिव-पूजा के प्राचीन रूप और परंपरा को समझने में मदद करता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- लिंग पुराण की कथाएँ
- शिव-लिंग की महिमा तथा उपासना
- व्रत तथा पूजा-विधि
- धर्म तथा मोक्ष के उपदेश
पुस्तक की मुख्य बातें
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