मधु बिंदु एवं ज्योति कण — श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ जी
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यह पुस्तक मधु बिन्दु एवं ज्योति कण नाम से प्रकाशित हुई है और इसके लेखक सुदर्शन सिंह चक्र हैं। शीर्षक पृष्ठ पर यह भी सूचना दी गई है कि इस पुस्तक को या इसके किसी अंश को प्रकाशित करने, उद्धृत करने अथवा किसी भाषा में अनुवाद करने का अधिकार सबको है। प्रकाशन-विभाग श्रीकृष्ण-जन्मस्थान सेवा संस्थान, मथुरा-281001 है। पृष्ठ पर यह भी दर्ज है कि यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराए गए कागज पर मुद्रित-प्रकाशित है।
पुस्तक दो शब्द से आरम्भ होता है, जिसमें बताया गया है कि मधुरता स्वभाव-प्रधान है और रस सबको चाहिए, परन्तु अत्यधिक मीठे वाक्य भी अविवेकपूर्ण होते हैं। इसी सूत्र के आगे यह भी कहा गया है कि केवल पदार्थ ही कटु या मधुर नहीं होते, वर्ण और वाचन भी कड़वे या मीठे होते हैं, इसलिए सामान्य, सांभविक और बौद्धिक वाणी इन्हें आत्मसात् कर सकते हैं। इसके बाद छोटी-छोटी कहानियाँ और जीवन के अनुभव दिए गए हैं, जिनमें एक बुद्धिशाली सज्जन के मिलकर बैठने पर चुप रह जाने और बोलने की वासना पूरी न कर पाने का प्रसंग भी आता है।
सूक्ष्म बोध और आत्म-चिंतन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तिका उपयोगी है, क्योंकि यहाँ बड़े-बड़े उपदेश नहीं देकर रोज़मर्रा की बातों और घटनाओं के ज़रिए बोलने और चुप रहने का संतुलन समझाया गया है। पढ़ने में समय बहुत कम लगता है। फिर भी ध्यान दें कि यह पुस्तक केवल विचार-चर्चा के लिए है। यहाँ बताए गए मंत्र और साधना-सम्बन्धी निर्देश किसी चिकित्सा या शारीरिक-मानसिक उपचार का आधार नहीं हैं, इसलिए इसे उपचार का स्रोत न समझें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मधु (शहद) के गुण तथा शक्ति
- अनेक रोगों में मधु का प्रयोग
- विधि तथा मात्रा
- सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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