मानस के मंगलाचरण – Manas Ke Mangalacharan
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शीर्षक-पृष्ठ पर पुस्तक का नाम मानस के मंगलाचरण अंकित है और उसके नीचे प्रकाश पत्र होने का उल्लेख मिलता है। व्याख्याकार के रूप में सुदर्शनसिंह चक्र का नाम दिया गया है और प्रस्तावना तथा समर्पण अनुभाग में भी उन्हीं के हस्ताक्षर मिलते हैं। प्रकाशक मानस सेवा है और ग्वालियर तथा राजस्थान का पता दिया गया है। पृष्ठ पर फाल्गुन कृत्त पंच संवत् अठारह व रवि कर्त्ती संवत् दो हजार तिरासठ और मूल्य बीस का उल्लेख भी मिलता है।
पुस्तक का आरंभ एक लंबे प्रस्तावना से होता है जिसमें मानस पुराण की रचना-सम्बन्धी समस्या पर विद्वानों के मतों की समीक्षा की गई है। प्रस्तावना में यह दिखाया गया है कि मानस के चतुर्थ अंश पंचमान को पढ़ने के लिए पर्वत पुराण का सहयोग क्यों आवश्यक हुआ और मानस में उपलब्ध अंश पर्वत के अंशों से कितने मिलते हैं, इस पर बहस की गई है। इसके बाद दो शब्द और समर्पण अनुभाग आते हैं तथा पंचमान की व्याख्या का आरंभ होता है।
मानस के मंगलाचरण मानस पुराण के चौथे भाग अर्थात पंचमान की व्याख्या और पाठ-सम्बन्ध पर शोध का कार्य है। भक्ति-साहित्य और पुराण-पाठ के इतिहास के लिए यह पाठ उपयोगी माना जाता है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यहाँ दिए गए विवेचन और पाठ-तुलना लेखक के अपने अध्ययन पर आधारित हैं, और इसमें कोई चिकित्सकीय या आध्यात्मिक उपाय नहीं दिया गया है। इसे केवल साहित्यिक और ऐतिहासिक अध्ययन के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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