मायातन्त्रम् (संस्कृत-हिंदी) – Maya Tantram
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शीर्षक-पृष्ठ पर तन्त्रसंस्कृत का नाम मायातन्त्रम् अंकित है और साथ में निर्मिला नामक हिन्दी अनुवाद सहित लिखा है। सम्पादक एवं सानुवाद हिन्दी समीक्षक डॉ० रूपेश कुमार चौहान का नाम दिया गया है और उनके पदों में एम० ए० संस्कृत एवम् इतिहास तथा जे० आर० एफ० संस्कृत दिए गए हैं, साथ ही तदर्थ सहायक के रूप में प्रोफेसर जाकिर हुसैन कौलेज, दिल्ली का उल्लेख मिलता है। प्रकाशन चौखम्भा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी का है और मुद्रक चौखम्भा प्रेस, वाराणसी। पुस्तक कृष्णदास संस्कृत सीरीज के दो सौ इकसठवें अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
पृष्ठ पर स्पष्ट किया गया है कि इस प्रकाशन में मूल पाठ के साथ निर्मिला नामक हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है और सम्पादन कार्य डॉ० चौहान ने किया है। भूमिका में बताया गया है कि माया को अविद्या की शक्ति माना गया है और इस ग्रन्थ में उसी का विस्तृत वर्णन मिलता है। पादलेख में कवि त्रैलोक्यमोहन और वागीश्वर कवि जैसे आचार्यों के उद्धरण दिए गए हैं, साथ ही वामनाचार्य, शंकराचार्य, कबीर और सरस्वती का भी उल्लेख मिलता है। वहीं परंपरागत शास्त्रीय सिद्धांतों और प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थों से जुड़े विवादों पर भी टिप्पणी की गई है।
मायातन्त्रम् तान्त्रिक परंपरा की उस धारा से जुड़ा है जिसमें माया को अविद्या शक्ति मानकर देवी-पूजा और अनुष्ठान के विधान बताए गए हैं। ऐसी रचनाएँ अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं क्योंकि इनमें प्राचीन भारतीय विचारधारा का सीधा प्रमाण मिलता है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यहाँ वर्णित मंत्र, यन्त्र और पूजा-विधियाँ आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं हैं और इनका कोई चिकित्सकीय दावा नहीं है। किसी भी तांत्रिक अनुष्ठान या उपाय को शुरू करने से पहले योग्य विद्वान से परामर्श लें और शारीरिक रोग की स्थिति में चिकित्सक की सलाह को पहले लें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मंत्रों का अर्थ, उच्चारण तथा जाप-विधि
- साधना-क्रम, संख्या तथा नियम
- यंत्र, ताबीज तथा उनके प्रयोग
- फल, सावधानियाँ तथा सामान्य प्रश्न
पुस्तक की मुख्य बातें
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