फिरंग रोग | Phirng Rog
इस किताब के बारे में
फिरंग रोग पुस्तक के लेखक पं० धनजीत सिंह हैं, जिन्होंने इस ग्रंथ की रचना जनवरी सन् १९५३ में की थी। प्रथम संस्करण के बाद द्वितीय १९७० और तृतीय संस्करण २००० मिति को भी प्रकाशित हुआ है, जिससे इस पुस्तक की निरंतत लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है। प्रकाशन पं० माधवराव खुल्ला, हरिद्वार ने किया है और प्रकाशन सम्बत् १०८२ माना गया है। पुस्तक में लगभग १८५ पृष्ठों का पाठ है।
फिरंग रोग आयुर्वेद में वर्णित एक पुराना रोग है जिसका उपचार रसौषधि-चिकित्सा के माध्यम से किया जाता है। पुस्तक में इस रोग के कारण, लक्षण, भेद और चिकित्सा-पद्धति का विस्तृत वर्णन मिलता है। विभिन्न आयुर्वेदिक योगों और औषधियों की निर्माण-विधि भी यहाँ दी गई है। वैद्य हरिदत्त शर्मा के संरक्षण में यह ग्रंथ उनकी विधि पर आधारित है, इसलिए यह परंपरागत आयुर्वेद-चिकित्सा का एक ठोस दस्तावेज़ बना हुआ है।
आयुर्वेद-विद्यार्थियों, वैद्यों तथा रस-शास्त्र में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है। कई संस्करणों के छपने से पता चलता है कि यह ग्रंथ आज भी प्रचलित है। प्राचीन आयुर्वेद-चिकित्सा के इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए भी यह पुस्तक मूल्यवान है। (औषधि-प्रयोग योग्य वैद्य की देखरेख में ही करना चाहिए।)
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- फिरंग रोग के कारण तथा लक्षण
- आयुर्वेदिक तथा घरेलू उपचार
- परहेज़ तथा सावधानियाँ
- रोकथाम के उपाय
पुस्तक की मुख्य बातें
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