प्रयाग की पांडित्य परंपरा (डॉ. उर्मिला श्रीवास्तव) – Prayag Ki Panditya Parampara
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प्रयाग की पाण्डित्य परम्परा नामक पुस्तक डॉ. (श्रीमती) उर्मिला श्रीवास्तव की लिखी है। शीर्षक-पृष्ठ पर शीर्षक बड़े अक्षरों में अंकित है और उसके बीच में "डॉ० उर्मिला श्रीवास्तव" दिया गया है। नीचे प्रकाशक का चिह्न और "ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली" लिखा है। शीर्षक से पहले एक अर्ध-पृष्ठ भी दिया गया है, जिसमें केवल शीर्षक अंकित है। आवरण पर प्रयाग के घाट की काली-सफ़ेद तस्वीर है, जिसमें मंदिर-शिखर, सीढ़ियाँ, छतरीन और नावें दिखती हैं। पुस्तक लगभग तीन सौ दो पृष्ठों की है।
इस पुस्तक का उद्देश्य प्रयाग — आज के इलाहाबाद — की पांडित्य-परंपरा का इतिहास सामने लाना है। पुस्तक में बताया गया है कि इस नगर में किन कालों में किन विद्वानों ने शिक्षा प्राप्त की, वे किन संस्थाओं और संगठनों से जुड़े रहे, और उनकी शिष्य-परंपरा किस प्रकार आगे बढ़ती गई। प्रयाग के संस्कृत-ज्ञान के केन्द्र के रूप में कैसे बना और किन कारणों से उसका यह स्थान प्राप्त हुआ, यह भी विषय-सूची में शामिल विषयों में दिखाई देता है। आरंभ में शहर के धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर बात होती है, तथा आगे कालक्रम के अनुसार पांडितों और उनके योगदान का वर्णन मिलता है।
किसी भी नगर की संस्कृति और विचार-धारा को समझने के लिए वहाँ की शिक्षा-परंपरा जानना ज़रूरी है, और यह पुस्तक इसी दृष्टि से उपयोगी है। प्रयाग का नाम संस्कृत-ज्ञान के लिए सदियों से जुड़ा रहा है, और ऐतिहासिक नगर के रूप में उसकी पहचान आज भी बनी हुई है। लेखिका डॉ. उर्मिला श्रीवास्तव ने इतिहास-सामग्री को क्रमबद्ध करके प्रस्तुत किया है, इसलिए पाठक को संदर्भ के साथ पढ़ने में सुविधा होती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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