रुद्रयामल उत्तरतन्त्र प्रथम भाग – Rudra Yamalam Uttara Tantram
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यह ग्रन्थ व्रजजीवन प्राच्यभारती ग्रन्थमाला का ८६वाँ ग्रन्थ है और इसका नाम रुद्रयामलम् उत्तरतन्त्रम् है। सम्पादक एवं व्याख्याकार डॉ० सुधाकर मालवीय, संस्कृत-विभाग, कला-संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी हैं। प्रकाशक चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, जवाहरनगर, दिल्ली है। प्रथम संस्करण उन्नीस सौ निन्यानवे ईस्वी का है, प्रथम भाग का मूल्य ३७५ रुपये और भाग ६२२ पन्नों का है।
सम्पादकोयम् में बताया गया है कि रुद्रयामल के उत्तरतन्त्र में लगभग छह हज़ार श्लोक हैं और उसमें कुण्डलिनीयोग प्रतिपादित है। इस भाग के मुख्य विषय हैं उपक्रमणिका, विविध साधनानि, भावप्रशंसा, कुण्डलिनी का अष्टोत्तरसहस्रनामस्तोत्र, षट्चक्रभेद, राकिणी और लाकिनी साधन, मणिपूरचक्र-भेदन, कामिनी-वशीकरण तथा योगधर्म-स्वाश्रम-स्वरूप। पाठ संस्कृत श्लोकों में है और नीचे सरला व्याख्या में उनका हिन्दी अर्थ खोला गया है।
सम्पादक ने लिखा है कि व्याख्या के समय उनके सामने इस ग्रन्थ के दो संस्करण रहे — सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की योगतन्त्र-ग्रन्थमाला में छपा संस्करण, और जीवानन्द विद्यासागर द्वारा सम्पादित १८९२ का कलकत्ता संस्करण। यह पुस्तक तन्त्र-साहित्य और कुण्डलिनीयोग के अध्येताओं तथा शोधार्थियों के लिए है। तन्त्र-साधना की किसी विधि को अपनाने से पहले योग्य गुरु से मार्गदर्शन लें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
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