Saundarya Lahari Swami Vishnu Tirtha Ji Maharaj
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सौन्दर्यलहरी के मूल रचयिता शीर्षक पृष्ठ पर श्री १००८ शङ्करभगवत्पाद-विरचिता के रूप में दर्जे हैं, और उपशीर्षक में इसका हिन्दी अनुवाद श्रीविद्या-तत्त्व और कुण्डलिनी-रहस्य सहित के रूप में दिया गया है। इस पुस्तक का टीकाकार श्री १०८ स्वामी विष्णुतीर्थं जी महाराज हैं, और लेखक का नाम छपा होने के कारण ही शीर्षक में उनका नाम आया हुआ है, इसलिए शीर्षक को सही माना गया है।
पुस्तक का प्रकाशन योगश्री पीठ, मुनिकीरेती, ऋषिकेश, टिहरी गढ़वाल, उत्तर प्रदेश से हुआ है। प्रकाशन का पता शिवानन्द नगर में दर्ज है और मुद्रण सद्भावना प्रिंटर्स एण्ड एलाइड ट्रेडर्स, इण्डस्ट्रीयल एरिया, हरिद्वार में हुआ है। शीर्षक पृष्ठ पर यह भी दर्ज है कि इस पुस्तक की छह आवृतियाँ निकली हैं, प्रथमावृति १००० सन् १९४९ ई० से लेकर षष्ठावृति २००० सन् १९९७ ई० तक, जिससे पाठक अपने पसंद की आवृत्ति की जानकारी पा सकते हैं।
सौन्दर्यलहरी शिव तत्त्व और शक्ति के एकत्व को समझाने वाला आध्यात्मिक ग्रन्थ माना जाता है, जिसका पाठ दीक्षित पाठकों के लिए साधना का भी आधार बन सकता है। तप, साधना या किसी क्रिया के लिए किसी योग्य आचार्य के मार्गदर्शन के बिना इसका उपयोग न करें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- सौंदर्य लहरी का मूल पाठ
- श्रीविद्या तथा देवी-स्तुति
- सरल भाष्य तथा अर्थ
- पाठ करने की विधि
पुस्तक की मुख्य बातें
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