शिव महापुराण (भाग 1) – Shiva Mahapuran
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शिव महापुराण भारतीय पौराणिक साहित्य का बहुत बड़ा ग्रंथ है। स्कैन में पृष्ठों के शीर्ष-पट्टी पर शिवपुराण और महादेवपुराण-सहित अंकित मिलता है, जो इसी ग्रंथ के नाम हैं। पुस्तक में मूल पाठ संस्कृत देवनागरी में छपा है और उसके साथ हिन्दी भाषान्तर भी साथ-साथ दिया गया है। पाठ के कई स्थानों पर पुराने चित्र-पटल भी मुद्रित मिलते हैं। पुस्तक के अंत में वायवीयसंहिता सम्पूर्ण और शिवपुराण सम्पूर्ण लिखकर समाप्ति दिखाई गई है। कुल लगभग आठ सौ बारह पृष्ठ हैं।
पुस्तक में शिव जी के जन्म, बाल्य, विवाह, राज्याभिषेक, कैलास-वध जैसे कठिन प्रसंग तथा उनके विभिन्न अवतारों के वर्णन मिलते हैं। द्वादश और ग्यारह रुद्रों जैसे विषयों पर विस्तृत पाठ है। वायवीय संहिता में अग्नि, वायु और इन्द्र से जुड़े अध्याय प्रमुख हैं। पाठ में ऋषि-मुनियों के संवाद और पौराणिक किस्से क्रमशः सजाए गए हैं। अंतिम अध्यायों में शिव भगवान शंकर इस पुराण के वक्ता और श्रीतालाका सहित कल्पांत करें जैसे पंक्तियाँ मिलती हैं, जो ग्रंथ के पारंपरिक समापन-वर्णन का हिस्सा हैं।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो पौराणिक साहित्य, धर्मशास्त्र या भगवान शिव के उपासना-पथ में रुचि रखते हैं। संस्कृत मूल के साथ हिन्दी अनुवाद होने से पाठ समझने में कठिनाई नहीं होती। आठ सौ से अधिक पृष्ठों में विशाल सामग्री एक साथ मिल जाती है, इसलिए यह संदर्भ-ग्रंथ के रूप में उपयोगी है। शिव-पुराण के इतिहास को समझने के लिए भी यह पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है। संस्कृत ज्ञान के बिना पढ़ना संभव है, पर गहराई से समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान सहायक होता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- धर्म-ग्रंथों का सरल हिंदी अनुवाद व भावार्थ
- पूजा-पाठ, स्तोत्र तथा नित्य-कर्म की विधि
- व्रत, त्योहार तथा संस्कारों का वर्णन
- आध्यात्मिक जीवन के नियम व प्रेरणा
पुस्तक की मुख्य बातें
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