श्री ललिता सहस्रम् काव्यम् – Shri Lalita Sahasram Kavyam
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शीर्षक-पृष्ठ पर काव्य का नाम श्रीललितासहस्रं काव्यम् अंकित है और साथ में यह दर्ज है कि इसमें हिन्दी देवी भाषा का स्वरचित अनुवाद सहित है। कवि का नाम पं० श्रीहरिशास्त्री दाधीच दिया गया है और उनका संबंध जयपुर राजस्थान से बताया गया है। प्रकाशन का श्रेय चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी को दिया गया है तथा प्रथमावृत्ति वर्ष २००० में निकली है। पृष्ठ पर सम्पादक एम० एम० अध्यक्षवाल का नाम भी दर्ज है।
आरंभ में शीर्षक माला से युक्त प्रशस्ति-पत्र है, जिसमें विद्या और गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कवि का गुणगान किया गया है। अन्त में शीर्षक परिशिष्ट के रूप में राजपूत लिपि में लिखी गई अनेक पंक्तियाँ और कई चित्र दिए गए हैं, जिनमें गुरुमुख तथा पार्श्वनाथ जी के अंकन हैं। परिशिष्ट में चित्र-कला पर एक विस्तृत टिप्पणी भी दी गई है, जिसमें चित्रकार की शैली की तुलना की गई है और चित्रों की तिथियाँ भी दर्ज हैं।
श्रीललिता सहस्रम् भक्ति-काव्य की महत्वपूर्ण रचनाओं में गिना जाता है और इस संस्करण में हिन्दी अनुवाद भी मिलता है, जिससे अनपढ़ हिन्दी-पाठक भी इसे पढ़ सकते हैं। राजस्थान के कवि ने भक्ति के भाव को मधुर काव्य-शैली में व्यक्त किया है। भक्ति-साहित्य का अध्ययन करने वाले पाठकों के लिए यह कृति सूचीबद्ध और समीक्षात्मक दोनों दृष्टियों से उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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