श्रीमद्भागवत महापुराण (पदच्छेद, अन्वय, हिन्दी शब्दार्थ टीका सहित) — श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ जी
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श्रीमद्भागवत महापुराण वैष्णव साहित्य का सबसे बड़ा ग्रन्थ है और यह पुस्तक उसका सम्पूर्ण संस्करण है। आवरण-पृष्ठ पर इसे पदच्छेद, अन्वय, हिन्दी शब्दार्थ टीका सहित और सम्पूर्ण बताया गया है, जिसका अर्थ है कि बारह स्कन्धों का पूरा पाठ उपलब्ध है। ग्रन्थ के रचयिता महर्षि श्रीकृष्णदैपायन वेदव्यास बताए गए हैं और सम्पादक सुदर्शन सिंह चक्र हैं। पुस्तक लगभग छह हज़ार आठ सौ चौरासी पृष्ठ की है।
पदच्छेद अर्थात पद-विभाजन के कारण श्लोकों को पढ़ना बहुत सरल हो जाता है। अन्वय के माध्यम से पंक्तियों का क्रम कविता की तरह स्पष्ट दिखता है, और हिन्दी शब्दार्थ-टीका से अर्थ तुरंत समझ आता है। इस संस्करण में द्वादश स्कन्धों का पूरा पाठ है — जन्म, कर्म, वृत्त, प्रलय, कलि-युग तथा कल्कि-अवतार से जुड़े स्कन्ध। द्वारका-चरित्र, नृत्य-लीला, रास-लीला और सीता-रहस्य जैसे प्रसंग इसमें विस्तार से आते हैं। क्रमबद्ध ढंग से सजाया गया यह संस्करण लंबे पाठ को भी सहज बनाता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो भागवत का अध्ययन गंभीरता से करना चाहते हैं। पदच्छेद और अन्वय के कारण यह अकेले पढ़ने योग्य बन जाता है, जबकि हिन्दी शब्दार्थ-टीका संस्कृत जानने वालों और न जानने वालों दोनों के लिए काम आती है। कन्हैया संप्रदाय के लिए भागवत का अत्यंत महत्व है, और इस प्रकार के सजावटी संस्करण उसी अपेक्षा के अनुकूल हैं। छह हज़ार से अधिक पृष्ठ का होने के कारण इसे समय के साथ पढ़ना उचित होगा, और अनुक्रमणिका के कारण किसी एक स्कन्ध तक सीधे पहुँचा जा सकता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मूल ग्रंथ का परिचय तथा महत्व
- श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद व अर्थ
- मुख्य पात्रों तथा प्रसंगों का वर्णन
- जीवन में अपनाने योग्य शिक्षाएँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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