श्यामाकाली महाविद्या – Shyamakali Mahavidya
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शीर्षक-पृष्ठ पर ग्रन्थ का नाम श्यामाकाली महाविद्या अंकित है और बताया गया है कि यह श्रीदा की रचना है। संपादन तथा व्याख्या का काम गोस्वामी प्रह्लाद गिरि, वेदान्ताचार्य ने किया है और उनकी उपाधियाँ सर्वशिक्षाचार्य, साहित्याचार्य, एम० ए० और एल० एल० बी० दर्ज हैं। मूल पाठ के साथ शब्दार्थदीप नामक संस्कृत व्याख्या तथा ज्ञान और स्वयंभू नामक हिन्दी व्याख्या दी गई है। प्रकाशन चौखम्भा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी से हुआ है और मुद्रक चौखम्भा प्रेस, वाराणसी। यह प्रथम संस्करण है जिसकी तिथि चौह अप्रैल दो हजार नौ दर्ज है और बिथलदास संस्कृत सीरीज के बीसवें अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
यह पुस्तक प्रथम खण्ड में बाँटा गया है और उस खण्ड में ज्ञानखण्ड तथा सपर्या खण्ड दोनों दिए गए हैं। ज्ञानखण्ड में मूल ग्रन्थ का पाठ और उसकी व्याख्या रखी गई है, जबकि सपर्या खण्ड में देवी की उपासना की विधि का वर्णन मिलता है। पादलेख में ग्रन्थ के विषय-संबंधी शब्दों की सूची दी गई है। पृष्ठ पर अन्तरराष्ट्रीय पुस्तक-क्रमांक भी छपा है और प्रकाशन का पता दुर्गाघाट, वाराणसी बताया गया है। वितरण चौखम्भा संस्कृत सीरीज कार्यालय, गोपाल मंदिर लेन, चौक से कराया जाता है।
श्यामाकाली महाविद्या शाक्त परंपरा के उन ग्रन्थों में गिनी जाती है जिनमें देवी की साधना का विस्तार से वर्णन मिलता है और इसलिए शैव तथा शाक्त दर्शन के अध्ययन के लिए यह पाठ उपयोगी माना जाता है। मूल पाठ के साथ दो भाषाओं की व्याख्या देना इस प्रकाशन की विशेषता है, जिससे पाठक को शब्दों का अर्थ स्पष्ट होने में मदद मिलती है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यहाँ वर्णित मंत्र, यन्त्र और साधन-विधियाँ आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं हैं और इनका कोई चिकित्सकीय दावा नहीं है। किसी भी साधना या उपाय से पहले योग्य विद्वान से परामर्श लें और शारीरिक रोग की स्थिति में चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता दें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- श्यामा/काली महाविद्या की साधना
- मंत्र तथा विधि
- पूजा तथा नियम
- फल तथा सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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