वराह पुराण – Varaha Purana
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यह पुस्तक देवनागरी में नहीं बल्कि अंग्रेज़ी भाषा में छपी है और इसका शीर्षक है The Varaha-Purana। यह Ancient Indian Tradition and Mythology Series का इकतीसवाँ भाग है, जिसे श्री प्रो० जे० एल० शास्त्री द्वारा सम्पादित किया गया है, और वराह पुराण का अनुवाद तथा टीका एस० वेंकिटासुब्रह्मणिया अय्यर ने की है। प्रकाशक मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली है। पैमाना लगभग 777 पृष्ठ का है।
प्रकाशन-पृष्ठ पर बताया गया है कि यह पुस्तक पहली बार 1985 में दिल्ली से प्रकाशित हुई थी और 2003 में दोबारा छपी, तथा ISBN 81-208-0361-2 अंकित है। यह पुस्तक UNESCO Collection of Representative Works की Indian Translation Series में भी स्वीकृत है, जो संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान और सांस्कृतिक संगठ तथा भारत सरकार के संयुक्त प्रायोजन से चलती है। इस श्रृंखला में सिव, लिङ्ग, भागवत, गरुड़, नारद, कूर्म, ब्रह्मण्ड, अग्नि, वराह, ब्रह्म, वायु, पद्म और स्कन्द आदि पुराण आगे आते हैं।
यह पुस्तक अंग्रेज़ी पाठकों के लिए वराह पुराण के भावों को समझने का एक उपयोगी संदर्भ है, और पौराणिक कथाओं के अनुवाद के रूप में साहित्य-अध्ययन में भी महत्वपूर्ण है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मूल ग्रंथ का परिचय तथा महत्व
- श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद व अर्थ
- मुख्य पात्रों तथा प्रसंगों का वर्णन
- जीवन में अपनाने योग्य शिक्षाएँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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