युगलश्रीगीतिमालिका – Yugal Shri Geeti Malika
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यह ग्रन्थ युगलश्रीगीतिमालिका नाम से छपा है और इसके प्रणेता आचार्य जयमन्त मिश्र हैं। पुस्तक इन्दिरा प्रकाशनम्, हनुमानगञ्ज, मिश्रटोला, दरभङ्गा (बिहार) से दीपावली ९.११.२००७ ई० को निकली और उस पर दक्षिणा रु. २५०.०० अंकित है। मुद्रण प्रिटवेल, टावर चौक, दरभङ्गा में हुआ।
विषयानुक्रमणिका के अनुसार पुस्तक में समर्पण, प्रकाशकीय, शुभाशीर्वचन, भावोद्गार और अवतरणिका के बाद युगलश्रीगीतिमालिका के ९९ पद्य आते हैं। पद्यों का विषय श्रीराधा और श्रीकृष्ण का युगल रूप है; पहला पद्य सच्चिन्मयं वासुदेव श्रीकृष्णं पुरुषोत्तमम् से आरम्भ होता है और आगे भक्तों पर कृपा, विविध लीलाएँ तथा राधा-माधव के गुण गाए गए हैं। इसके बाद गीतानि का भाग है, जिसमें सखी को यमुना-तीर पर चलने का आह्वान करने जैसे गेय पद हैं। अंत में परिशिष्टम् है, जिसमें प्रणेता का परिचय संस्कृत में दिया गया है।
पुस्तक पूरी तरह संस्कृत में है और पद्यों की भाषा सरल तथा गेय है, इसलिए यह राधा-कृष्ण की भक्ति-काव्य परम्परा में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी है। परिशिष्ट से पता चलता है कि प्रणेता ने वाराणसी से व्याकरण और बिहार से साहित्य की उच्च शिक्षा पाई तथा कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। हिन्दी अनुवाद साथ नहीं है, इसलिए पाठक संस्कृत पद्यों का अर्थ शब्दकोश की सहायता से समझ सकते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
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