पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

1957 की एक सत्य घटना जब एक मुसलमान ने देखि पीपल की शक्ति |Hindi Story

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1957 की एक सत्य घटना जब एक मुसलमान ने देखि पीपल की शक्ति |Hindi Story

पीपल(pipal) में जान |motivational story in hindi

आज हम आपके लिए moral stories in hindi की श्रंखला में लायें है एक सत्य घटना …

★ सन् १९५७ से पहले की बात है । पिलखुआ गाँव में दलवीरखाँ नामक एक मुसलमान बढई ने १०० रुपये में किसी राजपूत से एक हरा पीपल(Pipal) खरीदा । इस सौदे में इसाकखाँ नामक दूसरा बढई हिस्सेदार था । दोनों ने सोचा कि इसे काट-बेचकर जो आयेगा उसे बराबर भागों में दोनों बाँट लेंगे ।

★ वृक्ष में जान होती है । कभी किसी कारण से ऊँची आत्माओं को वृक्ष की योनियों में भी आना पडता है । वे आत्माएँ समझदार और कार्यशील होती हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि : ‘अश्वत्थः सर्व वृक्षाणां…। वृक्षों में पीपल मैं हूँ… मुनियों में कपिल मैं हूँ… नक्षत्रों में चंद्रमा मैं हूँ ।

★ दलवीरखाँ को पीपल की जीवात्मा ने स्वप्न दिखाया । पीपल(pipal) कह रहा था : ‘‘तुम मेरे प्राण बचाओ । तुम मुझे काटनेवाले हो, मेरी मृत्यु होगी । तुमने मुझे १०० रुपये में खरीदा है और जो भी मुनाफा होगा वह सब बदले में मैं तुम्हें लौटा देता हूँ । मेरी जड में एक जगह तुम खोदोगे तो तुमको सोने की शलाका मिलेगी । उसे बेचकर तुम्हें जो मुनाफा होगा उससे तुम्हारा सारा खर्च निकल जायेगा । इसलिए कृपा करके मुझे कल काटना मत । मुझे प्राणों का दान देना । दलवीरखाँ ने ऐसा स्वप्न देखा ।

★ दलवीरखाँ को इस स्वप्न पर यकीन नहीं हुआ । फिर भी उसने उसे आजमाने के लिए पीपल नींव में जहाँ स्वप्न में संकेत मिला था, खोदा तो सचमुच सोने की एक शलाका निकल आयी । वह अपनी खुशी को सह न सका और बीबी को जाकर बता दिया । बीबी भी आश्चर्यचकित हो उठी । दलवीरखाँ ने सोचा कि यह बात यदि मेरे मित्र को बता दूँगा तो सोने की शलाका के आधे हक की वह माँग करने लगेगा । वह मानवता से च्युत हुआ ।

★ आधा हिस्सा बचाने के लोभ में शलाका प्राप्ति की घटना को ही छुपाये रहा । जब इसाकखाँ उसके पास आया तब उसके साथ वह पीपल काटने के लिए चल पडा । दलवीरखाँ ने मानवता को दूर रख दिया । निःस्वार्थता, लोभ रहितता एवं निष्कामता मनुष्य को देवत्व प्रदान करती है जबकि स्वार्थ और लोभ मनुष्य को मनुष्यता से हटाकर दानवता जैसी दुःखदायी योनियों में भटकाते हैं । जहाँ स्वार्थ है वहाँ आदमी असुर हो जाता है और जहाँ निष्कामता है वहाँ उसमें सुरत्व जाग उठता है ।

★ मनुष्य ऐसा प्राणी है जो चाहे तो सुर हो जाय, चाहे तो असुर बन जाय और चाहे तो सुर-असुर दोनों जिससे सिद्ध होते हैं उस सिद्ध स्वरूप को पाकर जीवन्मुक्त बन जाय । यह मनुष्य के हाथ की बात है । वह अपने ही कर्मों से भगवान की पूजा कर सकता है और अपने ही कर्मों से कुदरत का कोप-भाजन भी बन सकता है । अपने ही कर्मों से गुरुओं के अनुभव को अपना अनुभव बना सकता है और अपने ही कुकर्मों से दैत्य, दानव और शूकर की योनियों में भटकने का मार्ग पकड सकता है । मनुष्य पूर्णतः स्वतंत्र है ।
कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करे सो तस फल चाखा ।।

★ पहले नियम था कि जो हरा वृक्ष काटना चाहे वह पहले गुड बाँटे । साथ में दो चार और भी साथी हो गये । सबको गुड बाँटा । ज्यों ही पीपल पर कुल्हाडा चला तो लोगों ने देखा कि पीपल में से खून की धारा फूट निकली । सब हैरान हुए कि वृक्ष में से खून की धारा ! फिर भी दलवीरखाँ लोभ के अंधेपन में यह नहीं समझ पा रहा है कि रात को उसने मुझसे प्राणदान माँगा था । यह कोई साधारण वृक्ष नहीं है और उसने मुझे सुवर्ण के रूप में बदला भी चुका दिया है ।

★ निःस्वार्थता से आदमी की अंदर की आँखें खुलती हैं जबकि स्वार्थ से आदमी के विवेक की आँखें मुँद जाती हैं, वह अँधा हो जाता है । रजोगुणी या तमोगुणी आदमी का विवेक क्षीण हो जाता है और सत्त्वगुणी का विवेक, वैराग्य एवं मोक्ष का प्रसाद अपने आप बढने लगता है । आदमी जितना ही निःस्वार्थ कार्य करता है उतना ही उसके अपने संपर्क में आनेवालों का हित होता है । जितना स्वार्थी होता है उतना ही वह अपनी और अपने कुटुम्बियों की बरबादी करता है ।

★ जो पिता निःस्वार्थ भाव से संतों की सेवा करता है और यदि संत कोई उच्च कोटि के होते हैं और शिष्य की सेवा स्वीकार कर लेते हैं तो फिर उसके पुत्र-कलत्र सभी को भगवान की भक्ति का सुफल सुलभ हो जाता है । भक्ति का फल प्राप्त कर लेना हँसी खेल नहीं है । भगवान के पास एक योगी पहुँचा । उसने कहा : ‘‘भगवान ! मुझे भक्ति दो ।motivational story in hindi pipal ki shakti
भगवान : ‘मैं तुम्हें रिद्धि सिद्धि दे दूँ । तुम चाहो तो तुम्हें पृथ्वी के कुछ हिस्से का राज्य ही सौंप दूँ मगर मुझसे भक्ति मत माँगो ।
योगी : ‘‘आप सब देने को तैयार हो और अपनी भक्ति नहीं देते हो, आखिर ऐसा क्यों ?
भगवान : ‘‘भक्ति देने के बाद मुझे भक्त के पीछे-पीछे घूमना पडता है ।

★ निष्काम कर्म करनेवाले व्यक्तियों के कर्म भगवान या संत स्वीकार कर लेते हैं तो उसके बदले में उसके कुल को भक्ति मिलती है । जिसके कुल को भक्ति मिलती है उसकी बराबरी धनवान भी नहीं कर सकता । सत्तावाला भला उसकी क्या बराबरी करेगा ? जो निष्काम सेवा करता है उसे ही भक्ति मिलती है । जैसे, हनुमानजी को भक्ति मिली । हनुमानजी रामजी से कह सकते थे कि : ‘‘महाराज ! हम तो ब्रह्मचारी हैं । हमको योग, ध्यान या अन्य कोई भी मंत्र दे दीदिये, हम जपा करें । औरत आपकी खो गयी, असुर ले गये, हम क्यों प्राणों की बाजी लगायें ? ऐसा तो हनुमानजी कह सकते थे । मगर हनुमानजी में ऐसी दुर्बुद्धि या स्वार्थवृत्ति नहीं थी । हनुमानजी ने तो भगवान राम के काम को अपना काम बना लिया । इसलिए प्रायः गाया जाता है ‘राम लक्ष्मण जानकी… जय बोलो हनुमान की ।

★ आज का शिक्षित आदमी तो यही कहता : ‘‘बोस ! तुम्हारी पत्नी चली गयी ? दूसरी कर लो । यह तो होता ही रहता है । जो हुआ विधि का लेख मान लो । असुरों से लडने की क्या जरूरत ? अगर लडना ही है तो आप दोनों लडें । मुझ सीधे-सादे ब्रह्माचारी को बीच में क्यों घसीटते हो ? मुझे तो यह आशीर्वाद करो कि मैं आपकी भक्ति करूँ और तर जाऊँ । यह तो हुआ स्वार्थ । ‘मैं तर जाऊँ… ऐसा हनुमानजी ने नहीं माँगा । रामायण का ही प्रसंग है जिसमें मैनाक पर्वत सिंधु के बीचोबीच प्रकट होता है और हनुमानजी से कहता है : ‘‘हे अतिथि ! यहाँ आराम करो ।
पर थके हुए हनुमानजी उसके प्रस्ताव से प्रसन्न नहीं होते । वे कहते हैं : ‘राम काज कीन बिनु मोहि कहाँ विश्राम ।

★ निष्काम कर्म करनेवाला समझता है कि जो भी काम उसने अपने सिर लिया है उसे पूरा करने में चाहे कितने ही विघ्न आ जायँ, कितनी ही बाधाएँ आ जायँ, निंदा हो या संघर्ष, पर वह उसे पूरा करके ही चैन लेता है । निष्काम कर्म करनेवाले की अपनी अनूठी रीति होती है, शैली होती है ।

★ दलवीरखाँ स्वार्थ से इतना अँधा हो गया था कि रक्त की धार देखकर भी उसे भान नहीं आया कि मैं क्या कर रहा हूँ । उसने तो कुल्हाडे पर कुल्हाडा चलाना जारी रखा । जो स्वार्थांध बन जुल्मों सितम ढाता है उसे प्रकृति तत्क्षण परिणाम भी दे देती है । ज्यों-ज्यों वह उस निर्दोष वृक्ष पर कुल्हाडे मारता गया त्यों-त्यों उसका स्वस्थ सुंदर युवान बेटा जिसके नाखून में भी रोग या बीमारी का नामोनिशान नहीं था वह यकायक आंतरिक पीडा से कराहते हुए अंत में गिर पडा ।

★ उधर पीपल में से रक्त की धार निकली, इधर बेटे के शरीर से रक्त प्रवाहित हो चला । उधर वृक्ष का कटना था इधर दलवीरखाँ की आँखों का तारा उसके बेटे का अंत हो गया । शाम को जब दलवीरखाँ घर आया तब घर पर गाँव के समस्त लोगों को इकट्ठे शोकमग्न देखा । दलवीरखाँ को देख उसकी पत्नी चिल्ला उठी : ‘‘बेटे ! तेरा हत्यारा तो स्वयं तेरा यह बाप है ।

★ उसने सारा भंडा फोडते हुए कह दिया : ‘‘रात को पीपल का संकेत मिला था । शलाका भी मिली थी और वह निर्दोष वृक्ष प्राणदान माँग रहा था । इस हत्यारे ने लोभ और स्वार्थ में पडकर शलाका तो ले ली । जो सौ रुपये खरीदने में लगाये थे, स्वर्ण-शलाका से उसे उससे भी अधिकद्रव्य मिल गया था । फिर भी उसने उस पीपल के साथ अन्याय किया । कुदरत ने उसी अन्याय का बदला चुकाया है । ज्यों ही पीपल को काटा त्यों ही मेरे बेटे के बदन से खून की धार निकल चली । हे मेरे अंध स्वार्थी पति ! तुमने ही अपने बेटे का खून किया है । और वह फूट-फूट कर रुदन करने लगी ।

★ प्रायः स्वार्थ में अंधा होकर आदमी कुकर्म कर बैठता है और जब उसे उसका फल मिलता है तब वह पछताता है मगर बाद में पश्चात्ताप से क्या लाभ जो लोग स्वार्थ भाव का त्याग कर ईश्वर-प्राप्ति के वशीभूत हो कार्य करते हैं, वाह-वाही को छोड भगवान् को रिझाने के लिए कार्य करते हैं वे तर जाते हैं । शत्रु को हल्का दिखाने के लिए द्वेषी काम करते हैं । वाह-वाही पाने के लिए लोभी काम करते दिखते हैं । समाज की झूठी वाह-वाही के लिए भी कितने ही अहंकारी काम में परेशान रहते हैं लेकिन इनमें से जो भगवान को प्रसन्न करने के लिए काम करते हैं वे निष्काम कर्म करनेवाले धन्य हो जाते हैं ।
‘ईश्वरः सर्व भूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।।
‘हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्र पर आरूढ हुए सब प्राणियों को अंतर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है ।
(गीता : १८.६१)

★ ईश्वर सबके हृदय में बैठा है । जैसे विद्युत का करंट मोटर में जाता है । प्रत्येक स्पेर पार्ट जो कि मशीन में घूम रहा होता है वह विद्युत का ही प्रसाद है । विद्युत को कोई देखता नहीं । मशीन को देखता है मोटर को घूमते हुए देखता है लेकिन घुमानेवाला तत्त्व को आदमी आँख से नहीं देख सकता । फिर भी घुमानेवाला तत्त्व ही सब काम करता है । ऐसे ही अपने हृदय, इन्द्रिय, मन को, तन को सबको शक्ति देनेवाला परमात्मा सब कुछ देख रहा है । तुम बुरे काम करो तो लोग चाहे उस समय तुम्हें न फटकारें पर अंतर्यामी तो देख रहा है न ! देर सबेर उसका फल अवश्य देता है ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)

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