प्रेरक हिंदी कहानी : Hindi Storie with Moral

★      श्रीमद् भागवत में एक कथा आती है

★      अजामिल नाम की एक व्यक्ति पिता की मृत्यु के बाद मनमुख हो गया । धन हो, जवानी हो और मनमुख व्यक्तियों का संग हो, कुसंग हो फिर पतन होने में बाकी बचता ही क्या है ? धन मिलना कोई बडी बात नहीं, सत्ता मिलना कोई बडी बात नहीं, युवावस्था होना कोई बडी बात नहीं, किंतु सत्संग मिलना बडी बात है ।

★      जब तक जीव को असली धन, रामरस का धन नहीं मिलता तब तक धन पाने के लिए, सुख पाने के लिए वह दुनिया के न जाने कौन कौन-से कर्म करता है ! अजामिल भी उसमें से एक था । उसकी संगति दुराचारी लोगों के साथ होने के नाते एवं कुसंस्कार होने के नाते अजामिल का संपर्क एक गणिका के साथ हो गया ।

★      वह माँ को दुःख देता था । धीरे-धीरे उसने घर का इतना सत्यानाश कर दिया कि माँ तो दुःखी होकर मर गयी । माँ की मृत्यु के बाद अजामिल उस गणिका को घर ले आया । फिर जब उसकी धन-संपत्ति खत्म हो गयी तो वह चोरी, डकैती, बदमाशी आदि कुकर्मों से पैसा लाने लगा ।

★      एक बार कुछ संत जा रहे थे । अजामिल की पत्नी (गणिका) के मन में हुआ कि हमने जीवन में खूब दुष्कृत्य किये हैं । अब कुछ सुकृत करें । संत जा रहे हैं, उनको आमंत्रित कर भोजन करायें । उसने संतों को भोजन कराया ।

★      भोजन करके संत उठे इतने में अजामिल आ गया । तब उस महिला ने कहा : ‘‘संतों को प्रणाम करो ।
अजामिल बोला : ‘‘संतों को प्रणाम करो ।
अजामिल बोला : ‘‘तू तो भोली है । बाबाओं को खाना खिला दिया ! मैं तो इनका तुम्बा, कमंडल छीन कर बेचकर आऊंँ ऐसा आदमी हूँ । यह तू क्या कहती है ?

★      पत्नी ने कहा : ‘‘कुछ भी हो, इन संतों को आप प्रणाम करो ।
अजामिल जब प्रणाम करता है तब संत बोलते हैं :
‘‘भाई ! अब भोजन तो करा दिया, दक्षिणा चाहिए ।

★      जैसे मनीआर्डर करना है १०० रूपयों का, तो सौ रूपये भेजने के लिये तीन रूपये मनीआर्डर चार्ज भी तो चाहिए । इसी प्रकार भोजन कराने के बाद दक्षिणा भी तो देनी चाहिए । अजामिल बोला : ‘‘महाराज ! दक्षिणा ये मेरे दो हाथ हैं । आप रवाना हो जाओ नहीं तो… आप मेरे को नहीं जानते मैं अजामिल हूँ ।

★      संत निर्भीक वाणी में कृपा बरसाते हुये बोले : ‘‘चाहे तू अजामिल हो चाहे कोई और मिल हो लेकिन हम तो दक्षिणा लेकर ही जायेंगे । हमको दक्षिणा में रूपये पैसे नहीं चाहिए । हम दक्षिणा यही चाहते हैं कि तेरे घर जो बालक आनेवाला है उसका नाम नारायण रख देना ।

★      संतों ने सोचा : ‘‘यह खुद सत्संग में जाये ऐसा आदमी तो नहीं है । किसीको सत्संग में ले जाये ऐसा भी नहीं है और सुबह उठकर ध्यान-भजन करे ऐसा भी नहीं है । यह केस तो बिल्कुल बिगडा हुआ है । बिगडे हुये केस में तो महाराज ! सबसीडी की बहुत जरूरत पडती है । अतः उसके बेटे का नाम नारायण रखवा देंगे ।

★      छोटे बेटे में पिता की प्रीति होती है । जब वह बार-बार छोटे बेटे को बुलायेगा तो इस बहाने भी भगवान नारायण के पावन नाम का उच्चारण करेगा । हे भगवान ! आप उसको कंसेशन दे देना ।

★      संतों ने हृदय में संकल्प किया और अजामिल से कहा :
‘‘हमें दूसरी दान-दक्षिणा नहीं चाहिए । दक्षिणा में तू केवल यह वचन दे कि तेरे यहाँ थोडे ही दिनों के बाद जो बेटा जन्मेगा उसका नाम नारायण रखेगा ।
अजामिल ने कहा : महाराज ! उससे आपको क्या फायदा होगा ?
संतों ने कहा : ‘‘हमको यह फायदा होगा जो हम चाहते हैं । हम चाहते हैं कि तुम्हारे जैसे एक व्यक्ति का उद्धार हो जाये तो उससे बडा फायदा संतों को और क्या चाहिए ?

★      अजामिल बोला : ‘‘अच्छा महाराज ! नारायण नाम रख देंगे ।
अजामिल को पता नहीं था कि यह छोटा-सा प्रयोग कितना कल्याण कर सकता है ! समय बीता और अजामिल को पुत्रप्राप्ति हुई । उस पुत्र का नाम उसने नारायण रख दिया ।

★      अजामिल अपने उस नारायण नाम के पुत्र के स्नेहपाश में बँधता गया ।
एक दिन अजामिल मृत्युशय्या पर पडा और वह देकता है कि चहुँ ओर मेरे कुकर्म यमदूतों का रूप धारण कर मुझे लेने आये हैं । वह बहुत घबराया और अपने प्यारे पुत्र नारायण का नाम लिया : ‘‘नारायण ! मुझे बचा… नारायण ! मुझे बचा…

★      ऐसा करते करते नारायण नाम उसके हृदय से निकला तो भगवान नारायण के पार्षद आ गये और यमदूतोंसे बोले : ‘‘तुमदूर हटो ।
यमदूत बोले : ‘‘यह महापापी है,दुराचारी है । पार्षद बोले : ‘‘यह पापी हो या दुराचारी हो, लेकिन भगवान का नाम तो लेता है ।
यमदूत बोले : ‘‘यह भगवान नारायम का नहीं अपने बेटे नारायण का नाम ले रहा है ।
पार्षद बोले : ‘‘भले ही यह बेटे का नाम ले रहा है, किंतु बेटे का नाम भी तो संतों ने रखवाया है । संतों का यह संकल्प है कि बेटे का नाम, भगवानके नाम में गिना जाये । तुम दूर हटो ।

★      पार्षदों का अपना आग्रह और यमदूतों का अपना आग्रह अजामिल को दिख रहा है . आखिर पार्षदों की बात युक्तियुक्त थी । यमदूत चले गये । दुराचार के कारण अजामिल की अपमृत्यु होने वाली थी वह टल गयी । बारह वर्ष की आयु उसको फिर से मिली । तब से अजामिल भगवान का बडा भक्त हो गया ।

★      नारायण नाम की महिमा बहुत लोगों ने गायी है । काशी में प्रसिद्द महामना मदनमोहन मालवीयजी के नाम का कॉलेज है,सत्संग खंड है, सदाव्रत है, सभाखंड है । ऐसे मदनमोहन मालवीयजी भी कुछ काम करते थे तो नारायण नारायण करके काम करते थे और सफल होते थे । हनुप्रसाद पोद्दार भी नारायण नाम का जप करके फिर कुछ काम करते थे तो सफल हो जाते थे ।

★      आप भी जब किसी काम का आरंभ करो तब नारायण नाम का चार बार उच्चारण करके आरंभ करो । आप जब खेत में अनाज बोने जाओ तो अनाज पर नजर डाल दो और कह दो ‘नारायण… नारायण… नारायण… नारायण… । बाद में अनाज की बुआई करो । वह अनाज नहीं होगा, प्रसाद हो जायेगा । आपके घर का तो बेडा पार हो ही जायेगा, जिनकेहाथ में वह अन्न आयेगा उसको भी लाभ होगा ।
नारायण… नारायण… नारायण… नारायण…

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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