पोषक-तत्वों की कमी या ‘अपूर्ण-पोषण’ क्या है ?

हम अपने भोजन से पेट तो भर लेते है, मगर यह नहीं जानते कि इससे पोषक-तत्वों की कितनी कमी है तथा इस कमी से हमारे शरीर को कितनी हानि हो रही है। शरीर को हानि होने का मतलब-स्वास्थ्य में ह्रास। जब हमारे भोजन से पोषक-तत्वों की कमी होती है, तो भोजन विशेषज्ञ इसे ‘अपूर्ण-पोषण’ का नाम देते है। यह भी सच है कि जिस भोजन से पूरा पोषण न मिले, वह अपूर्ण तो हुआ ही।

एक आध बार या कभी-कभी हमारे भोजन से आवश्यक पोषक तत्वों की कमी रहे, तो इससे हामरे स्वास्थ्य पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। यदि किसी एक तत्व की निरंतर कमी बनी रहे, तो इस कमी के कारण हमारा शरीर रोगी भी हो सकता है। कोई-न-कोई रोग हमारे शरीर को घेर सकता है। अत: पहले तो माता-पिता स्वयं जागरूक हो। वे भोजन में तत्वों की कमी तथा तत्वों के प्रभाव को समझें, फिर उस तत्व की कमी को पूरा करने का प्रयत्न करें। कमी नहीं रहेगी, तो रोग भी नहीं होगा यह जरूरी नहीं है कि किसी तत्व की कमी पूरा करने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़े। वास्तव में पूरी जानकारी न होना ही हमारे लिए मुसीबत खड़ी करता है। जानकारी होने पर माता-पिता, अभिभावक या स्वयं उपभोक्ता अपने भोजन में पोषक तत्वों को कभी होने ही नहीं देगा। न स्वयं रोग में घिरेगा और न परिवारीजनों को घिरने देगा।

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कौन से पोषक तत्व कमी के कारण हैं ? :

भारतवर्ष की भौगोलिक स्थिति, कृषि-उत्पाद, यहां का खान-पान, रहनसहन तथा आर्थिक स्थिति ऐसी है, जिसके कारण हमारे आहार में निम्न प्रकार के पौष्टिक तत्वों की कमी बनी रहना आम बात है
1. कैलोरी की कमी भोजन में।
2. प्रोटीन की कमी भोजन में।
3. रक्त का अनीमिक होना अथवा रक्ताल्पता।
4. विभिन्न विटामिनों की हमारे आहार से कमी।
5. कैल्शियम की कमी।

भोजन में होने वाली पौष्टिक तत्वों की इन कमियों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।
1. प्राइमरी कमी।
2. सेकेंडरी कमी।

1. प्रथम श्रेणी में आने वाले बाहरी खाद्य पदार्थ है। हमारा भोजन, जो हम खाते है। हमारा आहार, जो हमें सेवन को मिलता है। भोजन तो हम खा लेते है। पेट भी भर लेते है, मगर इसमें पोषक तत्वों की कमी रहती है। या तो यह भोजन स्तर से नीचे का होता है, या फिर उपभोक्ता भी इस कमी से भली प्रकार परिचित नहीं होता, वरना यह अपने खाने वाली खुराक में इन पोषक तत्वों की तलाश जरूर करता। पूरी जानकारी न होना ही एकमात्र कारण नहीं, इस उत्पाद में भी कमी होती है, जो इनको मिलने वाली खाद आदि के कारण भी संभव है।

2. दूसरी श्रेणी में होने वाली कमी भोजन की अपूर्णता, तत्वों की कमी के कारण है।
a. चयापचयी का विकार।
b. खाने से शरीर पोषक-तत्वों को निकालने में अक्षम।
c. भोजन से पोषक तत्वों का व्यर्थ चला जाना।
d. शरीर में होने वाली चयापचयी मांग को पूरा न कर पाना।

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पोषक तत्वों की प्राइमरी कमी के कारण तथा समस्याएं :

प्राइमरी-कमी हमारे भोजन से संबंधित है। जो कुछ हम खाते है, उससे पोषक तत्व उतने नहीं मिलते, जितने कि स्वास्थ्य के लिए हमारे शरीर को चाहिए। यहीं तो है बेसिक या प्राइमरी कमी, जिसके कारण हमारे शरीर का अपूर्ण पोषण हो रहा है। यहीं फिर बनता है रोगों का जन्मदाता भी। आइए, इसे और विस्तार से जानें
1. कई बार हम स्टैंडर्ड का भोजन खरीद ही नहीं सकते। हमारा आर्थिक स्तर हमें इसकी आज्ञा नहीं देता। भोजन की गुणवत्ता जाने बिना हमें खाद्य पदार्थ इसलिए भी खरीदने पड़ते है, क्योंकि इससे अच्छी गुणवता वाले भोजन के लिए हमारे पास पैसे नहीं होने। गेहूं को ही लें। एक तरह का गेहूं चार रुपए किलो है, तो दूसरी तरह का 6 रुपए। पैसे की कमी के ही कारण, तो हम चार रुपए वाला घटिया गेहूं खरीदेंगे। इससे बनेगा घटिया आटा। यहीं घटिया आटा खाने से हमें कमजोर गुणवता वाली रोटी मिलेगी। यह शरीर में कोई-न-कोई कमी निरंतर बढ़ाती रहेगी। फिर रोग तो होगा ही।

2. हमारे खान-पान के ढंग गलत होगे, तो हम गलत भोजन करेंगे, जिससे गलत परिणाम सामने आएंगे। वह हमें शक्ति कम देगा। कुछ तत्वों की शरीर में कमी बनी रहेगी। हो सकता है यह कमी निरंतर बढ़ती रहे। कभी-कभी हमें भोजन बनाने का ढंग भी नहीं आता।
मान लो घीया या आलू की सब्जी बनानी है। उसका छिलका मोटा उतारने से इसकी पौष्टिकता नहीं रहेगी। रोटी अधिक पका देंगे या जला देंगे, तो भी इसके गुण यानी पौष्टिकता वाले तत्व खत्म हो जाएगे। चावल बनाकर उसका पानी फेंक देंगे, तो सारी शक्ति उसमें से निकल जाती है। चावल जो हम खाएंगे, उनमें ताकत ही नहीं होगी।
अतः हमें अपने खान-पान के ढंगों से भी सुधार करना पडेगा, वरना हमारा भोजन हमें पूरे पौष्टिक तत्व देने से असमर्थ रहेगा। ऐसी कमियां सर्वत्र देखने को मिलती हैं। यहीं कारण है कि भोजन से पूर्ण पौष्टिकता प्राप्त नहीं होती।

3. जानकारी की कमी भी एक कारण है भोजन से अपूर्ण पोषण मिलने का। अनेक खाद्य पदार्थों के पकाने-खाने के ढंग हमें नहीं आते। भोजन से क्या व्यर्थ गंवा रहे है, यह भी मालूम नहीं। भोजन से निकले या बचे हुए हिस्से यों ही गंवा देना, फैंक देना भी हमारे भोजन की पौष्टिकता में कमी का कारण है। एक से अधिक अनाज मिलाकर रोटी बना ने से अधिक पौष्टिकता प्राप्त होती है। मूंगफली कहीं बादाम से कम नहीं। चने भरपूर पौष्टिक तत्वों वाले है। सोयाबीन की सब्जी, नमकीन रोटी, सूप कितने फायदेमंद है, हम नहीं जानते। अंकुरित दालों व अनाज से कितनी पौष्टिकता बढ़ जाती है, हम ध्यान ही नहीं देते। इस प्रकार यदि हम शिक्षित हो सकेंगे, अपने ज्ञान को बढ़ा सकेंगे, अपने आहार की गुणवत्ता को जान सकेंगे, पकाने, खाने के ढंग जान सकेंगे, तो हमारा अपूर्ण पोषण भी पूर्व पोषक बन जाएगा। ज़रूरत है पूरी जानकारी की और उसे अपनाने की।

4. भंडारण ठीक न होना तथा इसे बार-बार गरम करना भी इसमें से पौष्टिक तत्वों का ह्रास कर देता है। यदि हम भंडारण की ठीक विधियों को समझ ले, तो भोजन की पौष्टिकता बचाई जा सकती | फ्रिज से भोजन अधिक समय तक रखने से भी भोजन के पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते है। बार-बार, अलग-अलग सदस्यों के लिए दाल-सब्जी को गरम करने से भी पोषक तत्वों में कमी आती है। भोजन की भाप निकलने देना, भोजन को अधिक पकाना गलाना। भोजन जो कच्चा खाया जा सके, उसको भी काटना, फिर धोना तथा अधिक पकाना या फ्राई करना काफी हानि पहुंचाता है। हम स्वाद के पीछे तो दौड़ते है, मगर यह नहीं समझते कि इससे हमने भोजन को कितना शक्तिहीन कर लिया है। यदि हम पाकशिक्षा की ये सभी बारीकियां जान ले, तो हमारा भोजन हमारे स्वास्थ्य के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है।

5. जब जैसा भोजन चाहिए, वैसा न करना। जितना चाहिए उतना भी न करना। रोगी की हलका व सुपाच्य भोजन न देकर भारी देना, जिसे यह पचा नहीं सकता तथा शरीर को पूरा लाभ नहीं मिलता।
दिमागी काम करने वाले विदयार्थियों, लेखाकारों आदि की साधारण भोजन परोसना, घी, दूध, बादाम आदि न देना। गर्भवती को साधारण भोजन देकर काम चला लेना, स्तनपान कराने वाली को दूध-दही आदि से वंचित रखना या इसकी आवश्कता ही न समझना, शारीरिक परिश्रम करने वालों या खिलाडियों को उनके शरीर के अनुरूप भोजन न देना निश्चय ही शरीर को कमजोर रखेगा तथा पौष्टिकता से महरूम भी। अत: हमें इन सबकी ठीक जानकारी होनी चाहिए, ताकि हम जरूरत के अनुसार भोजन से ज़रूरी बदलाव ला सकें।

6. रोगियों को कैसा भोजन मिले, उनके मुंह का स्वाद कैसे बदला जाए, कितना भोजन तथा इससे कितनी कैलोरी, काबोहाइड्रेट्स, विटामिन आदि ज़रूरी है, इस और ध्यान न देकर हम छोटों, बड़ों, रोगियों की कई प्रकार से हानि करते है। रोगग्रसित व्यक्ति के भोजन में कब बदलाव करना है तथा कब वृद्धि करनी है, इस सबके प्रति जागरूक रहना ज़रूरी है। कौन-से पदार्थ की किस प्रकार सेवन करने से लाभ होता है, यह जानने की कोशिश नहीं करते। लंबी बीमारी से उठे व्यक्ति की पाचन-शक्ति का ध्यान रखे बिना हम कुछ का कुछ खिलाने लग जाते है, इस प्रकार लाभ की बजाए हॉनि के आसार बना बैठते है।

7. शराब पीने की आदत, धूम्रपान करने का व्यसन, दवाइयों पर अत्यधिक निर्भर रहना, एक ही दवा का आदी होना आदि कुछ ऐसी बातें है, जो हमारे शरीर को पौष्टिकता नहीं पहुंचाने देती। हम शराब पीकर अपनी अंतड़ियों को जला लेंगे। शरीर बनने की बजाए बिगड़ने लगता है। हमें बुरी आदतों से बच कर, अपने शरीर की खुराक की ओर ध्यान देना चाहिए, अन्यथा हमारा शरीर दिनप्रतिदिन क्षीण होता जाएगा।

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पोषक तत्वों की सेकेंडरी कमी के कारण तथा समस्याएं :

1. कई बार भोजन तो हम पूरा व पौष्टिक खा लेते है, मगर यह हमारे लिए उतना उपयोगी नहीं होता, जितना होना चाहिए। इस पाचन संस्थान से अवरोध के कारण भी वह कम उपयोगी रहता है। खाया भोजन ठीक से नीचे नहीं उतरता। कई प्रकार की तकलीफें करने लगता है। अतः हमें हमारे शरीर की क्रियाशीलता को बढ़ाना व इसमें सुधार करना चाहिए, तभी हम भोजन का लाभ उठा सकते हैं। इसमें निहित तत्व हमारे लिए तब ही लाभदायक बन सकते है।

2. कई बार हमारे शरीर के साथ जुड़े रोग भी हमें पूरा पौष्टिक तथा लाभकारी भोजन नहीं करते देते या इन रोगों के कारण हमारा भोजन पचता नहीं। मधुमेह जैसे रोगों के कारण या तो हमें काफी परहेज करना पड़ता है या फिर जो हम खाते है, वह लाभ की बजाए हानि करने लगता है।
इसी प्रकार स्टोन होना या थायराइड ग्लैंड्स से विकार हो जाना आदि कुछ ऐसी तकलीफें है, जो हमारे रास्ते में रोड़ा बनती हैं। तथा खाए हुएँ या खा सकने वाले भोजन से हम लाभ कम, हानि
अधिक पा लेते हैं।

3. कई बार खांसी, अस्थमा, एलर्जी आदि रोगों के कारण एक लंबे समय तक भारी-भरकम मात्रा में दवाइयां सेवन करनी पड़ती है। ये दवाएं हमारी पाचन शक्ति पर कुप्रभाव डालती है, अतः हमारा भोजन हमारे लिए उतना उपयोग नहीं हो पाता, जितना होना चाहिए।

4. कई बार पेट ठीक न रहने से, सदा दस्त लगे रहने से या उलटियों की तकलीफ़ होने से अथवा कब्ज बनी रहने से भी हमारी पाचन शक्ति तथा खानपान आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा भोजन में उपलब्ध पौष्टिकता से हमें वंचित रह जाना पड़ाता है।

पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोग तथा लक्षण :

1. कई बार भूख ही नहीं लगती। खाने को मन ही नहीं करना।
2. शरीर का वज़न निरंतर घटता चला जाता है। कुछ तो भोजन कर लेते है, मगर पचा नहीं सकते। कुछ खाकर पचॉ तो लेते है, मगर इससे शरीर पुष्ट नहीं होता। शरीर क्षीण होता जाता है।
3. पौष्टिक भोजन नहीं होगा, तो कई बार अपने कार्य में मन भी नहीं लगता। आप ज़बरदस्ती बैठ तो सकते है, मगर कुछ भी करने को मन नहीं करता।
4. विद्यार्थि पुस्तकों में मन नहीं लगा सकते। किताब खोल तो लेंगे,मगर कुछ पल्ले नहीं पड़ता।
5. अपने आस-पास के क्रिया-कतापों से बेरुखी बनी रहना।
6. स्वभाव में क्रोध, खोज तथा चिड़चिड़ापन व्याप्त रहता है।
7. सांस के रोग हो जाना। सांस लेने से तकलीफ होना। छाती जाम रहना।
8. मानसिक चिंता बने रहना। टेंशन में रहना। किसी भी चीज को ठीक नहीं मानना।
9. संक्रामक रोगों का तुरंत प्रभाव पड़ना। घिरे रहना। ठीक न हो सकना। कमजोरी के कारण जल्दी प्रभावित होते रहना।
10. घाव हो जाना या दुर्घटना में चोट लगना, मगर इनका उपचार करने पर भी ठीक न होना। घाव न भरना।
11. निरंतर कमजोरी बनी रहना।
12. खाया-पिया पच न सकना। पाचनशक्ति निरंतर कमजोर होते रहना। खट्टी डकारें आना। सूल रहना।
13. नींद पूरी न होना। किसी काम में मन न लगना। सारा दिन सिर भारी रहना। शिथिलता बनी रहना। आलस्य बढ़ने लगना।
14. मसूड़ों और दांतों की तकलीफ बनी रहना। पायरिया का रोग हो जाना।
15. गला खराब रहना। टांसिल की शिकायत रहना।
16. शरीर में कई स्थानों पर फोड़े-फुसियां हो जाना।
17. आंखें कमजोर होना। ऊंचा सुनना।
18. शरीर पर खारिश रहना। खुजली के कारण सो नहीं सकना।
19. शरीर के अनेक भागों में दर्द बना रहना। ठीक से सो न सकना,बैठने, चलने में भी तकलीफ होना।

यदि हमारा भोजन अपूर्ण-पोषण वाला होगा तथा शरीर में भोजन से या अंदरूनी कारण से पूरे तत्व नहीं मिलेंगे, तो ऊपर बताए अनेक कष्ट सहन करने ही पड़ेगें।

निष्कर्ष :

1. जो भोजन हम करते है, हो सकता है। वह अपूर्ण हो। उसमें पौष्टिकता की कमी हो। अपूर्ण पोषण वाला हो। यदि अपूर्ण पोषण वाता है, तो इसके कारण को जाने।
2. भोजन से पूरी कैलोरी है कि नहीं? इसमें प्रोटीन की कमी तो नहीं। कैल्सियम की उचित मात्रा है या नहीं। सभी विटामिन है अथवा विटामिनों की कमी रह जाएगी। विटामिन पानी में घुलनशील हैं या वसा में घुलनशील।
3. जरूरत पड़े, तो प्राइमरी कमी अर्थात् अपने आहार में सम्मिलित खाद्य पदार्थों की कमी को पूरा करें। अपने भोजन में ऐसे पदार्थ शामिल करें, ताकि आपके भोजन में वे सभी तत्व आ जाएं, जो शरीर के लिए आवश्यक होते हैं।
4. यदि ये भोजन के रूप में आप सीधे पौष्टिक तत्व पाने में अक्षम हैं, तो दया द्वारा तथा टॉनिक द्वारा प्राप्त करें। मगर कमी को कमी न रहने दे, वरना शरीर कमजोर रहेगा। अविकसित रहेगा। मस्तिष्क मजबूत नहीं होगा। सोचने, विचार करने की शक्ति क्षीण रहेगी। कार्य करने की क्षमता नहीं आएगी। अनेक रोग या रोगों के लक्षण सामने आ खड़े होंगे। निरोगता की तरसते रहेंगे, अत: प्राइमरी कमी हर हालत में पूरी करें।
5. एक और कमी है, जिले सेकेंडरी कमी मानते है। आपने भोजन तो सही लिया, मगर इसे ठीक प्रकार से पकाकर, काटकर, बनाकर नहीं खाया और यह शरीर में जाकर पचा नहीं। या इससे जो-जो रस, तत्व निकालने है, आपका शरीर उन्हें निकाल नहीं पाया। या कुछ विद्यमान रोगों के कारण आप इसका पूरा लाभ नहीं उठा पाए। इस पर गौर कर, इस कमी को भी दूर करें।
6. भोजन का चयन कैसे हो? आ पदार्थों को धोना और खाना कैसे हो? इसे पकाना, कच्चा खाना, कितना चबाना, रस निकालकर पीना
आदि विधियां जरूर जाने। किन तत्वों की ज़रूरत पूरी हो रही है। तथा जिनकी अभी कमी है, उसका प्रबंध करें। फलों तथा सब्जी को कब धोना, कैसे साफ करना, कैसे छीलना ताकि इसकी पौष्टिकता बनी रहे, यह सब जानने की जरुरत है, तभी हम अपने शरीर, मस्तिष्क को रोगों से बचाते हुए अधिक सक्रिय रख पाएंगे।