संतों का हृदय (बोध कथा) | Motivational Story in Hindi

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संतों का हृदय (बोध कथा) | Motivational Story in Hindi

प्रेरक हिंदी कहानी : Hindi Storie with Moral

★ उन्नावा जिले के किसी गाँव में स्वामी उग्रानन्द नाम के महात्मा ने घूमते-घामते गाँव के बाहर कोई खण्डहर में रात बितायी । गाँव में किसान लोग रहते थे । उनके बैलों की एक जोडी गुम हो गयी थी ।

★ किसान खोजने निकले । उन्हें उग्रानन्द मिल गये, ध्यान की मुद्रा में बैठे हुये ।
किसानों ने सोचा कि यही चोर है और अभी ध्यान का ढोंग कर रहा है । उन्होंने तो न आव देखा न ताव । स्वामी उग्रानन्द को पकडकर खूब मारा और अंत में उनका मुँह गोबर से लीप-पोत दिया ।

★ मारपीट कर उन्हें पकडकर पुलिसथाने में ले गये । दैवयोग से उस गाँव में पी.एस.आई. वही था जो उन महात्मा का शिष्य था । अभी-अभी उसका वहाँ तबादला हुआ था । उसने देखा कि अरे, यह तो हमारे गुरुजी ! किसानों की टोली उन्हें गोबर पोतकर पकडकर ला रही है !
वह गुरुभक्त पुलिस अफसर तो यह देखते ही आगबबूला हो गया । उसने फौरन आदेश जारी किया : इन बदमाशों को सबको अंदर कर दो ।

★ पच्चीस-तीस जो भी किसान थे सब बन्द कर दिये गये ।
सबसे प्रथम गुरुमहाराज को गंगाजल से सब धुलाया, स्नान करवाया । उनकी पूजा की । ‘हमारे ये साक्षात् शिवस्वरूप ब्रह्मस्वरूप स्वामी, उग्रानन्द भगवान और उनके साथ यह क्या हुआ ? किसानों को क्या सबक देना उसके बारे में वह सोच रहा था उतने में ही स्वामीजी बोले :
‘‘तू मेरा शिष्य है न ! तो मेरी आज्ञा का पालन कर । इन सबको छोड दे और मिठाई मँगवाकर खिला |

★ जिनका हृदय मीठा है वे मिठाई ही देंगे । नाम तो उग्रानन्द है मगर हृदय में प्रेम की सरिता बह रही है । ऐसे पुरुष धरती पर चलते-फिरते दो हाथ-पैर वाले भगवान हैं । तुम दो हाथ-पैर वाले हो तो तुम्हें भगवान भी दो हाथ-पैर वाला दिखेगा, मिलेगा, तभी काम होगा ।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे :
‘‘सूर्यनारायण साक्षात् भगवान हैं, चन्द्रमा साक्षात् भगवान हैं, जल साक्षात् भगवान है परंतु उनसे तुम्हारी आत्म-उन्नति या आत्मरस प्रगट नहीं होता । इसलिए तुम्हें भगवद्रस दिलाने वाले, तुम्हारे जैसे ही द्विपाद, द्विहस्त, द्विनेत्र वाले कोई महापुरुष ही भगवान होकर अपने भगवद्भाव को प्रगट करे तभी तुम्हारी उन्नति होगी |

★ ‘आपो देवता, सूर्यो देवता – यह तो सच है परंतु मनुष्य रूप में जो देवता है, उग्रानन्द स्वामी जैसा भगवान जब समाज में आता है तभी समाज को पता चलता है कि हम मकान, रोटी के चक्कर में, चौरासी के चक्कर में खाने नहीं आये अपितु परमात्मप्राप्ति करके अपने सत्-चित्-आनंदस्वरूप को पाकर परमपद का अनुभव करने आये हैं । हमारा दुर्लभ मनुष्य जन्म ‘तू-तू-मैं-मैं में खपाने के लिए नहीं, दुर्लभ से दुर्लभ परमात्म-पद प्राप्त करने के लिए, जीवन्मुक्त बनने के लिए है । तमाम वासना और बंधनों को मिटाकर अमिट आत्मा-परमात्मा की प्राप्ति के लिए है । धन्य हैं वे लोग जिन्हें मनुष्यरूप में भगवत्प्राप्ति किये हुये भगवत्स्वरूप संतों के प्रति अटूट श्रद्धा होती है ।

★ उग्रानंद स्वामी लाठी से पीटे गये, गोबर से पोते गये, फिर भी कहते हैं कि इनको मिठाई खिलाओ । कौन बडे ? जिन्होंने गोबर से मुँह पोता वे किसान बडे कि जिन्होंने बदले में मिठाई बँटवायी वे बडे ?

★ थानेदार तो गुरु का भक्त था । उसकी जेब में जितने पैसे थे उसकी मिठाई मँगवायी गयी । गाँववालों को थानेदार के लिए इज्जत हो गयी । बाबाजी के लिए भी आदर हुआ और वे लोग भक्त बन गये । अगर बाबा भी थानेदार से उनको खूब पिटवाते तो गाँव वालों को न बाबा के लिए आदर होता, न भगवद्भक्ति मिलती, उलटे नफरत होती ।

★ मधुर व्यवहार हमेशा एक-दूसरे को नजदीक लाता है । क्रूरता, घृणा, कट्टरता के व्यवहार से एक-दूसरे की शक्तियाँ टकराकर एक-दूसरे को विनष्ट कर देती है । व्यक्ति के शरीर एवं उसके गुणों को मत देखो । उसकी गहराई में परमात्मा है उसका स्मरण करके उसे देखो तो बेडा पार हो जायेगा । उग्रानंद जैसों के चित्त में यही तो रहता होगा कि :
जिसीने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करे ।
आशिकों को वाजिब है कि यही फिर से दुआ करें ।।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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