Shat Chakra Nirupanam
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शीर्षक-पृष्ठ पर ग्रन्थ का नाम षट्चक्रनिरूपणम् अंकित है और इसके रचयिता के रूप में श्री पूर्णानन्द यति का उल्लेख मिलता है। सम्पादक एवं हिन्दी टीकाकार गोस्वामी प्रल्लाद गिरि, वेदान्तकेशरी हैं। पुस्तक कृष्णदास संस्कृत सीरीज के प्रथम सौ आठवें अंक के रूप में प्रकाशित है। प्रकाशन कृष्णदास अकादमी, वाराणसी का है और पता चौक, गिराना भवन के निकट, वाराणसी दिया गया है। प्रथम संस्करण वर्ष उन्नासी अठारह का है और कीमत पैंतीस रुपये रखी गई है। वर्तमान विक्रय केन्द्र के रूप में चौखम्भा संस्कृत सीरीज कार्यालय, गोपाल मंदिर लेन, चौक, वाराणसी बताया गया है।
ग्रन्थ में सात शक्ति-केंद्रों का क्रमशः वर्णन मिलता है। प्रत्येक केंद्र की स्थिति, उसके लक्षण, उससे जुड़े अभ्यास और उपलब्ध होने वाली अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। मूल पाठ के साथ कई टीकाएँ भी दी गई हैं, जिनमें शोखचरपार्षिका, शतचक्रभेदितपाणि और शतचक्रवृत्ति प्रमुख हैं। पादलेख में इन टीकाओं की उपलब्धता और स्रोत-संदर्भ का विवरण दिया गया है तथा समर्पण-पृष्ठ में आचार्य ने अपना श्रद्धापत्र व्यक्त किया है।
षट्चक्रनिरूपणम् तान्त्रिक और योगिक परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसे भारतीय साधना-परंपरा में अध्ययन के लिए बहुत महत्व दिया जाता है। इसमें शरीर, सूक्ष्म शक्ति-प्रवाह और साधना-पद्धति के बीच संबंध बताया गया है। यह पाठ धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी पढ़ा जाता है, इसलिए पाठकों को यह जान लेना उचित है कि इनमें दिए गए अभ्यास वर्णन आधुनिक शारीरिक विज्ञान से सिद्ध नहीं हैं। किसी भी कठिन साधना या शारीरिक प्रयोग से पहले योग्य गुरु या चिकित्सक से अवश्य सलाह लें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- छह चक्रों का निरूपण
- चक्र तथा नाड़ी का स्वरूप
- कुंडलिनी साधना
- श्लोक तथा अर्थ
पुस्तक की मुख्य बातें
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