अम्बास्तव, पञ्चस्तवी का चतुर्थ स्तव – Ambastava
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यह पुस्तक अम्बस्तवः नाम से छपी है और पञ्चस्तवी का चौथा स्तव है। पञ्चस्तवी के रचयिता श्रीधर्माचार्य माने गए हैं, जबकि इस पुस्तक में हर संस्कृत श्लोक के साथ कश्मीरी भाषा का पद्यानुवाद प्रो. ओंकारनाथ च्रंगू ने किया है। पुस्तक के आवरण पर सम्पर्क के लिए भगवान गोपीनाथ जी आश्रम, तोडी उदयवाला, जम्मू तथा पम्पोष एनक्लेव, नई दिल्ली का पता छपा है।
प्रस्तावना डॉ. बलजीनाथ पण्डित ने लिखी है, जिसमें पञ्चस्तवी के पाँच स्तवों का परिचय है; ये पाँचों खण्ड जगदम्बा पराशक्ति के पाँच प्रधान स्वरूपों से जुड़े हैं और अम्बस्तव उनमें पालनहार मातृस्वरूप की स्तुति है। प्रस्तावना के अनुसार इस स्तोत्र में शिखरिणी जैसे कठिन छन्दों को छोड़कर वसन्ततिलका छन्द अपनाया गया, जिससे उसकी मधुरता खुलती है। इसमें कुण्डलिनी योग, वेध-दीक्षा और कामकला के संकेत भी कुछ पद्यों में आए हैं, तथा व्यतिरेक अलंकार के माध्यम से जगदम्बा को शिव से उत्कृष्ट बताया गया है।
पुस्तक उन भक्तों और साधकों के लिए है जो संस्कृत स्तोत्र का पाठ करते हैं और उसका अर्थ कश्मीरी में भी जानना चाहते हैं। प्रत्येक श्लोक के साथ उसका कश्मीरी पद्यानुवाद छपा है, इसलिए यह कश्मीरी भाषी पाठकों के लिए विशेष रूप से काम का है; जो कश्मीरी नहीं जानते, उनके लिए हिन्दी प्रस्तावना और परिचय ही सहायक होंगे।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
- मोबाइल व कंप्यूटर पर पढ़ने योग्य PDF
पुस्तक की मुख्य बातें
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