एक्यूप्रेशर चिकित्सा में प्रेशर देने का तरीका, मात्रा, समय और सावधानीयां

एक्यूप्रेशर चिकित्सा में प्रेशर देने का तरीका :

       वैसे तो हाथ व पैरों पर हमेशा थोड़ा-थोड़ा प्रेशर देते रहना चाहिए मगर शरीर के कुछ ऐसे केन्द्र भी हैं जो बहुत ही नाजुक होते हैं, उन पर प्रेशर देने के लिए कुछ समय सीमा बांधी गई है। प्रेशर देने के लिए पहले रोगी की सहनशक्ति व उम्र का पता लगा लें। सामान्य शरीर वालों को लगभग 15 से 20 मिनट तक प्रेशर देना चाहिए। अगर प्रेशर ज्यादा देर तक देना हो तो बीच-बीच में कुछ सेकेण्ड का आराम देते रहना चाहिए। ऐसा करने से रोगी को दर्द का अनुभव व सूजन नहीं होती है।

       प्रेशर देने के लिए सही स्थान व वातावरण का होना भी जरूरी है। जहां तक हो सके प्रेशर ऐसे स्थान पर बैठकर देना चाहिए जो साफ तथा स्वच्छ हो। शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें ताकि प्रेशर आसानी से दिया जा सके। अपने दिल व दिमाग से चिंता और परेशानी को हटा दें। शरीर पर प्रेशर देने से पहले तरल पदार्थ या पाउडर लगा लें ताकि शरीर पर जलन, सूजन व छाले न पड़ें। अपने हाथों के नाखूनों को काट लें ताकि प्रेशर देते समय चुभन न हो और प्रेशर का पूरा प्रभाव मिल सके।

       प्रेशर सामान्यत: प्रतिदिन दिन में 1-3 बार दिया जा सकता है। प्रेशर देने के बाद यदि रोगी पूरी तरह ठीक भी हो जाता है तो प्रेशर दूसरे से तीसरे दिन भी दिया जा सकता है। यदि रोगी का रोग बहुत ज्यादा गंभीर है तो प्रेशर एक दिन में 4-5 बार दिया जा सकता है। एक बार में एक प्रतिबिम्ब बिन्दु पर प्रेशर देने के लिए 5 से 15 सेकण्ड तक प्रेशर दिया जा सकता है। प्रेशर देने के बाद किसी दूसरे अंग पर प्रेशर देना हो तो प्रतिबिम्ब बिन्दु पर प्रेशर लगभग 5 से 10 सेकण्ड तक रुककर दे सकते हैं। प्रेशर एक समय में 3 से 4 बार ही देना चाहिए।

       प्रेशर देने के लिए सुबह का समय बहुत ही ज्यादा अनुकूल रहता है लेकिन प्रेशर दोपहर और शाम को भी दिया जा सकता है। इस प्रकार प्रेशर एक समय में 60 सेकण्ड तक दिया जा सकता है अर्थात एक दिन में प्रेशर 3 मिनट तक दिया जा सकता है।

       एक्यूप्रेशर बिन्दु एक से अधिक है तो प्रत्येक प्रतिबिम्ब बिन्दु पर प्रेशर एक दिन में 3 मिनट तक देना पड़ता है। यदि 5 प्रतिबिम्ब बिन्दु है तो प्रेशर देने में एक दिन में 15 मिनट का समय लगेगा। प्रेशर कभी भी एक साथ 15 से 20 सेकण्ड से अधिक न दें नहीं तो प्रतिबिम्ब बिन्दु वाले स्थान पर सूजन आ सकती है या त्वचा फटकर घाव बन सकता है और रोग ठीक भी नहीं हो पाता है।

       प्रेशर देते समय यह भी ध्यान देना चाहिए कि ज्यादा समय तक या ज्यादा प्रेशर देने से रोग जल्दी ठीक नहीं होता है। इसलिए प्रेशर समय के अनुसार ही देना चाहिए। प्रेशर उतना ही देना चाहिए जितना कि रोग को ठीक करने के लिए आवश्यक हो।

       एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा उपचार करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि कौन से रोगी पर प्रेशर कितने समय के लिए देना चाहिए।

प्रेशर देने के लिए रोगी की उम्र के अनुसार समय सीमा : 

उम्रसमय
जवान व्यक्तियों के लिए1 दिन में प्रेशर 5 से 15 मिनट तक
3 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए1 दिन में प्रेशर 5 से 10 मिनट तक
1 से 3 वर्ष के बच्चों के लिए1 दिन में प्रेशर 3 से 7 मिनट तक
6 से 12 महीने के बच्चों के लिए1 दिन में प्रेशर 1 से 5 मिनट तक
3 से 6 महीने के बच्चों के लिए1 दिन में प्रेशर आधा सेकण्ड से 1 मिनट तक

      कई प्रकार के रोगों में जब रोग की अवस्था बहुत ज्यादा गंभीर हो तो रोग का इलाज करते समय सबसे पहले 2 दिन में एक बार प्रेशर देना चाहिए और प्रेशर देते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रेशर हल्का दें। जैसे-जैसे रोग ठीक होने लगे दबाव का समय बढ़ाते चले जाएं और प्रतिदिन नियमित रूप से प्रेशर दें।

       यदि शरीर का कोई अंग सही से काम नहीं कर रहा हो या कोई अंग रोगग्रस्त हो गया हो तो उस अंग से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर थोड़ा रुक-रुककर प्रेशर देना चाहिए। यदि दर्द को एकदम ठीक करने के लिए प्रेशर देना हो तो प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर तेज प्रेशर देना चाहिए।

प्रेशर देते समय सावधानियां : 

  • उपचार करने के लिए किसी औषधि का सेवन किया है तो एक्यूप्रेशर से उपचार न करें।
  • बहुत अधिक थके होने की अवस्था में थोड़ी देर आराम करने के बाद एक्यूप्रेशर लें।
  • यदि हृदय जोर-जोर से धड़क रहा हो या पसीना अधिक तेजी से निकल रहा हो तो थोड़ी देर आराम करने के बाद एक्यूप्रेशर लें।
  • जब पेट भरा हुआ हो तो एक्यूप्रेशर द्वारा उपचार न करें। अगर पेट खाली है तो उपचार करने के लिए पहले कुछ खा लें फिर थोड़ी देर के बाद एक्यूप्रेशर से उपचार करें। पेट पूरा भरा होने पर उपचार तब तक न करें जब तक कि भोजन पूरा पच न जाए।
  • शरीर के जिस भाग पर चोट लगी हो या सूजन आ गई हो उस अंग पर एक्यूप्रेशर से उपचार न करें। चोट या सूजन ठीक हो जाने पर ही उपचार करें।
  • जब किसी रोगी ने गर्म पानी से स्नान किया है तो स्नान से आधा घंटे बाद तक एक्यूप्रेशर से उपचार न करें।
  • एक्यूप्रेशर से उपचार करने के दौरान यदि सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दु पर सूजन आ जाए तो उपचार 1-2 दिन के लिए बंद कर देना चाहिए और जब सूजन ठीक हो जाए उसके बाद उपचार करना चाहिए।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करते समय धैर्य बनाकर रखना चाहिए।
  • प्रेशर रोगी पर उतना ही देना चाहिए जितना कि वह सहन कर सके।
  • प्रेशर उतना ही देना चाहिए जितना कि प्रेशर का प्रभाव त्वचा की सतह के नीचे तक पहुंच सके।
  • रोगी का उपचार शुरू करते समय शुरू में हल्का दबाव देना चाहिए और फिर धीरे-धीरे बढ़ाते जाना चाहिए।
  • रबर बैण्ड या क्लिप बांधकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करे तों यह ध्यान रखना चाहिए कि उंगलियों का ऊपरी भाग नीला न हो पाए अगर ऐसा हो जाए तो रबर बैण्ड या क्लिप उतार दें।
  • एड़ी से नीचे वाले भाग पर तेज प्रेशर देना चाहिए।
  • पीठ तथा गर्दन पर प्रेशर देने के लिए एक्यूप्रेशर उपकरण का उपयोग नहीं करना चहिए। शरीर के इन अंगों पर अंगूठे से प्रेशर देना चाहिए।
  • हाथ-पैरों के कुछ भाग बहुत कोमल होते हैं तथा कुछ सख्त होते हैं। घुटनों तथा टखनों के साथ वाला, उंगलियों के नीचे वाला तथा हाथों और पैरों का ऊपरी भाग दूसरे भागों से कुछ नरम होता है। ऐसे अंगों पर प्रेशर कम तथा धीरे से देना चाहिए।

एक्यूप्रेशर उपचार करने के समय में शारीरिक स्थिति : 

     वैसे देखा जाए तो एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार किसी भी परिस्थितियों में किया जा सकता है लेकिन एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करते समय रोगी को बैठाकर उपचार करना सही रहता है। रोगी को जमीन पर लिटाकर फिर एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार किया जा सकता है। अच्छा तो यह रहता है कि रोगी को जिस स्थिति में आराम मिलता है उस स्थिति में ही उसका उपचार किया जाए।

रोगी पर प्रेशर देने की मात्रा : 

       रोगी के शरीर के प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर प्रेशर कम दिया जाए या अधिक यह निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है-

  • रोगी की उम्र क्या है?
  • रोग की अवस्था क्या है?
  • रोगी की शारीरिक बनावट क्या है?
  • रोगी को दर्द सहन करने की ताकत शरीर में है या नहीं।
  • रोग के अनुसार रोगी के शरीर पर प्रतिबिम्ब बिन्दु कहां है?

रोगी की निम्नलिखित अवस्थाओं में मध्यम या भारी प्रेशर दिया जा सकता है –

  • रोगी व्यक्ति बहुत पुराने रोग की विषमताओं से पीड़ित न हो।
  • रोगी का रोग बहुत पुराना हो चुका हो।
  • रोगी को अधिक कमजोरी हो या उसे दर्द को सहन करने के प्रति अधिक सहनशीलता न हो।
  • रोगी अगर अधिक थका हो।

रोगी की निम्नलिखित अवस्थाओं में हल्का या मध्यम प्रेशर दिया जा सकता है-

  • यदि प्रतिबिम्ब बिन्दु के स्थान पर तेज दर्द हो रहा हो।
  • प्रतिबिम्ब बिन्दु के आस-पास सूजन हो गई हो।
  • कोई रोगी पहली बार उपचार करा रहा हो।
  • रोगी का हृदय, फेफड़ा या गुर्दे की अधिक गंभीर बीमारी की अवस्थाएं हो जाने पर।
  • रोगी का स्नायु एकदम कमजोर या ढीला पड़ गया हो।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करते समय कष्ट : 

       एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करते समय रोगी को कुछ कष्टों का सामना करना पड़ सकता है जैसे- सर्दी-जुकाम, दस्त, सिर में दर्द या अधिक गुस्सा आना। रोगी को मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं। लेकिन इस प्रकार की दिक्कत कुछ ही दिनों में खत्म हो जाती है। वैसे देखा जाए तो बहुत कम रोगियों को ही इस प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। उपचार के दौरान रोगी को धैर्य बनाए रखना चाहिए क्योंकि उपचार के दौरान रोगी का धैर्य कभी-कभी टूट भी जाता है।

कुछ ऐसी  स्थितियां जहां एक्युप्रेशर लाभ देना कम कर देता है : 

       एक्युप्रेशर की कुछ सीमाएं होती हैं जहां पर वह अपना काम करना कम कर देता है या बंद कर देता है जैसे- मोतियाबिन्द, कैंसर, गुर्दे की पथरी, सिजोफ्रेनिया, हड्डी टूटना (फ्रैक्चर) और आंत्र-अवरोध जैसी शल्य (ऑपरेशन) वाली स्थितियों में यह चिकित्सा अधिक लाभकारी नहीं हो पाती। ऐसी स्थितियों में उपचार करने के लिए किसी अच्छे चिकित्सक के पास जाना चाहिए और फिर रोगी का उपचार कराना चाहिए।

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